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हबीब तनवीर जयंती: गांव के लोक कलाकारों से सीखकर बदला भारतीय रंगमंच का चेहरा

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हबीब तनवीर जयंती: गांव के लोक कलाकारों से सीखकर बदला भारतीय रंगमंच का चेहरा

सारांश

हबीब तनवीर गाँव के कलाकारों को थिएटर सिखाने गए थे — लेकिन लौटे उनके शागिर्द बनकर। इसी उलटफेर ने भारतीय रंगमंच को 'चरनदास चोर' जैसी कालजयी कृति दी और एडिनबर्ग तक पहुँचाया।

मुख्य बातें

हबीब तनवीर का जन्म 1 सितंबर 1923 को रायपुर में हुआ; असली नाम हबीब अहमद खान ।
उन्होंने रॉयल एकेडमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट्स और ब्रिस्टल ओल्ड विक थिएटर स्कूल से प्रशिक्षण लिया।
1959 में भोपाल में नया थिएटर की स्थापना; छत्तीसगढ़ी लोक कलाकारों को मंच का केंद्र बनाया।
'चरनदास चोर' को 1982 में एडिनबर्ग इंटरनेशनल ड्रामा फेस्टिवल में फ्रिंज फर्स्ट पुरस्कार मिला।
2002 में पद्म भूषण सहित संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, पद्म श्री और कालिदास सम्मान से सम्मानित।
8 जून 2009 को 85 वर्ष की आयु में निधन।

हबीब तनवीर — जिनका जन्म 1 सितंबर 1923 को रायपुर में हुआ था — ने भारतीय रंगमंच को वह दिशा दी जो न तो पश्चिमी थिएटर की नकल थी और न ही परंपरागत संस्कृत नाटक की पुनरावृत्ति। उन्होंने छत्तीसगढ़ के अनपढ़ और अप्रशिक्षित लोक कलाकारों को मंच का केंद्र बनाकर यह साबित किया कि असली अभिनय किताबों से नहीं, जीवन के अनुभव से उपजता है। उनकी यह दृष्टि आगे चलकर नया थिएटर की आत्मा बनी।

प्रारंभिक जीवन और रंगमंच की ओर झुकाव

तनवीर का असली नाम हबीब अहमद खान था। शिक्षा पूरी करने के बाद उनका रुझान साहित्य, कविता और नाटक की ओर बढ़ा। मुंबई में उनका जुड़ाव इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (इप्टा) से हुआ, जहाँ उन्होंने थिएटर को महज मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज की आवाज़ के रूप में देखना शुरू किया। बाद में दिल्ली में भी उन्होंने रंगमंच के कई महत्वपूर्ण साथियों के साथ काम किया।

पश्चिमी प्रशिक्षण और भारतीय लोक परंपरा का संगम

थिएटर की गहरी पढ़ाई के लिए तनवीर इंग्लैंड गए। उन्होंने रॉयल एकेडमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट्स में अभिनय की विधिवत ट्रेनिंग ली और ब्रिस्टल ओल्ड विक थिएटर स्कूल में निर्देशन तथा प्रोडक्शन की बारीकियाँ सीखीं। वहाँ उन पर बेर्टोल्ट ब्रेख्त के नाट्य-दर्शन का गहरा प्रभाव पड़ा। भारत लौटने के बाद उन्होंने इस पश्चिमी तकनीक को भारतीय लोक परंपराओं के साथ जोड़ने का प्रयोग शुरू किया — और यही उनकी असली पहचान बनी।

लोक कलाकारों से सीखने का वह निर्णायक मोड़

छत्तीसगढ़ के लोक कलाकारों के साथ काम करते हुए तनवीर ने शुरू में उन्हें शहरी रंगमंच की तकनीक — मंच पर चलने का ढंग, संवाद बोलने की शैली — सिखाने की कोशिश की। लेकिन कई कलाकार इस ढाँचे में फिट नहीं हो पा रहे थे। यह ऐसे समय में आया जब भारतीय थिएटर जगत प्रशिक्षित और शिक्षित कलाकारों को ही वरीयता देता था। तनवीर को धीरे-धीरे एहसास हुआ कि समस्या कलाकारों में नहीं, उनके अपने नज़रिए में है। इन कलाकारों के पास प्रशिक्षण की जगह लोक जीवन का अनुभव, सहज भाषा, ताल और स्वाभाविक अभिनय था — जो किसी अकादमी में नहीं सिखाया जा सकता।

तनवीर ने उन्हें बदलने का प्रयास छोड़ दिया और उनकी इसी स्वाभाविक शैली को मंच पर स्थान देना शुरू किया। 1954 में मंचित 'आगरा बाज़ार' इस नई सोच का पहला बड़ा प्रमाण था, जिसमें शायर नज़ीर अकबराबादी की दुनिया और आम बाज़ार के किरदारों को मंच पर जीवंत किया गया। 1959 में उन्होंने भोपाल में नया थिएटर की स्थापना की और छत्तीसगढ़ी लोक कलाकारों के साथ अपना प्रयोग और गहरा किया।

चर्चित नाटक और अंतरराष्ट्रीय पहचान

इसी रचनात्मक साझेदारी से 'चरनदास चोर', 'मिट्टी की गाड़ी', 'गांव के नांव ससुराल, मोर नांव दमाद', 'बहादुर कलारिन' और 'जिस लाहौर नइ देख्या, ओ जम्याई नइ' जैसे कालजयी नाटक सामने आए। 'चरनदास चोर' उनकी सर्वाधिक चर्चित कृति बनी। 1982 में इस नाटक के मंचन को एडिनबर्ग इंटरनेशनल ड्रामा फेस्टिवल में प्रतिष्ठित फ्रिंज फर्स्ट पुरस्कार मिला — यह भारतीय लोक रंगमंच की अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति का एक ऐतिहासिक क्षण था।

सम्मान, फिल्में और विरासत

तनवीर को उनके अवदान के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, जवाहरलाल नेहरू फेलोशिप, पद्म श्री और 1990 में कालिदास सम्मान से नवाज़ा गया। 1996 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप और 2002 में पद्म भूषण प्रदान किया गया। रंगमंच के साथ-साथ उन्होंने 'गांधी' और 'प्रहार' जैसी फिल्मों में भी अभिनय किया, लेकिन उनकी असली पहचान हमेशा थिएटर ही रही। 8 जून 2009 को 85 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ। उनकी विरासत आज भी उन लोक कलाकारों की परंपरा में जीवित है जिन्हें उन्होंने मंच का केंद्र बनाया।

संपादकीय दृष्टिकोण

वैचारिक थी — उन्होंने 'कौन सिखाता है और कौन सीखता है' के उस पदानुक्रम को उलट दिया जो भारतीय थिएटर में अब भी कायम है। गौरतलब है कि आज जब शहरी रंगमंच फिर से अकादमिक प्रशिक्षण और अंग्रेज़ी-माध्यम प्रस्तुतियों की ओर झुक रहा है, तनवीर का प्रयोग एक ज़रूरी प्रतिप्रश्न बना हुआ है। 'चरनदास चोर' का एडिनबर्ग तक पहुँचना यह भी बताता है कि स्थानीयता को वैश्विक मंच मिल सकता है — बशर्ते उसे 'परिष्कृत' करने की ज़िद न हो। उनकी विरासत का सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या आज का भारतीय थिएटर उनके उस सबक को आगे ले जा रहा है, या केवल उनके नाम का उत्सव मना रहा है।
RashtraPress
31 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

हबीब तनवीर कौन थे और उनकी जयंती कब है?
हबीब तनवीर भारत के प्रमुख नाटककार, निर्देशक और अभिनेता थे जिनका जन्म 1 सितंबर 1923 को रायपुर में हुआ था। उनका असली नाम हबीब अहमद खान था और उन्होंने भारतीय लोक रंगमंच को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई।
नया थिएटर की स्थापना कब और कहाँ हुई?
नया थिएटर की स्थापना हबीब तनवीर ने 1959 में भोपाल में की थी। यह संस्था छत्तीसगढ़ी लोक कलाकारों को मंच पर लाने और लोक परंपराओं को आधुनिक रंगमंच से जोड़ने का केंद्र बनी।
'चरनदास चोर' नाटक को कौन-सा अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिला?
'चरनदास चोर' के 1982 के मंचन को एडिनबर्ग इंटरनेशनल ड्रामा फेस्टिवल में प्रतिष्ठित फ्रिंज फर्स्ट पुरस्कार मिला। यह भारतीय लोक रंगमंच की अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति का एक ऐतिहासिक अवसर था।
हबीब तनवीर को कौन-कौन से सम्मान मिले?
तनवीर को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, जवाहरलाल नेहरू फेलोशिप, पद्म श्री, 1990 में कालिदास सम्मान, 1996 में संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप और 2002 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।
हबीब तनवीर ने लोक कलाकारों के साथ काम करने का तरीका क्यों बदला?
शुरुआत में तनवीर छत्तीसगढ़ी लोक कलाकारों को शहरी थिएटर तकनीक सिखाना चाहते थे, लेकिन जब कलाकार उस ढाँचे में फिट नहीं हो पाए तो उन्हें एहसास हुआ कि समस्या कलाकारों में नहीं, उनके अपने नज़रिए में है। इसके बाद उन्होंने कलाकारों की स्वाभाविक लोक शैली को ही मंच का आधार बनाया।
राष्ट्र प्रेस
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