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हबीब तनवीर पुण्यतिथि: लंदन की पढ़ाई छोड़ छत्तीसगढ़ के लोक कलाकारों को दिलाई विश्व मंच पर पहचान

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हबीब तनवीर पुण्यतिथि: लंदन की पढ़ाई छोड़ छत्तीसगढ़ के लोक कलाकारों को दिलाई विश्व मंच पर पहचान

सारांश

लंदन में आधुनिक रंगमंच की पढ़ाई के बाद हबीब तनवीर ने पश्चिम की नकल नहीं की — छत्तीसगढ़ के गाँवों की ओर लौटे और 'नाचा' के लोक कलाकारों को विश्व मंच तक पहुँचाया। 'चरणदास चोर' अंतरराष्ट्रीय सम्मान पाने वाला पहला भारतीय नाटक बना। 8 जून को उनकी पुण्यतिथि पर उनकी रंग-विरासत को याद किया जा रहा है।

मुख्य बातें

हबीब तनवीर का जन्म 1 सितंबर 1923 को रायपुर, छत्तीसगढ़ में हुआ; वास्तविक नाम हबीब अहमद खान था।
1950 के दशक में लंदन से आधुनिक रंगमंच की शिक्षा लेकर लौटे, लेकिन छत्तीसगढ़ की लोकनाट्य शैली 'नाचा' को अपनाया।
'चरणदास चोर' अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान पाने वाला पहला भारतीय नाटक बना।
पद्मश्री , पद्म विभूषण , संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप और फ्रांस के सांस्कृतिक सम्मान से नवाजे गए; राज्यसभा सदस्य भी रहे।
8 जून 2009 को भोपाल में निधन हुआ।

भारतीय रंगमंच के शिखर पुरुष हबीब तनवीर की आज 8 जून 2025 को पुण्यतिथि है। 8 जून 2009 को भोपाल में उनका निधन हुआ था, लेकिन उनकी रंग-परंपरा आज भी उतनी ही जीवंत है। जिस दौर में लंदन से लौटे रंगकर्मी से पश्चिमी थिएटर की नकल की उम्मीद की जा रही थी, उन्होंने उलटी राह चुनी — छत्तीसगढ़ के गाँवों की ओर रुख किया और वहाँ के साधारण लोक कलाकारों को दुनिया के मंच तक पहुँचाया।

प्रारंभिक जीवन और साहित्यिक रुझान

हबीब तनवीर का जन्म 1 सितंबर 1923 को रायपुर, छत्तीसगढ़ में हुआ था। उनका वास्तविक नाम हबीब अहमद खान था। बचपन से ही कविता और साहित्य उनकी रगों में बसे थे — वे 'तनवीर' उपनाम से शायरी लिखते थे, और धीरे-धीरे यही नाम उनकी स्थायी पहचान बन गया। उनके पिता उन्हें एक बड़े सरकारी अधिकारी के रूप में देखना चाहते थे, लेकिन हबीब ने पढ़ाई के दौरान ही तय कर लिया था कि उनका जीवन रंगमंच और रचनात्मकता को समर्पित रहेगा।

पत्रकारिता से रंगमंच तक का सफर

करियर की शुरुआत उन्होंने पत्रकारिता और रेडियो से की। मुंबई पहुँचने के बाद उन्होंने कई पत्र-पत्रिकाओं में काम किया और ऑल इंडिया रेडियो से भी जुड़े। इसी दौर में उनका संपर्क इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (IPTA) से हुआ, जो उस समय देश में जनवादी रंगमंच का सबसे बड़ा आंदोलन था। IPTA के साथ काम करते हुए उन्होंने समझा कि नाटक केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज को जगाने का सशक्त माध्यम भी हो सकता है।

लंदन से लौटकर गाँवों में खोजी असली ताकत

रंगमंच के प्रति अपनी लगन को और गहरा करने के लिए वे 1950 के दशक में लंदन गए, जहाँ उन्होंने आधुनिक थिएटर की बारीकियाँ और मंचन की तकनीकें सीखीं। यूरोप के विश्व रंगमंच को करीब से देखने के बाद जब वे भारत लौटे, तो उन्होंने वह रास्ता चुना जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। रायपुर लौटकर उन्होंने छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध लोकनाट्य शैली 'नाचा' को गहराई से देखा-समझा। गाँवों के साधारण कलाकारों में उन्होंने वह प्रतिभा पहचानी जिसे बड़े शहरों के मंचों पर कभी जगह नहीं मिली थी। इसके बाद उन्होंने इन्हीं लोक कलाकारों को अपनी मंडली में शामिल किया और नए प्रयोगों की शुरुआत की।

यादगार नाटक और अंतरराष्ट्रीय पहचान

हबीब तनवीर ने 'आगरा बाजार', 'मिट्टी की गाड़ी', 'चरणदास चोर', 'पोंगा पंडित', 'जिन लाहौर नइ देख्या' और 'गांव का नाम ससुराल, मोर नाम दामाद' जैसे कालजयी नाटकों का निर्माण किया। इन नाटकों की विशेषता यह थी कि इनमें लोकभाषा, लोकगीत, लोकसंगीत और आम जन-जीवन की झलक मिलती थी। 'चरणदास चोर' अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान पाने वाला पहला भारतीय नाटक बना — यह उपलब्धि भारतीय लोक रंगमंच की वैश्विक स्वीकृति का प्रतीक थी।

सम्मान, पुरस्कार और विरासत

उनके अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, पद्मश्री, संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप और पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। फ्रांस सरकार ने भी उन्हें अपने प्रतिष्ठित सांस्कृतिक सम्मान से नवाजा। वे राज्यसभा के सदस्य भी रहे। 8 जून 2009 को भोपाल में उनके निधन के साथ भारतीय रंगमंच ने अपना एक युग खो दिया, लेकिन उनके द्वारा प्रशिक्षित लोक कलाकार और उनकी नाट्य-दृष्टि आज भी रंगमंच की नई पीढ़ी को राह दिखाती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

तनवीर ने 'नाचा' जैसी उपेक्षित लोक परंपरा को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रतिष्ठित किया। आज जब लोक कलाओं के संरक्षण की बात होती है, तो यह सवाल प्रासंगिक है कि क्या उनके बाद कोई ऐसा रंगकर्मी उभरा जिसने गाँव के कलाकार को उतनी ही गरिमा दी। उनकी पुण्यतिथि पर यह स्मरण ज़रूरी है कि असली सांस्कृतिक कूटनीति डिग्रियों से नहीं, जड़ों से जुड़कर होती है।
RashtraPress
23 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

हबीब तनवीर कौन थे और उन्हें क्यों याद किया जाता है?
हबीब तनवीर भारतीय रंगमंच के अग्रणी नाटककार और निर्देशक थे, जिन्होंने छत्तीसगढ़ की लोक परंपराओं को विश्व मंच तक पहुँचाया। उनका 'चरणदास चोर' अंतरराष्ट्रीय सम्मान पाने वाला पहला भारतीय नाटक बना और उन्हें पद्म विभूषण सहित कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिले।
हबीब तनवीर का निधन कब और कहाँ हुआ?
हबीब तनवीर का निधन 8 जून 2009 को भोपाल में हुआ। उनकी पुण्यतिथि हर वर्ष 8 जून को मनाई जाती है।
हबीब तनवीर ने लंदन से लौटने के बाद कौन-सा रास्ता चुना?
1950 के दशक में लंदन से आधुनिक रंगमंच की शिक्षा लेकर लौटने के बाद उन्होंने पश्चिमी शैली अपनाने की बजाय छत्तीसगढ़ के गाँवों का रुख किया। वहाँ की लोकनाट्य शैली 'नाचा' और ग्रामीण कलाकारों को अपनी मंडली में शामिल कर उन्होंने एक नई रंग-परंपरा की नींव रखी।
हबीब तनवीर के प्रमुख नाटक कौन-से हैं?
उनके प्रमुख नाटकों में 'आगरा बाजार', 'मिट्टी की गाड़ी', 'चरणदास चोर', 'पोंगा पंडित', 'जिन लाहौर नइ देख्या' और 'गांव का नाम ससुराल, मोर नाम दामाद' शामिल हैं। इन सभी नाटकों में लोकभाषा, लोकगीत और आम जन-जीवन की झलक मिलती है।
हबीब तनवीर को कौन-कौन से पुरस्कार मिले?
उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, पद्मश्री, संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप और पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। फ्रांस सरकार ने भी उन्हें अपने प्रतिष्ठित सांस्कृतिक सम्मान से नवाजा और वे राज्यसभा के सदस्य भी रहे।
राष्ट्र प्रेस
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