गुलशन बावरा: 'बावरी' वेशभूषा से मिला अमर नाम, 'मेरे देश की धरती' से बने हिंदी सिनेमा के अमर गीतकार
सारांश
मुख्य बातें
गुलशन बावरा — हिंदी सिनेमा के उन विरले गीतकारों में से एक, जिन्होंने विभाजन की त्रासदी से उठकर मुंबई की संघर्षभरी गलियों में अपनी कलम को तराशा और 240 से भी कम गीतों में एक ऐसी विरासत छोड़ी जो दशकों बाद भी गूँजती है। उनका असली नाम गुलशन कुमार मेहता था, और 'बावरा' उपनाम उन्हें एक फिल्म डिस्ट्रीब्यूटर की हँसी-ठिठोली से मिला — जो आगे चलकर उनकी पहचान बन गया।
विभाजन से मुंबई तक का सफर
गुलशन बावरा का जन्म 12 अप्रैल 1937 को शेखूपुरा (लाहौर से लगभग 30 किलोमीटर दूर, अब पाकिस्तान) में हुआ था। 1947 के विभाजन की विभीषिका ने उनके परिवार को उजाड़ दिया। इसके बाद उनकी बड़ी बहन ने जयपुर में उनका पालन-पोषण किया। युवावस्था में वे दिल्ली आए, जहाँ दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई के दौरान उनके भीतर कविता का अंकुर फूटा।
सपनों की उड़ान के बावजूद, व्यावहारिक जीवन की माँग ने उन्हें रेलवे में नौकरी के लिए आवेदन करने पर मजबूर किया। कोटा, राजस्थान में पोस्टिंग मिली, लेकिन पद पहले ही भर चुका था। किस्मत ने रुख बदला और 1955 में वे मुंबई पहुँचे, जहाँ उन्हें रेलवे क्लर्क की नौकरी मिल गई। दफ्तर के घंटों के बाद स्टूडियो के दरवाजे खटखटाना उनकी दिनचर्या बन गई।
'बावरा' नाम की अनोखी कहानी
मुंबई के उन्हीं संघर्षपूर्ण दिनों में गुलशन एक अन्य उभरते कलाकार के साथ कमरा साझा करते थे — वे कोई और नहीं, बल्कि आगे चलकर महान गीतकार बनने वाले गुलज़ार थे। स्टूडियो के चक्करों ने उन्हें संगीतकार कल्याणजी से मिलवाया, जिन्होंने 1959 की फिल्म 'चंद्रसेना' में उन्हें पहला मौका दिया।
उसी वर्ष फिल्म 'सट्टा बाजार' के दौरान वह घटना घटी जिसने उनका नाम हमेशा के लिए बदल दिया। गुलशन की आदत थी चटख, रंग-बिरंगी शर्टें पहनने की और बाल अक्सर बिखरे रहते थे। इस अनोखी वेशभूषा को देखकर फिल्म के डिस्ट्रीब्यूटर शांतिभाई पटेल ने मजाकिया लहजे में कहा कि यह लड़का तो बिल्कुल 'बावरा' दिखता है। यह संबोधन गुलशन को इतना भाया कि उन्होंने इसे अपनी स्थायी पहचान बना लिया।
'मेरे देश की धरती' और ऐतिहासिक राष्ट्रगीत की रचना
गुलशन बावरा के गीतों में आम आदमी की सरल भाषा और गहरी दार्शनिकता का अद्भुत संगम था। अभिनेता-निर्देशक मनोज कुमार की 1967 की फिल्म 'उपकार' के लिए लिखा गीत 'मेरे देश की धरती' इसका सर्वश्रेष्ठ प्रमाण है। कहा जाता है कि मनोज कुमार ने एक बार गुलशन बावरा को किसी तीर्थ स्थान से लौटते वक्त कुछ पंक्तियाँ गुनगुनाते सुना था। वर्षों बाद जब 'उपकार' बन रही थी, तो मनोज कुमार ने उनसे उसी भाव और धुन पर गीत लिखने की जिद की — और इस जिद ने हिंदी सिनेमा को एक कालजयी राष्ट्रगीत दे दिया।
इस गीत के लिए गुलशन बावरा को 1968 में सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। इसके बाद 1974 में फिल्म 'जंजीर' के गीत 'यारी है ईमान मेरी' के लिए भी उन्हें यही सम्मान प्राप्त हुआ।
आरडी बर्मन के साथ संगीत की जुगलबंदी
1975 के बाद गुलशन बावरा और संगीतकार आरडी बर्मन (पंचम दा) की जोड़ी ने हिंदी संगीत में नए आयाम स्थापित किए। दोनों स्वभाव से मस्तमौला थे और उनकी मित्रता संगीत कक्ष से निजी जीवन तक फैली हुई थी। 'कसमे वादे निभाएंगे हम' चार्टबस्टर बना, 'प्यार हमें किस मोड़ पे' युवाओं का एंथम बना, और 'चाँदी की दीवार न तोड़ी' उनकी दार्शनिक गहराई का प्रमाण बना।
गुलशन बावरा केवल गीतकार नहीं थे — उन्होंने 'जंजीर', 'उपकार', 'पवित्र पापी', 'लफंगे' और पंजाबी फिल्मों 'जीजा जी' तथा 'नौकर बीवी दा' सहित कुल 21 फिल्मों में अभिनय भी किया। 'जंजीर' के गीत 'दीवाने हैं दीवानों को ना घर चाहिए' में वे खुद स्क्रीन पर हारमोनियम बजाते नजर आए।
विरासत और अंतिम विदाई
अपने 42 वर्षों के सुनहरे करियर में गुलशन बावरा ने गुणवत्ता को मात्रा पर सदा तरजीह दी और केवल लगभग 240 गीत लिखे — फिर भी उनमें से कई आज भी भारतीय स्मृति में अमिट हैं। 7 अगस्त 2009 को 72 वर्ष की आयु में, पाली हिल, मुंबई स्थित अपने निवास पर हृदय गति रुकने से इस महान कलाकार का निधन हो गया। उनके गीत आज भी हर पीढ़ी को यह याद दिलाते हैं कि शब्दों की ताकत किसी भी सरहद से बड़ी होती है।