क्या संगीत जगत के 'गणगंधर्वन' ने 50 हजार से अधिक गानों को आवाज दी है?
सारांश
Key Takeaways
- के.जे. येसुदास ने 50 हजार से अधिक गाने गाए हैं।
- उन्हें 8 राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिले हैं।
- उन्होंने 1980 में थरंगिनी स्टूडियो की स्थापना की।
- उनकी आवाज में अनोखी मिठास है।
- येसुदास को 'गणगंधर्वन' के नाम से जाना जाता है।
मुंबई, 9 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। संगीत जगत के प्रसिद्ध गायक, जिनकी आवाज में अद्वितीय मिठास और गहरी भावनाएं समाहित हैं। उनकी गायकी इतनी आकर्षक है कि उन्हें 'गणगंधर्वन' के नाम से भी जाना जाता है। छह दशकों से अधिक के शानदार करियर में, उन्होंने कई भाषाओं में 50 हजार से अधिक गाने गाए हैं।
10 जनवरी 1940 को केरल में जन्मे प्लेबैक सिंगर के.जे. येसुदास (कट्टाससेरी जोसेफ येसुदास) को उनकी मधुर और अद्वितीय आवाज के लिए 'गणगंधर्वन' (दिव्य गायक) कहा जाता है। उनके करियर में उन्होंने मलयालम, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, हिंदी, ओडिया, बंगाली, मराठी और यहां तक कि अरबी, अंग्रेजी, लैटिन और रूसी जैसी भाषाओं में भी 50 हजार से अधिक गाने रिकॉर्ड किए हैं। यह उपलब्धि उन्हें भारतीय संगीत के इतिहास में सबसे महान गायकों में से एक बनाती है।
येसुदास के पिता ऑगस्टाइन जोसेफ एक प्रसिद्ध मलयालम शास्त्रीय गायक और मंच अभिनेता थे, जो उनके पहले गुरु बने। महज 7 साल की उम्र में येसुदास ने फोर्ट कोची में एक स्थानीय प्रतियोगिता में भाग लेकर स्वर्ण पदक जीता। इसके बाद उन्होंने चेम्बई वैद्यनाथ भगवतर जैसे महान गुरु से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली। उन्होंने 1961 में फिल्म 'कालपादुकल' से प्लेबैक सिंगिंग में कदम रखा।
येसुदास का करियर 196019701971 में फिल्म 'जय जवान जय किसान' से हिंदी में डेब्यू किया। 1975 में आई फिल्म 'छोटी सी बात' में गाना 'जानेमन जानेमन' ने उन्हें प्रसिद्धि दिलाई। वही, 1976'चितचोर' का गाना 'गोरी तेरा गांव बड़ा प्यारा' उनके करियर में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुआ।
वह एक ही दिन में 10 से अधिक गाने रिकॉर्ड करने का रिकॉर्ड रखते हैं। 1970-80पुरस्कारों8 बार नेशनल फिल्म अवॉर्ड (सर्वश्रेष्ठ मेल प्लेबैक सिंगर) जीते हैं। इसके अलावा, 5 फिल्मफेयर साउथ अवार्ड्स और 30 से ज्यादा स्टेट अवार्ड्स (केरल, तमिलनाडु, आंध्र, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल) भी प्राप्त किए हैं। भारत सरकार ने उन्हें 1975पद्म श्री, 2002पद्म भूषण और 2017 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया। इतने पुरस्कार मिलने पर उन्होंने एक इवेंट में मजाकिया अंदाज में कहा था कि अब उन्हें पुरस्कार न दें, क्योंकि ये बहुत हो गए।
येसुदास ने 1980 में थरंगिनी स्टूडियो की स्थापना की, जो मलयालम संगीत को स्टीरियो में लाने वाला पहला स्टूडियो था।