मनोज बाजपेयी का बड़ा सवाल: 'जो समाज पर चुप रहें, उन्हें स्टार क्यों मानते हैं?'
सारांश
मुख्य बातें
अभिनेता मनोज बाजपेयी ने 2 नवंबर 2026 को मुंबई के अंधेरी पश्चिम स्थित मुक्ति ऑडिटोरियम में आयोजित तहजीब कार्यक्रम में बॉलीवुड की सामाजिक चुप्पी पर तीखा सवाल दागा — 'जो लोग जनता के मुद्दों पर खामोश रहते हैं, उन्हें आप स्टार ही क्यों मानते हैं?' यह टिप्पणी संपादक संजय शर्मा के उस सवाल के जवाब में आई, जिसमें उन्होंने पूछा था कि फिल्मी सितारे सामाजिक संकटों के वक्त मौन क्यों साध लेते हैं। बाजपेयी ने किसी एक अभिनेता को निशाना बनाने की बजाय पूरी स्टार संस्कृति के सामने आईना रख दिया।
स्टारडम की परिभाषा पर छिड़ी बहस
बातचीत का केंद्र यह प्रश्न था कि स्टारडम असल में है क्या — महंगे कपड़े, चमकती तस्वीरें और सोशल मीडिया पर अनवरत मौजूदगी, या अन्याय के सामने खड़े होने का साहस? संजय शर्मा ने अमिताभ बच्चन की सोशल मीडिया सक्रियता का उल्लेख करते हुए बड़े सामाजिक मुद्दों पर उनकी कथित खामोशी की ओर ध्यान दिलाया। मनोज बाजपेयी ने किसी एक व्यक्ति पर व्यक्तिगत हमला करने से परहेज करते हुए पूरी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा किया। गौरतलब है कि यह बहस तब और प्रासंगिक हो जाती है जब फिल्म उद्योग में सामाजिक जवाबदेही को लेकर बार-बार सवाल उठते रहे हैं।
नसीरुद्दीन शाह और पीयूष मिश्रा के वैचारिक मतभेद पर बाजपेयी की राय
संजय शर्मा ने नसीरुद्दीन शाह और पीयूष मिश्रा के वैचारिक मतभेदों पर मनोज बाजपेयी से उनकी राय माँगी। बाजपेयी ने नसीरुद्दीन शाह के लिए अपने अगाध सम्मान का इज़हार करते हुए कहा कि 'अगर वह मुझे थप्पड़ भी मार दें तो मैं स्वीकार कर लूँगा।' उन्होंने साथ ही यह भी रेखांकित किया कि लोकतंत्र में प्रत्येक नागरिक को अपनी राय रखने और असहमति जाहिर करने का अधिकार है, और किसी कलाकार का खुलकर बोलना उसके विरुद्ध नहीं जाना चाहिए। समाज में अलग-अलग विचारों के लिए जगह होना जरूरी है — यह उनका स्पष्ट मत था।
फिल्म 'सहिया' की सेंसरशिप और रचनात्मक स्वतंत्रता का सवाल
कार्यक्रम का दूसरा अहम पड़ाव तब आया जब संजय शर्मा ने अपनी फिल्म 'सहिया' को केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) द्वारा प्रमाणपत्र देने से इनकार किए जाने की बात उठाई। उन्होंने बताया कि 'सहिया' मूलतः एक प्रेम कहानी है, किंतु सेंसर बोर्ड ने कथित तौर पर नक्सलवाद और आदिवासियों के शोषण जैसे आरोप लगाते हुए इसके प्रमाणन पर रोक लगा दी है। उन्होंने बाजपेयी से पूछा कि फिल्मकारों को अभिव्यक्ति की कितनी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए और क्या इस तरह की सेंसरशिप रचनात्मक आज़ादी के लिए खतरा नहीं है।
मनोज बाजपेयी ने सेंसरशिप के प्रति अपना विरोध जताते हुए संजय शर्मा के संघर्ष का पुरज़ोर समर्थन किया। उन्होंने कहा — 'आप आगे बढ़िए, हम आपके साथ हैं।' बाजपेयी ने भरोसा जताया कि जिस तरह शर्मा ने अब तक हर मोर्चे पर लड़ाई लड़ी है और एक बड़ा मीडिया नेटवर्क खड़ा किया है, उसी तरह वे इस क़ानूनी लड़ाई में भी जीतेंगे।
दर्शकों से सीधा संवाद
इस कार्यक्रम की एक खास बात यह रही कि सभागार में उपस्थित दर्शकों को भी मनोज बाजपेयी से सीधे सवाल पूछने का अवसर मिला। दर्शकों ने अभिनय, सिनेमा, बॉलीवुड, राजनीति, सामाजिक परिस्थितियों और व्यक्तिगत अनुभवों से जुड़े कई सवाल उठाए, जिनका बाजपेयी ने सहजता और बेबाकी से जवाब दिया। यह संवाद महज़ एक इंटरव्यू नहीं, बल्कि एक खुली बहस बन गई जिसने उपस्थित लोगों को गहराई से सोचने पर मजबूर किया।
आगे क्या होगा
फिल्म 'सहिया' की प्रमाणन प्रक्रिया अभी कानूनी लड़ाई के दौर में है और इसका परिणाम भारतीय सिनेमा में रचनात्मक अभिव्यक्ति की सीमाओं पर एक महत्वपूर्ण नज़ीर स्थापित कर सकता है। मनोज बाजपेयी की इस खुली पैरवी के बाद यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या बॉलीवुड के अन्य सितारे भी ऐसे मुद्दों पर सार्वजनिक रुख अपनाते हैं।