नौशाद अली: जब पिता ने संगीत या घर चुनने को कहा, ससुर ने पीढ़ी को 'बर्बाद' बताया
सारांश
मुख्य बातें
मुंबई, 4 मई। फिल्म संगीत के इतिहास में नौशाद अली का नाम अमर है — एक ऐसे संगीतकार जिन्होंने शास्त्रीय, लोक और पश्चिमी संगीत को फिल्मी परदे पर नया आयाम दिया। मगर उनकी सफलता की कहानी संघर्ष, पारिवारिक विरोध और अटूट समर्पण से भरी है। 5 मई को नौशाद की पुण्यतिथि है, और उनके जीवन के कुछ कम चर्चित प्रसंग बताते हैं कि कैसे एक पिता का विरोध और ससुर की आलोचना भी उन्हें रोक न सकी।
परिवार का संगीत से विरोध
25 दिसंबर 1919 को लखनऊ में जन्मे नौशाद के पिता वाहिद अली अदालत में मुंशी थे। उस समय परिवार में संगीत को कला के रूप में नहीं, बल्कि एक अनुचित पेशे के रूप में देखा जाता था। बचपन में नौशाद देवा शरीफ की दरगाह पर कव्वालियाँ सुनने जाते और घंटों वहीं समय बिताते थे। उन्होंने गुरबत अली, युसूफ अली और बब्बन साहिब जैसे उस्तादों से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली।
पिता की शर्त: संगीत या घर
जब नौशाद ने संगीत को अपना जीवन-कार्य बनाने का दृढ़ निश्चय किया, तो उनके पिता ने एक कठोर शर्त रख दी: