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नौशाद अली: जब पिता ने संगीत या घर चुनने को कहा, ससुर ने पीढ़ी को 'बर्बाद' बताया

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नौशाद अली: जब पिता ने संगीत या घर चुनने को कहा, ससुर ने पीढ़ी को 'बर्बाद' बताया

सारांश

नौशाद अली की जीवन-यात्रा एक ऐसे कलाकार की है जिसने परिवार के विरोध को अपनी प्रतिभा से जीता। पिता की शर्त और ससुर की आलोचना — दोनों ही उन्हें संगीत की दुनिया से दूर न कर सकीं। फिल्म संगीत में उनका योगदान आज भी अमर है।

मुख्य बातें

नौशाद अली का जन्म 25 दिसंबर 1919 को लखनऊ में हुआ था।
पिता वाहिद अली ने उन्हें 'संगीत या घर' में से एक चुनने को कहा।
1937 में नौशाद लखनऊ छोड़कर मुंबई आए और फुटपाथ पर सोना पड़ा।
1940 में फिल्म 'प्रेम नगर' से स्वतंत्र संगीतकार के रूप में शुरुआत की।
फिल्म 'रतन' ने उनकी किस्मत बदली; तनख्वाह 75 रुपए से 25 हजार रुपए हो गई।
शादी के समय ससुर ने उनके गाने को 'पीढ़ी को बर्बाद करने वाला' बताया।

मुंबई, 4 मई। फिल्म संगीत के इतिहास में नौशाद अली का नाम अमर है — एक ऐसे संगीतकार जिन्होंने शास्त्रीय, लोक और पश्चिमी संगीत को फिल्मी परदे पर नया आयाम दिया। मगर उनकी सफलता की कहानी संघर्ष, पारिवारिक विरोध और अटूट समर्पण से भरी है। 5 मई को नौशाद की पुण्यतिथि है, और उनके जीवन के कुछ कम चर्चित प्रसंग बताते हैं कि कैसे एक पिता का विरोध और ससुर की आलोचना भी उन्हें रोक न सकी।

परिवार का संगीत से विरोध

25 दिसंबर 1919 को लखनऊ में जन्मे नौशाद के पिता वाहिद अली अदालत में मुंशी थे। उस समय परिवार में संगीत को कला के रूप में नहीं, बल्कि एक अनुचित पेशे के रूप में देखा जाता था। बचपन में नौशाद देवा शरीफ की दरगाह पर कव्वालियाँ सुनने जाते और घंटों वहीं समय बिताते थे। उन्होंने गुरबत अली, युसूफ अली और बब्बन साहिब जैसे उस्तादों से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली।

पिता की शर्त: संगीत या घर

जब नौशाद ने संगीत को अपना जीवन-कार्य बनाने का दृढ़ निश्चय किया, तो उनके पिता ने एक कठोर शर्त रख दी:

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि शास्त्रीय और लोक संगीत को फिल्मी माध्यम में इतनी गहराई से घोला कि वह कला का एक नया रूप बन गया। आज जब हम 'रतन', 'अनमोल रतन' या 'मिरज़ा गालिब' का संगीत सुनते हैं, तो हम उस विरोध का भी सम्मान करते हैं जिसे नौशाद ने अपनी प्रतिभा से परास्त किया।
RashtraPress
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

नौशाद अली के पिता को संगीत से क्यों समस्या थी?
नौशाद के पिता वाहिद अली अदालत में मुंशी थे और परिवार संगीत को एक अनुचित पेशे मानता था। उस समय सामाजिक रूढ़िवाद में संगीत को सम्मानजनक कार्य नहीं माना जाता था, इसलिए पिता ने नौशाद को संगीत और घर में से एक चुनने को कहा।
नौशाद मुंबई कब आए और शुरुआत कैसी थी?
1937 में नौशाद लखनऊ से मुंबई आए। शुरुआती दिनों में उन्हें बहुत संघर्ष करना पड़ा — कुछ दिन परिचितों के यहाँ रहे और फिर दादर के ब्रॉडवे थिएटर के सामने फुटपाथ पर सोना पड़ा। बाद में उस्ताद झंडे खां से संगीत सीखा और न्यू थिएटर के ऑर्केस्ट्रा में पियानो वादक के रूप में काम किया।
नौशाद की सफलता का टर्निंग पॉइंट क्या था?
1940 में फिल्म 'प्रेम नगर' से स्वतंत्र संगीतकार के रूप में शुरुआत की, लेकिन असली सफलता 1942 में फिल्म 'रतन' से मिली। इस फिल्म ने उनकी तनख्वाह 75 रुपए से बढ़ाकर 25 हजार रुपए कर दी।
ससुर की आलोचना की घटना क्या थी?
शादी के समय नौशाद के निकाह पर लाउडस्पीकर से उनका गाना 'आंखिया मिला के जिया भरमा के चले नहीं...' बज रहा था। ससुर इस गाने को सुनकर नाराज हो गए और कहने लगे कि ऐसे गाने नई पीढ़ी को बर्बाद कर रहे हैं। नौशाद खामोश रहे और यह नहीं बताया कि यह गाना उनका ही है।
नौशाद ने किन गायकों को नई ऊंचाई दी?
नौशाद ने मोहम्मद रफी, लता मंगेशकर और सुरैया जैसे महान गायकों को नई ऊंचाई दी। उन्होंने शास्त्रीय, लोक और पश्चिमी संगीत का सुंदर मेल फिल्मी संगीत में किया।
राष्ट्र प्रेस
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