'बैजू बावरा' के प्रीमियर पर नौशाद अली की भावुक पल: 16 साल की मेहनत का फल

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'बैजू बावरा' के प्रीमियर पर नौशाद अली की भावुक पल: 16 साल की मेहनत का फल

सारांश

नौशाद अली की पुण्यतिथि पर एक भावुक यादें: जब दादर के ब्रॉडवे थिएटर में 'बैजू बावरा' का प्रीमियर चल रहा था, तब बालकनी में खड़े नौशाद की आँखों से खुशी के आँसू बहे। 'फुटपाथ के उस पार से इस थिएटर तक आने में 16 साल लग गए' — यह एक गरीब लड़के की सफलता की अविस्मरणीय गाथा है।

मुख्य बातें

5 अक्टूबर 1952 को दादर के ब्रॉडवे थिएटर में 'बैजू बावरा' का प्रीमियर हुआ, जहाँ नौशाद ने 16 साल की मेहनत का जश्न मनाया।
25 दिसंबर 1919 को लखनऊ में जन्मे नौशाद अली फिल्म संगीत के दिग्गज बने।
'प्यार किया तो डरना क्या' ( मुगल-ए-आजम ), 'मतवाला जिया डोले' ( मदर इंडिया ) उनके अमर गीत हैं।
1981 में दादासाहेब फाल्के पुरस्कार और 1992 में पद्मभूषण से सम्मानित।
5 मई 2006 को उनका निधन, लेकिन उनके गीत आज भी अमर हैं।

मुंबई, 5 मई। भारतीय फिल्म संगीत के दिग्गज नौशाद अली का जीवन संघर्ष और सफलता की एक अविस्मरणीय गाथा है। आज उनकी पुण्यतिथि है। उनके करियर का सबसे भावुक क्षण 5 अक्टूबर 1952 को आया, जब उनकी कालजयी फिल्म बैजू बावरा का प्रीमियर दादर के ब्रॉडवे थिएटर में हुआ। इसी दिन नौशाद की आँखों से खुशी के आँसू बहे, जब उन्हें एहसास हुआ कि गरीबी के दिनों से निकलकर वह फिल्म संगीत के शिखर पर पहुँच गए हैं।

थिएटर की बालकनी में खड़े नौशाद फफक-फफक कर रो रहे थे। निर्देशक विजय भट्ट ने जब उनसे रोने का कारण पूछा, तो नौशाद ने आँसू पोंछते हुए कहा, "फुटपाथ के उस पार से इस थिएटर तक आने में मुझे 16 साल लग गए।" यह जवाब न केवल उनकी व्यक्तिगत यात्रा का प्रमाण था, बल्कि हज़ारों संघर्षशील कलाकारों के लिए प्रेरणा भी बन गया।

गरीबी से शिखर तक का सफर

25 दिसंबर 1919 को लखनऊ में जन्मे नौशाद अली के पिता वाहिद अली एक अदालती मुंशी थे। बचपन में देवा शरीफ की दरगाह पर कव्वालियों को सुनकर उनका मन संगीत की ओर झुक गया। उन्होंने शास्त्रीय, लोक और पश्चिमी संगीत का एक अद्वितीय मिश्रण तैयार किया, जिसने उन्हें भारतीय फिल्म संगीत में अमर बना दिया।

बैजू बावरा: नौशाद की सबसे बड़ी कृति

बैजू बावरा को नौशाद का सबसे महत्वपूर्ण काम माना जाता है। इस फिल्म के गीत 'झूले में पवन' और 'आज गावत मन में' आज भी श्रोताओं के दिलों में जीवंत हैं। इसी फिल्म के लिए उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। इसके बाद मदर इंडिया, मुगल-ए-आजम, गंगा जमुना और मेरी महबूब जैसी महान फिल्मों में उन्होंने अपना जादुई संगीत दिया।

अमर संगीत की विरासत

मुगल-ए-आजम का 'प्यार किया तो डरना क्या' आज भी रोमांटिक गीतों में सर्वोच्च स्थान पर माना जाता है। मदर इंडिया का 'मतवाला जिया डोले' और राम और श्याम का 'आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले' उनकी प्रतिभा के उज्ज्वल उदाहरण हैं। नौशाद ने लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी, मुकेश और सुरैया जैसे महान गायकों को अविस्मरणीय गीत दिए। पाकीजा के लिए उन्होंने गुलाम मोहम्मद के अधूरे संगीत को पूरा करने का महत्वपूर्ण काम भी किया।

फिल्मों में उनका योगदान

हालाँकि नौशाद ने सौ से कम फिल्मों में काम किया, लेकिन उनकी अधिकांश फिल्में सिल्वर जुबली और गोल्डन जुबली मनाने में सफल रहीं। अनमोल घड़ी, शाहजहां, आन, दास्तान और साथी जैसी फिल्में उनके संगीतात्मक कौशल के बेहतरीन उदाहरण हैं। उनके संगीत में लोक की सुगंध, शास्त्रीय संगीत की गहराई और पश्चिमी ऑर्केस्ट्रेशन की चमक तीनों ही साफ़ दिखाई देती थीं।

सम्मान और पुरस्कार

संगीत की सेवा के लिए नौशाद को 1981 में दादासाहेब फाल्के पुरस्कार और 1992 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। भारतीय डाक विभाग ने भी उनके नाम पर एक स्मारक डाक टिकट जारी किया। उन्होंने शायरी भी लिखी और 'आठवां सुर' नामक एक किताब प्रकाशित की, जिसमें उन्होंने अपनी जीवन यात्रा का विवरण दिया।

विदाई और अमर विरासत

5 मई 2006 को इस महान संगीतकार ने दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन उनके गीत आज भी लोगों के दिलों में गूंजते हैं और नई पीढ़ी को संगीत की सीख देते रहते हैं। नौशाद अली का जीवन हर उस कलाकार के लिए प्रेरणा है जो गरीबी और संघर्ष से निकलकर अपने सपनों को पंख देना चाहता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

तो वह केवल अपनी जीत नहीं, बल्कि एक पूरी परंपरा की विजय का जश्न मना रहे थे। शास्त्रीय, लोक और पश्चिमी संगीत का उनका अद्वितीय मिश्रण ने भारतीय फिल्मों को सांस्कृतिक वैधता दी। आज जब हम उनके गीतों को सुनते हैं, तो हम न केवल संगीत सुनते हैं, बल्कि एक संस्कृति की आत्मा को समझते हैं। उनकी विरासत यह सिद्ध करती है कि कला की असली शक्ति न तो धन में है और न ही प्रसिद्धि में — वह मानवीय आत्मा को छूने की क्षमता में है।
RashtraPress
14 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

नौशाद अली 'बैजू बावरा' के प्रीमियर पर क्यों रो रहे थे?
नौशाद अली 'बैजू बावरा' के प्रीमियर पर इसलिए रो रहे थे क्योंकि वह अपनी 16 साल की कड़ी मेहनत और संघर्ष की सफलता को देख रहे थे। उन्होंने निर्देशक विजय भट्ट से कहा कि 'फुटपाथ के उस पार से इस थिएटर तक आने में मुझे 16 साल लग गए।' यह गरीबी से सफलता तक की उनकी व्यक्तिगत यात्रा का प्रतीक था।
नौशाद अली का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
नौशाद अली का जन्म 25 दिसंबर 1919 को लखनऊ में हुआ था। उनके पिता वाहिद अली एक अदालती मुंशी थे। बचपन में देवा शरीफ की दरगाह पर कव्वालियों को सुनकर उनका मन संगीत की ओर झुक गया।
नौशाद अली के सबसे प्रसिद्ध गीत कौन-से हैं?
नौशाद अली के सबसे प्रसिद्ध गीतों में 'प्यार किया तो डरना क्या' (मुगल-ए-आजम), 'मतवाला जिया डोले' (मदर इंडिया), 'झूले में पवन' (बैजू बावरा) और 'आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले' (राम और श्याम) शामिल हैं। ये गीत आज भी लोगों के दिलों में जीवंत हैं।
नौशाद अली को कौन-से प्रमुख पुरस्कार मिले?
नौशाद अली को 1981 में दादासाहेब फाल्के पुरस्कार और 1992 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। भारतीय डाक विभाग ने भी उनके नाम पर एक स्मारक डाक टिकट जारी किया। वह फिल्मफेयर पुरस्कार के भी विजेता थे।
नौशाद अली का निधन कब हुआ?
नौशाद अली का निधन 5 मई 2006 को हुआ। हालाँकि वह शारीरिक रूप से चले गए, लेकिन उनके संगीत आज भी लोगों के दिलों में गूंजते हैं और नई पीढ़ी को प्रेरित करते रहते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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