रीता भादुड़ी: 'जूली' से 'राजा' तक, 70 फिल्मों और 30 टीवी शोज में सपोर्टिंग रोल की बेमिसाल कलाकार
सारांश
मुख्य बातें
अभिनेत्री रीता भादुड़ी हिंदी सिनेमा की उन विरल कलाकारों में शुमार थीं, जिन्होंने मुख्य भूमिका के बिना भी दर्शकों के दिलों में स्थायी जगह बनाई। 1975 की फिल्म 'जूली' में नायिका की सहेली के किरदार से चर्चा में आईं रीता ने 'राजा' (1995) में अपने अभिनय के लिए फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री पुरस्कार जीतकर साबित किया कि सपोर्टिंग रोल में भी शिखर छुआ जा सकता है। लगभग पाँच दशक के करियर में उन्होंने करीब 70 फिल्मों और 30 से अधिक टीवी शोज में काम किया।
प्रारंभिक जीवन और प्रशिक्षण
4 नवंबर 1955 को लखनऊ में जन्मीं रीता भादुड़ी का नाता कला की दुनिया से विरासत में था — उनकी माँ चंद्रिमा भादुड़ी भी अभिनेत्री थीं। रीता ने पुणे स्थित प्रतिष्ठित फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII) से अभिनय की विधिवत पढ़ाई की, जो उनकी तकनीकी दक्षता की नींव बनी। 1968 में फिल्म 'तेरी तलाश में' से उन्होंने अपने करियर का पहला कदम रखा।
मुख्य फ़िल्मी सफर: 'जूली' से 'राजा' तक
1975 में आई फिल्म 'जूली' ने रीता को पहली बड़ी पहचान दिलाई। इस फिल्म में वह नायिका की सहेली के रूप में नजर आईं और फिल्म का गाना 'ये रातें नई पुरानी' भी उन पर फिल्माया गया। भूमिका भले ही सीमित थी, लेकिन दर्शकों ने उन पर ध्यान दिया। इसके बाद उन्होंने 'सावन को आने दो' (1979), 'विश्वनाथ', 'अनुरोध', 'अंखियों के झरोखों से', 'किताब' और 'गोपाल कृष्ण' जैसी फिल्मों में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं।
उनकी बहुमुखी प्रतिभा हिंदी फिल्मों तक सीमित नहीं रही। उन्होंने गुजराती और अन्य क्षेत्रीय फिल्मों में भी काम किया, और मलयालम फिल्म 'कन्याकुमारी' में अभिनेता कमल हासन के साथ उनकी भूमिका को भी करियर की अहम उपलब्धि माना जाता है।
1990 के दशक में रीता ने कई बड़े बैनरों की फिल्मों में काम किया — 'बेटा', 'हीरो नंबर 1', 'कभी हां कभी ना', 'तमन्ना', 'क्या कहना' और 'दिल विल प्यार व्यार' उनमें शामिल हैं। 1995 में रिलीज 'राजा' उनके करियर का सबसे चर्चित मील का पत्थर बनी। माधुरी दीक्षित और संजय कपूर के साथ इस फिल्म में उनके अभिनय को भरपूर सराहना मिली और उन्हें फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री पुरस्कार से नवाजा गया।
टेलीविजन पर छाप
फिल्मों के समानांतर रीता ने छोटे पर्दे पर भी लगातार सक्रिय रहीं। 'अमानत', 'हसरतें', 'एक महल हो सपनों का', 'कुमकुम', 'छोटी बहू', 'खिचड़ी' और 'साराभाई वर्सेस साराभाई' उनके उल्लेखनीय शोज में गिने जाते हैं। कॉमेडी से लेकर पारिवारिक ड्रामा तक, उन्होंने माँ, सास और दादी जैसी भूमिकाओं में विविधता के साथ अभिनय किया। गौरतलब है कि टेलीविजन पर उनकी यह मौजूदगी तीन दशकों में फैली रही।
उनके अंतिम चर्चित किरदारों में टीवी शो 'निमकी मुखिया' की इमरती देवी शामिल थीं, जिसमें वह परिवार की बुजुर्ग स्त्री के रूप में नजर आईं। 2017 में उन्होंने गुजराती फिल्म 'तंबूरो' में भी काम किया।
विरासत और निधन
रीता भादुड़ी का 17 जुलाई 2018 को 62 वर्ष की आयु में निधन हो गया। यह ऐसे समय में आया जब वह अभी भी सक्रिय थीं और दर्शकों के बीच पहचानी जाती थीं। उनका करियर इस बात का प्रमाण है कि सपोर्टिंग भूमिकाएं भी किसी कलाकार की पहचान का आधार बन सकती हैं — बशर्ते उस कलाकार में हर छोटे किरदार को पूरी तैयारी के साथ जीने का हुनर हो।