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सुबोध भावे बोले — युवा कलाकार ईमानदारी से कर रहे हैं काम, 'श्री बाबा नीब करोरी महाराज' से चर्चा में

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सुबोध भावे बोले — युवा कलाकार ईमानदारी से कर रहे हैं काम, 'श्री बाबा नीब करोरी महाराज' से चर्चा में

सारांश

सुबोध भावे का मानना है कि युवा कलाकारों पर सोशल मीडिया का आरोप बेबुनियाद है — वे वर्कशॉप और नए तरीकों से खुद को माँज रहे हैं। साथ ही उन्होंने साफ किया कि 'महाराज जी' का किरदार निभाना उन्हें असल ज़िंदगी में वैसा नहीं बनाता — वे अभिनेता हैं, और आगे विलेन भी निभाएँगे।

मुख्य बातें

अभिनेता सुबोध भावे इन दिनों फिल्म 'श्री बाबा नीब करोरी महाराज' को लेकर चर्चा में हैं।
भावे के अनुसार आज के युवा कलाकार वर्कशॉप और नए तरीकों से खुद को बेहतर बना रहे हैं — सोशल मीडिया कला की गिरावट की वजह नहीं।
उन्होंने कहा कि कमर्शियल और कलात्मक सिनेमा का अंतर उनके लिए कभी मायने नहीं रखता — वे किरदार की उत्साहवर्धक क्षमता देखते हैं।
आध्यात्मिक किरदार निभाने के बाद भी भावे ने स्पष्ट किया — वे अभिनेता हैं, महाराज जी नहीं; आगे नकारात्मक भूमिकाएँ भी संभव।
एक अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी के उदाहरण से उन्होंने सार्वजनिक हस्तियों की सामाजिक जिम्मेदारी पर ज़ोर दिया।

अभिनेता सुबोध भावे इन दिनों अपनी फिल्म 'श्री बाबा नीब करोरी महाराज' को लेकर चर्चा में हैं। मुंबई में एक विशेष बातचीत में उन्होंने कहा कि आज की युवा पीढ़ी के पास पहले की तुलना में कहीं बेहतर संसाधन उपलब्ध हैं और वे उनका सदुपयोग भी कर रहे हैं। उनका यह नज़रिया उस बहस के बीच आया है जिसमें सोशल मीडिया को अक्सर कला में गिरावट का कारण बताया जाता है।

युवा पीढ़ी और संसाधनों पर सुबोध का नज़रिया

भावे ने कहा, 'अगर हमारे जमाने में भी सोशल मीडिया होता, तो शायद हम भी उसका इसी तरह इस्तेमाल करते। युवा कलाकार पूरी ईमानदारी से, अपने ही तरीके से खुद को तलाशने और निखारने की कोशिश कर रहे हैं।' उनके अनुसार सोशल मीडिया को किसी भी कला में गिरावट की वजह नहीं माना जा सकता, क्योंकि यह आज के दौर में हर किसी की ज़िंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है।

उन्होंने आगे जोड़ा, 'मैं अक्सर देखता हूँ कि युवा कलाकार सिर्फ सोशल मीडिया पर वक्त नहीं बिताते, बल्कि वे अभिनय की बारीकियों को सीखने के लिए वर्कशॉप में हिस्सा लेते हैं, दूर-दराज की जगहों पर जाते हैं और खुद को बेहतर बनाने के नए-नए तरीके खोजते हैं।'

व्यावसायिक और कलात्मक सिनेमा के बीच संतुलन

सुबोध भावे को फिल्म इंडस्ट्री में व्यावसायिक और कलात्मक सिनेमा के बीच बेहतरीन संतुलन बनाने के लिए जाना जाता है। इस विषय पर उन्होंने कहा, 'हर कलाकार का अपना एक अलग सफर होता है और कला को देखने का नज़रिया भी अलग होता है। मेरे लिए कमर्शियल और कलात्मक सिनेमा का अंतर कभी मायने नहीं रखता। मैं तो बस ऐसी कहानियाँ और किरदार चुनता हूँ, जो एक अभिनेता के तौर पर मुझे उत्साहित करें।'

आध्यात्मिक किरदार और सामाजिक जिम्मेदारी

जब उनसे पूछा गया कि आध्यात्मिक किरदार निभाने के बाद दर्शक अभिनेता को असल ज़िंदगी में भी उसी छवि से जोड़ने लगते हैं — तो क्या इससे कोई सामाजिक जिम्मेदारी बनती है — भावे ने सीधे जवाब दिया। उन्होंने कहा, 'मैंने स्क्रीन पर महाराज जी का किरदार पूरी श्रद्धा, प्यार और ईमानदारी से निभाया, लेकिन असल ज़िंदगी में मैं महाराज जी नहीं हूँ। मैं एक अभिनेता हूँ और आगे भी कई तरह के किरदार निभाता रहूँगा, जिनमें कुछ विलेन या नकारात्मक भूमिकाएँ भी हो सकती हैं।'

सार्वजनिक हस्तियों के प्रभाव का उदाहरण

अपनी बात को और स्पष्ट करते हुए भावे ने एक अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया, 'मुझे याद है कि एक मशहूर खिलाड़ी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की टेबल से सॉफ्ट ड्रिंक की बोतल हटाकर पानी की बोतल रख दी थी। कुछ ही दिनों में उस कंपनी के शेयरों में गिरावट आई, क्योंकि उनके इस काम से समाज को एक संदेश गया था। इसी तरह, सार्वजनिक हस्तियों को भी अपने प्रभाव का ध्यान रखना चाहिए।' यह टिप्पणी इस बात की ओर इशारा करती है कि पर्दे और असल ज़िंदगी के बीच की रेखा दर्शकों के लिए हमेशा स्पष्ट नहीं होती, और इसीलिए कलाकार की सचेतता ज़रूरी है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो अक्सर सोशल मीडिया को 'दोषी' ठहराकर खत्म हो जाती है। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या इंडस्ट्री की संरचना — कास्टिंग काउच, नेपोटिज्म, OTT की बाढ़ — युवा प्रतिभाओं को उतना मौका दे रही है जितना संसाधन उनके पास हैं? भावे की 'ईमानदारी' वाली बात सही हो सकती है, लेकिन ईमानदारी और अवसर एक नहीं होते। आध्यात्मिक किरदार और सामाजिक जिम्मेदारी पर उनका नज़रिया जितना व्यक्तिगत है, उतना ही यह सवाल भी उठाता है कि सेलिब्रिटी-प्रभाव की नैतिक सीमा कौन तय करेगा।
RashtraPress
16 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुबोध भावे की फिल्म 'श्री बाबा नीब करोरी महाराज' किस बारे में है?
यह फिल्म प्रसिद्ध संत बाबा नीब करोरी महाराज के जीवन पर आधारित है, जिसमें सुबोध भावे मुख्य भूमिका निभा रहे हैं। फिल्म इन दिनों चर्चा में है और भावे ने इसे पूरी श्रद्धा और ईमानदारी से निभाने की बात कही है।
सुबोध भावे ने युवा कलाकारों के बारे में क्या कहा?
सुबोध भावे ने कहा कि आज के युवा कलाकारों के पास पहले की तुलना में बेहतर संसाधन और अवसर हैं, और वे वर्कशॉप तथा नए तरीकों से खुद को निखारने में लगे हैं। उनके अनुसार सोशल मीडिया को कला में गिरावट की वजह नहीं माना जाना चाहिए।
क्या सुबोध भावे आध्यात्मिक किरदार निभाने के बाद भी नकारात्मक भूमिकाएँ करेंगे?
हाँ, भावे ने स्पष्ट कहा कि वे एक अभिनेता हैं और आगे भी विभिन्न तरह के किरदार निभाएँगे, जिनमें विलेन या नकारात्मक भूमिकाएँ भी शामिल हो सकती हैं। उन्होंने कहा कि स्क्रीन पर निभाया किरदार उनकी असल पहचान नहीं है।
सुबोध भावे कमर्शियल और कलात्मक सिनेमा में से किसे प्राथमिकता देते हैं?
भावे के अनुसार उनके लिए कमर्शियल और कलात्मक सिनेमा का अंतर कभी मायने नहीं रखता। वे केवल ऐसी कहानियाँ और किरदार चुनते हैं जो उन्हें एक अभिनेता के रूप में उत्साहित करें।
सुबोध भावे ने सार्वजनिक हस्तियों की जिम्मेदारी पर क्या कहा?
भावे ने एक अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी का उदाहरण देते हुए कहा कि सार्वजनिक हस्तियों के छोटे-से काम का भी समाज पर बड़ा असर पड़ता है, इसलिए उन्हें अपने प्रभाव के प्रति सचेत रहना चाहिए।
राष्ट्र प्रेस
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