रोज़ रात खर्राटे आना हो सकता है ऑब्स्ट्रक्टिव स्लीप एपनिया का संकेत, जानें कारण और खतरे
सारांश
मुख्य बातें
रोज़ रात आने वाले तेज़ खर्राटे केवल नींद की आदत नहीं, बल्कि शरीर की एक चेतावनी हो सकते हैं। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, आज की अनियमित जीवनशैली, बढ़ता मोटापा और शारीरिक निष्क्रियता के चलते खर्राटों की समस्या तेज़ी से बढ़ रही है — और इसे नज़रअंदाज़ करना दिल की बीमारी से लेकर याददाश्त की कमज़ोरी तक कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं को न्योता दे सकता है।
खर्राटे क्यों आते हैं
मेडिकल शोध के अनुसार, खर्राटे तब उत्पन्न होते हैं जब नींद के दौरान श्वास-मार्ग पूरी तरह खुला नहीं रह पाता। सांस लेते समय हवा को नाक और गले से होते हुए फेफड़ों तक पहुँचना होता है। जब इस मार्ग में कहीं भी रुकावट आती है, तो हवा को अधिक दबाव से गुज़रना पड़ता है, जिससे गले के ऊतक (टिश्यू) कंपन करने लगते हैं। यही कंपन खर्राटों की आवाज़ बनाता है — रुकावट जितनी अधिक, आवाज़ उतनी तेज़।
मुख्य कारण
विशेषज्ञों के अनुसार, अधिक वज़न खर्राटों की सबसे प्रमुख वजहों में से एक है। शरीर में जमा अतिरिक्त चर्बी गले के आसपास भी इकट्ठा होती है, जिससे सांस का रास्ता संकरा हो जाता है। रात को सोते समय मांसपेशियाँ स्वाभाविक रूप से शिथिल पड़ती हैं, जिससे यह रुकावट और बढ़ जाती है — इसीलिए अधिक वज़न वाले लोगों में खर्राटों की शिकायत ज़्यादा देखी जाती है।
शराब का सेवन और कुछ प्रकार की नींद की दवाएँ भी इस समस्या को गहरा कर सकती हैं। चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि ये पदार्थ गले और सांस की नली की मांसपेशियों को आवश्यकता से अधिक शिथिल कर देते हैं, जिससे श्वास-मार्ग और सिकुड़ सकता है। साइनस, बार-बार होने वाली एलर्जी या नाक के अंदर की सूजन भी नाक से हवा के प्रवाह को बाधित करती है, जिससे व्यक्ति मुँह से सांस लेने लगता है — और मुँह से सांस लेने पर खर्राटों की आशंका कई गुना बढ़ जाती है।
कब होती है चिंता की ज़रूरत
डॉक्टरों का कहना है कि हल्के और कभी-कभी आने वाले खर्राटे सामान्यतः चिंता का विषय नहीं होते। लेकिन यदि खर्राटे रोज़ाना आते हों, बहुत तेज़ आवाज़ करते हों, या साथ में ये लक्षण भी दिखें — सोते समय सांस का रुकना, अचानक घुटन महसूस होना, बार-बार नींद टूटना, या सुबह उठने पर अत्यधिक थकान — तो तुरंत डॉक्टर से परामर्श लेना ज़रूरी है।
ऑब्स्ट्रक्टिव स्लीप एपनिया: सबसे गंभीर खतरा
मेडिकल शोध में जिस स्थिति को सर्वाधिक गंभीर माना जाता है, उसे ऑब्स्ट्रक्टिव स्लीप एपनिया (OSA) कहते हैं। इसमें सोते समय सांस कुछ-कुछ सेकंड के लिए बार-बार रुक जाती है। कई बार व्यक्ति को इसका एहसास भी नहीं होता, परंतु शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती। विशेषज्ञों के अनुसार, लंबे समय तक OSA के अनुपचारित रहने पर उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, याददाश्त की कमज़ोरी और दिनभर अत्यधिक नींद आने जैसी समस्याएँ गंभीर रूप ले सकती हैं।
क्या करें आगे
यह ऐसे समय में और भी प्रासंगिक है जब भारत में मोटापे और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों का बोझ तेज़ी से बढ़ रहा है। यदि खर्राटे लगातार बढ़ रहे हों या उनके साथ अन्य लक्षण भी नज़र आएँ, तो स्लीप स्टडी (पॉलीसोम्नोग्राफी) समेत उचित जाँच करवाना ज़रूरी है। समय पर निदान और उपचार से इन गंभीर जटिलताओं को काफी हद तक रोका जा सकता है।