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शलभासन से रीढ़ की हड्डी होती है मजबूत, आयुष मंत्रालय ने बताई सही विधि और सावधानियाँ

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शलभासन से रीढ़ की हड्डी होती है मजबूत, आयुष मंत्रालय ने बताई सही विधि और सावधानियाँ

सारांश

शलभासन सिर्फ एक योगमुद्रा नहीं — यह रीढ़ की हड्डी, कोर और पाचन तंत्र तीनों को एक साथ साधने का तरीका है। आयुष मंत्रालय द्वारा अनुशंसित इस आसन की सही विधि और ज़रूरी सावधानियाँ जानना हर योगाभ्यासी के लिए ज़रूरी है।

मुख्य बातें

शलभासन पेट के बल लेटकर किया जाने वाला योगासन है जो रीढ़ की हड्डी और पीठ की मांसपेशियों को मजबूत बनाता है।
आयुष मंत्रालय के अनुसार यह आसन शरीर का वजन नियंत्रित रखने और पाचन तंत्र को बेहतर बनाने में सहायक है।
इस स्थिति में 10 से 30 सेकंड तक रुकना अनुशंसित है; शुरुआती अभ्यासकर्ता एक-एक पैर से शुरुआत करें।
हल्के लोअर बैक दर्द और साइटिका में उपयोगी, लेकिन गंभीर दर्द में विशेषज्ञ की सलाह आवश्यक।
गर्भावस्था, हर्निया और पीठ/गर्दन की चोट की स्थिति में यह आसन वर्जित है।

शलभासन — जिसे अंग्रेजी में Locust Pose कहा जाता है — रीढ़ की हड्डी को मजबूत बनाने वाले सर्वश्रेष्ठ योगासनों में गिना जाता है। आयुष मंत्रालय के अनुसार, यह आसन पीठ की मांसपेशियों को सक्रिय करता है, शरीर का वजन नियंत्रित रखता है और पाचन तंत्र को भी लाभ पहुँचाता है। पेट के बल लेटकर किया जाने वाला यह आसन देखने में सरल लगता है, परंतु इसके अभ्यास के दौरान शरीर के कई हिस्से एक साथ सक्रिय होते हैं।

शलभासन क्या है और इसका नाम कैसे पड़ा

संस्कृत में 'शलभ' का अर्थ है टिड्डा (Grasshopper)। इस आसन में शरीर की मुद्रा उड़ान भरने को तैयार टिड्डे जैसी बन जाती है — छाती और पैर दोनों ज़मीन से ऊपर उठे हुए। यह बैक-स्ट्रेंथनिंग श्रेणी का एक प्रमुख आसन है जो रीढ़ के लचीलेपन और कोर की मज़बूती दोनों पर एक साथ काम करता है। गौरतलब है कि इसे अक्सर 'सुपरमैन पोज़' से तुलना की जाती है क्योंकि इसमें हाथ और पैर दोनों एक साथ ऊपर उठाए जाते हैं।

शलभासन करने की सही विधि

सबसे पहले किसी समतल स्थान पर पेट के बल लेट जाएँ। दोनों हाथों को आगे की ओर सीधा फैलाएँ, हथेलियाँ ऊपर की दिशा में रखें। पैर सीधे और एड़ियाँ आपस में मिली हुई हों। माथा या ठुड्डी ज़मीन को छूती रहे।

अब गहरी साँस लें और शरीर को स्थिर करें। साँस छोड़ते हुए दोनों पैरों और हाथों को एक साथ धीरे-धीरे ऊपर उठाएँ। घुटनों को न मोड़ें और पैर सीधे रखें। इस स्थिति में 10 से 30 सेकंड तक रुकें और सामान्य रूप से साँस लेते रहें। इसके बाद धीरे-धीरे हाथ, पैर और छाती को वापस ज़मीन पर लाएँ और कुछ देर विश्राम करें।

शलभासन के प्रमुख फायदे

आयुष मंत्रालय के अनुसार, इस आसन के नियमित अभ्यास से निम्नलिखित लाभ मिलते हैं:

रीढ़ की हड्डी की मांसपेशियाँ मजबूत होती हैं और लचीलापन बढ़ता है। कमर एवं पीठ के निचले हिस्से की माँसपेशियाँ सक्रिय होती हैं, जिससे हल्के लोअर बैक दर्द में राहत मिल सकती है। पाचन तंत्र पर दबाव पड़ने से उसकी कार्यक्षमता बेहतर होती है। इसके अतिरिक्त, साइटिका की हल्की समस्या से पीड़ित लोगों के लिए भी यह उपयोगी हो सकता है — हालाँकि गंभीर दर्द या चोट की स्थिति में किसी योग विशेषज्ञ की सलाह लेना आवश्यक है।

किन्हें नहीं करना चाहिए यह आसन

शलभासन सभी के लिए उपयुक्त नहीं है। गर्भावस्था के दौरान, हर्निया की स्थिति में, या पीठ अथवा गर्दन में किसी प्रकार की चोट या गंभीर दर्द होने पर इस आसन से परहेज़ करें। ऐसे लोगों को पहले चिकित्सक से परामर्श करना चाहिए।

विशेषज्ञ की सलाह

योग विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि शलभासन को खाली पेट, अधिमानतः सुबह के समय करना सबसे प्रभावी रहता है। शुरुआती अभ्यासकर्ता पहले एक-एक पैर उठाने से अभ्यास शुरू कर सकते हैं और धीरे-धीरे दोनों पैर एक साथ उठाने की ओर बढ़ सकते हैं। नियमित और सही तकनीक से किया गया यह आसन दीर्घकालिक रीढ़ स्वास्थ्य के लिए एक प्रभावी उपाय बन सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन 'हल्के दर्द में उपयोगी' और 'गंभीर दर्द में विशेषज्ञ से मिलें' के बीच की रेखा अक्सर आम पाठक के लिए धुंधली रह जाती है। डिजिटल स्वास्थ्य सामग्री की बाढ़ में यह ज़रूरी है कि योग-संबंधी सलाह नैदानिक स्पष्टता के साथ आए — न कि केवल लाभों की सूची। जब तक प्रशिक्षित योग चिकित्सकों की पहुँच ग्रामीण भारत तक नहीं बढ़ती, ऑनलाइन निर्देशों पर निर्भरता जोखिम भी उठाती है।
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29 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शलभासन क्या है और इसे क्यों करना चाहिए?
शलभासन एक पारंपरिक योगासन है जिसमें पेट के बल लेटकर हाथ और पैर ऊपर उठाए जाते हैं, जिससे शरीर की मुद्रा टिड्डे (Locust) जैसी बनती है। आयुष मंत्रालय के अनुसार यह रीढ़ की हड्डी को मजबूत करता है, पाचन तंत्र को लाभ पहुँचाता है और शरीर का वजन नियंत्रित रखने में सहायक है।
शलभासन करने की सही विधि क्या है?
पेट के बल लेटें, हाथ आगे फैलाएँ और हथेलियाँ ऊपर रखें। गहरी साँस लें, फिर साँस छोड़ते हुए दोनों पैर और हाथ एक साथ ऊपर उठाएँ — घुटने न मोड़ें। इस स्थिति में 10 से 30 सेकंड रुकें और धीरे-धीरे वापस आएँ।
शलभासन से पीठ दर्द में कितना फायदा होता है?
आयुष मंत्रालय के अनुसार, हल्के लोअर बैक दर्द और साइटिका जैसी समस्याओं में शलभासन उपयोगी हो सकता है। हालाँकि गंभीर दर्द, चोट या किसी चिकित्सीय स्थिति में इसे स्वयं करने के बजाय योग विशेषज्ञ या चिकित्सक की सलाह लेना ज़रूरी है।
शलभासन किन्हें नहीं करना चाहिए?
गर्भावस्था के दौरान, हर्निया की स्थिति में, और पीठ या गर्दन में चोट होने पर शलभासन वर्जित है। ऐसे लोगों को पहले अपने चिकित्सक से परामर्श करना चाहिए।
शलभासन कब और कितनी बार करना चाहिए?
योग विशेषज्ञों के अनुसार शलभासन खाली पेट, अधिमानतः सुबह के समय करना सबसे प्रभावी रहता है। शुरुआती अभ्यासकर्ता एक-एक पैर से शुरुआत करें और धीरे-धीरे दोनों पैर एक साथ उठाने की ओर बढ़ें।
राष्ट्र प्रेस
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