भारत और कंबोडिया की साझा धरोहर: अंगकोर वाट और ता प्रोहम मंदिर का महत्व
सारांश
Key Takeaways
- अंगकोर वाट भारत और कंबोडिया की साझा संस्कृति का प्रतीक है।
- ता प्रोहम बौद्ध धर्म का प्रमुख मंदिर है।
- इन मंदिरों का पुनर्निर्माण एएसआई द्वारा किया जा रहा है।
- सांस्कृतिक धरोहर को सहेजना आवश्यक है।
- इनका ऐतिहासिक महत्व वैश्विक है।
नोम पेन्ह, 22 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। अंगकोर वाट मंदिर भारत-कंबोडिया की साझा संस्कृति का अद्भुत प्रतीक है। सिएम रीप में स्थित इस वास्तु की अनुपम धरोहर को सुरक्षित रखने में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यहीं पर अंगकोर पुरातत्व उद्यान में बौद्ध मठ ता प्रोहम भी है, जिसके पुनर्निर्माण की जिम्मेदारी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग, यानी एएसआई ने संभाली है। विदेश मंत्रालय के सचिव (पूर्व) पी. कुमारन यहां आए थे। भारतीय विदेश मंत्रालय ने इसकी जानकारी दी।
तस्वीरों में 12वीं सदी में खमेर राजा सूर्यवर्मन द्वितीय द्वारा बनवाए गए विशाल मंदिर का दृश्य है, और कुछ में कुमारन मंदिर की वास्तुकला का अवलोकन करते हुए देखे जा सकते हैं। एमईए ने यह भी बताया कि सचिव (पूर्व) पी. कुमारन ने सिएम रीप में अंगकोर वाट मंदिर का दौरा किया, जो कंबोडिया में सबसे बड़ा प्राचीन मंदिर परिसर है और भारत-कंबोडिया की साझा संस्कृति की धरोहर का एक अद्भुत प्रतीक है। 1986 से 1993 के बीच, भारत इसके पुनर्निर्माण में सहायता करने वाला पहला देश था।
जानकारी के अनुसार, अंगकोर वाट, कंबोडिया के सिएम रीप में स्थित लगभग 400 एकड़ का सबसे बड़ा धार्मिक स्मारक और हिंदू मंदिर है, जिसे 12वीं सदी में खमेर राजा सूर्यवर्मन द्वितीय ने भगवान विष्णु के लिए बनवाया था। यह खमेर वास्तुकला का एक अद्वितीय उदाहरण है।
अगली पोस्ट में ता प्रोहम का उल्लेख है। इसमें बताया गया कि पी. कुमारन ने कंबोडिया के सिएम रीप में ता प्रोहम मंदिर का दौरा किया, जहां एएसआई विभाग पुनर्निर्माण और संरक्षण कार्यों को संचालित कर रहा है।
ता प्रोहम, कंबोडिया के अंगकोर में स्थित 12वीं सदी का एक प्रसिद्ध महायान बौद्ध मंदिर है, जो अपने खंडहर और विशाल पेड़ों (अंजीर और कपास) की जड़ों में लिपटी पत्थर की दीवारों के लिए जाना जाता है। इसे राजा जयवर्मन सप्तम ने अपनी माता के सम्मान में बनवाया था और यह यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल की सूची में शामिल है।
इस मंदिर का सबसे आकर्षक दृश्य विशाल पेड़ों की जड़ें हैं जो प्राचीन पत्थर की संरचनाओं के साथ मिलकर एक रहस्यमयी वातावरण बनाती हैं। 12वीं शताब्दी के अंत में निर्मित, यह मूल रूप से एक बौद्ध मठ और विश्वविद्यालय था। अब, एएसआई और अन्य कंबोडियाई संगठन मिलकर पुनर्निर्माण का कार्य कर रहे हैं।