बांग्लादेश: धनमंडी में पत्रकारों पर जमात हमले की एडिटर्स काउंसिल ने की कड़ी निंदा, पारदर्शी जांच की मांग
सारांश
मुख्य बातें
बांग्लादेश की एडिटर्स काउंसिल ने ढाका के धनमंडी 32 इलाके में 23 जून को पत्रकारों पर हुए कथित हमले की कड़ी निंदा करते हुए तत्काल, निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की माँग की है। स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, जमात-ए-इस्लामी के कार्यकर्ताओं पर अपने एक राजनीतिक कार्यक्रम के बाद समाचार संकलन में लगे पत्रकारों पर हमला करने का आरोप है।
हमले का घटनाक्रम
आरोपों के अनुसार, जमात-ए-इस्लामी की ढाका साउथ यूनिट के एक राजनीतिक कार्यक्रम के बाद कार्यकर्ताओं ने वहाँ मौजूद पत्रकारों पर हमला किया। हमलावरों ने पत्रकारों पर अवामी लीग का समर्थक होने का आरोप लगाया। इस हमले में जमुना टेलीविजन के वरिष्ठ संवाददाता रब्बी सिद्दीकी और डेली सकाल मल्टीमीडिया के संवाददाता महफूज़ुर रहमान शिशिर घायल हो गए।
प्रत्यक्षदर्शियों के हवाले से बांग्लादेशी मीडिया आउटलेट 'व्यूज़ बांग्लादेश' ने बताया कि कार्यकर्ताओं ने शिशिर का कॉलर पकड़ा और जमीन पर गिरने के बाद उन्हें घूँसे व लात मारे। साथी पत्रकारों से बात करते हुए शिशिर ने कहा, 'जमात के कार्यकर्ताओं ने मुझे पीटा और घायल कर दिया। यह शर्मनाक है। आप प्रेस की आज़ादी की बात करते हैं — क्या किसी पत्रकार का कॉलर पकड़कर पीटना उस आज़ादी का उदाहरण है?'
एडिटर्स काउंसिल की प्रतिक्रिया
26 जून को जारी एक बयान में एडिटर्स काउंसिल ने जमात के इस दावे को सिरे से खारिज किया कि यह घटना 'गलतफहमी' के कारण हुई। काउंसिल ने स्पष्ट कहा, 'जब पत्रकार अपनी पेशेवर ज़िम्मेदारी निभा रहे हों, तो उन पर हमले को किसी भी तर्क से उचित नहीं ठहराया जा सकता।' संगठन ने यह भी कहा कि ऐसे हमले प्रेस की स्वतंत्रता के लिए सीधा खतरा हैं, पत्रकारों के समाचार संकलन के अधिकार में बाधा डालते हैं और अभिव्यक्ति की आज़ादी को कुंद करते हैं।
काउंसिल ने अधिकारियों से अपील की कि विश्वसनीय जांच के ज़रिये हमलावरों की पहचान की जाए और उनके विरुद्ध उचित कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। साथ ही, पत्रकारों को भविष्य में बिना किसी भय के अपनी व्यावसायिक ज़िम्मेदारियाँ निभाने के लिए सुरक्षित माहौल देने की माँग की गई।
बांग्लादेश में प्रेस स्वतंत्रता की स्थिति
यह घटना ऐसे समय में सामने आई है जब बांग्लादेश में पत्रकारों पर हमलों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। गौरतलब है कि मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के कार्यकाल से ही यह प्रवृत्ति तेज हुई थी, और आलोचकों का कहना है कि बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की वर्तमान सरकार के दौर में भी हालात नहीं सुधरे हैं।
इस महीने की शुरुआत में अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता संगठन कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (CPJ) ने बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान से मीडिया स्वतंत्रता की रक्षा के अपने चुनावी वादे को पूरा करने की अपील की थी। CPJ ने उनकी सरकार के पहले 100 दिनों के बाद 'पत्रकारों पर पक्षपातपूर्ण अत्याचार' समाप्त करने की माँग की।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
CPJ के एशिया-पैसिफिक प्रोग्राम समन्वयक कुणाल मजूमदार ने कहा, 'बांग्लादेश में प्रेस की आज़ादी को अक्सर हर नई सरकार के लिए एक अवसर की तरह इस्तेमाल किया गया है — ताकि वह उन पत्रकारों के विरुद्ध कानून बना सके जो कथित तौर पर पिछली सरकार से जुड़े हुए हैं। प्रधानमंत्री तारिक रहमान की सरकार ने अलग रास्ता अपनाने का वादा किया था, लेकिन 100 दिन बाद भी कोई ठोस बदलाव नहीं दिखा।'
मजूमदार ने सुझाव दिया कि सरकार जेल में बंद पत्रकारों को रिहा करके, राजनीति से प्रेरित मुकदमे वापस लेकर, पत्रकारों को भीड़ की हिंसा से बचाकर और मीडिया-विरोधी कानूनों में सुधार करके शुरुआत कर सकती है। CPJ के अनुसार, अगस्त 2024 से दर्जनों पत्रकारों को हिरासत में लिया गया है या उन पर आरोप लगाए गए हैं — मुख्यतः उन्हें पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना का समर्थक माना गया था।
आगे क्या होगा
एडिटर्स काउंसिल की माँग के बाद अब सभी की नज़रें बांग्लादेश सरकार और जाँच एजेंसियों पर टिकी हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अधिकारी इस मामले में कितनी तत्परता से कार्रवाई करते हैं और क्या हमलावरों को जवाबदेह ठहराया जाएगा — जो बांग्लादेश में प्रेस स्वतंत्रता की दिशा का एक अहम संकेतक होगा।