मोहन भागवत न्यूयॉर्क में बोले: 'कितना कमाते हैं नहीं, कितना बाँटते हैं — यही जीवन का असली पैमाना'
सारांश
मुख्य बातें
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने 30 अगस्त को न्यूयॉर्क में आयोजित यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन को संबोधित करते हुए कहा कि जीवन की सार्थकता धन-संपत्ति से नहीं, बल्कि समाज को दिए गए योगदान से मापी जानी चाहिए। उन्होंने लोगों से भौतिक सफलता की संकीर्ण परिभाषा से बाहर निकलकर सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना अपनाने का आह्वान किया।
समाज को वापस देने की जिम्मेदारी
भागवत ने अपने संबोधन में रेखांकित किया कि प्रत्येक व्यक्ति का अस्तित्व अनगिनत अन्य लोगों के श्रम और योगदान पर टिका है। उन्होंने कहा, 'हम कितना कमाते हैं यह महत्वपूर्ण नहीं है। हम कितना बाँटते हैं — यह महत्वपूर्ण है।' संघ प्रमुख ने तर्क दिया कि कोई भी व्यक्ति पूर्णतः 'सेल्फ-मेड' नहीं होता, क्योंकि उसका जीवन माता-पिता, किसानों, मजदूरों और समाज के अनेक वर्गों के सहारे आगे बढ़ता है।
उन्होंने श्रोताओं से पूछा, 'यह शरीर हमें किसने दिया? हमारे माता-पिता ने। दुनिया में कहीं खेती हो रही है, इसीलिए आप खा पा रहे हैं। अगर किसान खेती करना बंद कर दें, तो आप क्या खाएंगे? आप कपड़े पहन रहे हैं क्योंकि मिलें हैं, मजदूर काम कर रहे हैं। हम सब कुछ किसी और के कारण पाते हैं — और इसीलिए हमें वापस भी देना है।'
भारतीय परंपरा और भौतिक सफलता का संतुलन
भागवत ने स्पष्ट किया कि भारतीय दर्शन धन या भौतिक उपलब्धि को नकारता नहीं। उन्होंने कहा कि उपनिषद भी केवल मोक्ष की राह नहीं दिखाते — भौतिक सफलता भी मानव जीवन का वैध और आवश्यक हिस्सा है। हालाँकि, यह एकमात्र लक्ष्य नहीं हो सकती। उन्होंने करियर को सिर्फ धन-अर्जन का साधन मानने की प्रवृत्ति पर सवाल उठाया: 'क्या करियर सिर्फ पैसा है? क्या करियर सिर्फ भौतिक खुशी है?'
भौतिक सुख की सीमाएँ — डोनट्स का उदाहरण
भागवत ने भौतिक सुख की क्षणभंगुरता समझाने के लिए एक हल्के-फुल्के उदाहरण का सहारा लिया। उन्होंने हँसते हुए कहा, 'अगर मुझे न्यूयॉर्क के डोनट्स पसंद हैं, तो मैं खाऊंगा — लेकिन एक बार में कितने खा सकता हूं? मैं डायबिटिक हूं। कल सुबह मैं 50 और खाने के लिए तैयार हो जाऊंगा। तो भौतिक खुशी क्षणिक है, संतुष्ट नहीं कर सकती — और अधिकता में तो विफल भी हो सकती है।' इस उदाहरण के माध्यम से उन्होंने यह संदेश दिया कि इंद्रिय-सुख की कोई स्थायी तृप्ति नहीं होती।
सोच की दिशा तय करती है मनुष्यता
संघ प्रमुख ने कहा कि मनुष्य की विशेषता यह है कि वह अपने निर्णयों के परिणामों पर विचार कर सकता है। उन्होंने कहा, 'आप सोच सकते हैं, लेकिन आप किस तरह से सोचते हैं — वह महत्वपूर्ण है। अगर आप सही तरीके से सोचते हैं, तो आप ईश्वर के करीब जाते हैं। अगर गलत तरीके से सोचते हैं, तो पशु जगत के करीब जाते हैं।' उन्होंने आग्रह किया कि परस्पर देखभाल और सामूहिक जिम्मेदारी ही जीवन को सार्थक बनाती है।
आगे की दिशा
यह संबोधन ऐसे समय में आया है जब भारतीय प्रवासी समुदाय के बीच सामाजिक उत्तरदायित्व और सांस्कृतिक जड़ों को लेकर व्यापक विमर्श चल रहा है। भागवत की यह अपील — कि व्यक्तिगत समृद्धि और सामाजिक योगदान एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं — भारतीय दर्शन की उस परंपरा को रेखांकित करती है जो 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' के आदर्श पर टिकी है।