ईयू-भारत एफटीए से भारत-जर्मनी व्यापार में बड़ा बदलाव, टैरिफ घटेंगे: जर्मन राजदूत डॉ. जैस्पर वीक
सारांश
मुख्य बातें
भारत में जर्मनी के राजदूत डॉ. जैस्पर वीक ने कहा है कि प्रस्तावित यूरोपीय संघ (ईयू)-भारत मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) भारत-जर्मनी व्यापार और निवेश संबंधों के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ साबित होगा। 3 नवंबर 2026 को एक विशेष बातचीत में राजदूत ने बताया कि इस समझौते पर इस वर्ष के अंत तक हस्ताक्षर होने और अगले वर्ष की पहली छमाही में लागू होने की उम्मीद है। उन्होंने कहा कि इससे कई औद्योगिक एवं कुछ कृषि उत्पादों पर लगने वाले शुल्क घटेंगे, आपूर्ति श्रृंखलाएँ मज़बूत होंगी और भारत में रोज़गार के नए अवसर उत्पन्न होंगे।
75 वर्षों की मज़बूत राजनयिक विरासत
डॉ. वीक ने कहा कि भारत और जर्मनी ने हाल ही में अपने राजनयिक संबंधों के 75 वर्ष पूरे होने का जश्न मनाया है और दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी को 26 वर्ष हो चुके हैं। उनके अनुसार यह रिश्ता अब व्यापार-निवेश, अनुसंधान-तकनीक, रक्षा-सुरक्षा और ऊर्जा सुरक्षा जैसे लगभग हर महत्वपूर्ण क्षेत्र को समेटे हुए है।
राजदूत ने यह भी कहा कि उनका मानना है कि दोनों देशों के बीच का सहयोग आने वाले समय में और अधिक गहरा होगा। 'हम इस साझेदारी से जुड़ी उम्मीदों पर न केवल खरे उतर रहे हैं, बल्कि उनसे आगे भी बढ़ रहे हैं' — यह उनके शब्द थे।
एफटीए से व्यापार और आपूर्ति श्रृंखला पर असर
डॉ. वीक के अनुसार ईयू-भारत एफटीए लागू होने के बाद दोनों देशों की आपूर्ति श्रृंखलाएँ अधिक कुशलता से जुड़ सकेंगी। इससे दोनों पक्ष एक-दूसरे की क्षमताओं का लाभ उठाते हुए अपने उत्पादों को अधिक प्रतिस्पर्धी कीमत पर बना सकेंगे।
गौरतलब है कि भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापार वार्ता वर्षों से जारी है। इस समझौते के अंतिम रूप लेने से जर्मनी, जो ईयू की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, भारत के साथ व्यापार में विशेष लाभ की स्थिति में आ जाएगा। राजदूत ने जोर दिया कि इसका फायदा केवल कंपनियों को नहीं, बल्कि 'भारत के लोगों को' भी मिलेगा — बेहतर रोज़गार और मज़बूत अर्थव्यवस्था के रूप में।
ऊर्जा साझेदारी: 2 गीगावाट से 300 गीगावाट तक का सफर
राजदूत ने इस अवसर पर भारत-जर्मनी ऊर्जा फोरम के 20 वर्ष पूरे होने का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि जर्मनी ने तकनीक, विशेषज्ञता और वित्तीय सहायता के ज़रिए सौर ऊर्जा संयंत्रों, बिजली उत्पादन परियोजनाओं और ग्रिड इंटीग्रेशन में भारत का सहयोग किया है।
डॉ. वीक ने एक महत्वपूर्ण आँकड़ा साझा किया — वर्ष 2006 में भारत की नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन क्षमता मात्र 2 से 3 गीगावाट थी, जो आज बढ़कर लगभग 300 गीगावाट हो गई है। उन्होंने इसे भारत की 'बहुत बड़ी उपलब्धि' बताया।
भविष्य की राह: ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता
डॉ. जैस्पर वीक के अनुसार आने वाले समय में भारत-जर्मनी ऊर्जा साझेदारी केवल उत्पादन तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि नवीकरणीय ऊर्जा से जुड़ी औद्योगिक क्षमताओं के विकास पर भी ध्यान केंद्रित होगा। इसका लक्ष्य यह है कि भारत सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और बिजली ग्रिड के लिए ज़रूरी उपकरणों और तकनीकों के उत्पादन में आत्मनिर्भर बने।
यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब भारत 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है और नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व की भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है। राजदूत की यह टिप्पणियाँ संकेत देती हैं कि आने वाले वर्षों में भारत-जर्मनी सहयोग और अधिक गहरा तथा विस्तृत होने वाला है।