चीन के विशाल मैन्युफैक्चरिंग बेस के सामने भारत की डिफेंस ग्रोथ वैश्विक संतुलन की उम्मीद: रिपोर्ट

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
चीन के विशाल मैन्युफैक्चरिंग बेस के सामने भारत की डिफेंस ग्रोथ वैश्विक संतुलन की उम्मीद: रिपोर्ट

सारांश

चीन का औद्योगिक आधार अमेरिका, जापान और जर्मनी को मिलाकर भी पीछे छोड़ चुका है — और अमेरिकी विशेषज्ञों का कहना है कि इस असंतुलन को पाटने के लिए भारत ही एकमात्र विकल्प है। आत्मनिर्भर भारत नीति के तहत रक्षा निर्यात एक दशक में 8 करोड़ से 6 अरब डॉलर के लक्ष्य तक पहुँच चुका है, लेकिन वाशिंगटन की नौकरशाही बाधाएँ साझेदारी को सीमित कर रही हैं।

मुख्य बातें

अमेरिकी विशेषज्ञों के अनुसार चीन का मैन्युफैक्चरिंग बेस अब अमेरिका, जापान और जर्मनी के संयुक्त आधार से बड़ा है।
भारत का रक्षा निर्यात लक्ष्य 2029 तक लगभग 6 अरब डॉलर — एक दशक पहले यह मात्र लगभग 8 करोड़ डॉलर था।
आत्मनिर्भर भारत नीति ने औद्योगिक कॉरिडोर, बढ़ी हुई FDI सीमा और सक्रिय डिफेंस-टेक स्टार्टअप इकोसिस्टम तैयार किया है।
अक्टूबर 2024 में अमेरिका-भारत रोडमैप पर सहमति बनी — जिसमें सह-विकास, आपूर्ति सुरक्षा और इनोवेशन सेतु शामिल हैं।
विशेषज्ञ माइक कुइकेन और लेलैंड मिलर के अनुसार साझेदारी में पिछड़ने की जिम्मेदारी मुख्यतः वाशिंगटन की पुरानी निर्यात-नियंत्रण प्रणाली पर है।

अमेरिकी विशेषज्ञों की एक रिपोर्ट के अनुसार, चीन का मैन्युफैक्चरिंग बेस अब अमेरिका, जापान और जर्मनी के संयुक्त औद्योगिक आधार से भी बड़ा हो चुका है, और इस असंतुलन को पाटने में भारत की रक्षा विनिर्माण क्षमता को एकमात्र व्यावहारिक विकल्प बताया गया है। 21 मई को प्रकाशित इस विश्लेषण में रेखांकित किया गया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आत्मनिर्भर भारत नीति ने भारत को एक उभरते रक्षा निर्यातक के रूप में स्थापित किया है।

भारत की डिफेंस ग्रोथ का परिदृश्य

रिपोर्ट के अनुसार, आत्मनिर्भर भारत नीति के तहत औद्योगिक कॉरिडोर बनाए गए हैं, विदेशी प्रत्यक्ष निवेश की सीमा बढ़ाई गई है और एक सक्रिय डिफेंस-टेक स्टार्टअप इकोसिस्टम विकसित हुआ है जो पहले से ही निर्यात कर रहा है। सैकड़ों कंपनियाँ इस क्षेत्र में सक्रिय हैं और कई तेज़ी से विस्तार कर रही हैं। इसी पृष्ठभूमि में भारत ने 2029 तक लगभग 6 अरब डॉलर के रक्षा निर्यात का लक्ष्य रखा है — जबकि एक दशक पहले यह आँकड़ा मात्र लगभग 8 करोड़ डॉलर था।

अमेरिकी विशेषज्ञों का विश्लेषण

अमेरिका-चीन आर्थिक एवं सुरक्षा समीक्षा आयोग के उपाध्यक्ष माइक कुइकेन और आयुक्त लेलैंड मिलर ने ऑनलाइन पत्रिका 'द वायर चाइना' में लिखा कि बीजिंग में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हालिया बैठक ने वाशिंगटन को उस औद्योगिक असंतुलन की याद दिलाई जो अभी भी अमेरिका के पक्ष में नहीं है। उनके अनुसार, अमेरिका और यूरोप मिलकर भी चीनी औद्योगिक पैमाने का मुकाबला नहीं कर सकते।

कुइकेन और मिलर ने स्पष्ट शब्दों में कहा, 'यह किसी पसंद का नहीं, बल्कि रणनीतिक ज़रूरत का मामला है।' उनका तर्क है कि भारत की उत्तरी सीमा पर चीनी दबाव की वास्तविकता और भारत की सुरक्षा चिंताएँ इस रणनीतिक साझेदारी को स्वाभाविक बनाती हैं।

अमेरिका-भारत रक्षा सहयोग: प्रगति और अवरोध

विशेषज्ञों ने बताया कि पिछले अक्टूबर में दोनों देश एक रोडमैप पर सहमत हुए थे, जिसमें संयुक्त अनुसंधान, सह-विकास, आपूर्ति सुरक्षा और अमेरिकी-भारतीय डिफेंस स्टार्टअप्स के बीच नवाचार सेतु शामिल थे। 2023 में तत्कालीन सीनेट मेजॉरिटी लीडर चक शूमर ने म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में तर्क दिया था कि भारत को इस वैश्विक संतुलन के केंद्र में होना चाहिए।

हालाँकि, कुइकेन और मिलर ने चेताया कि केवल दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर करना पर्याप्त नहीं है। उनके अनुसार, 'अमेरिका-भारत साझेदारी के लिए रणनीतिक तर्क तीन साल से वाशिंगटन में तय हो चुके हैं, लेकिन ढाँचा आगे नहीं बढ़ा है। यह मुख्य रूप से भारत की विफलता नहीं है — यह हमारी तरफ से है।'

वाशिंगटन में बाधाएँ

रिपोर्ट में रेखांकित किया गया है कि निर्यात नियंत्रण प्रणाली, जटिल खरीद नियम, वित्तपोषण उपकरण और प्रौद्योगिकी-साझाकरण ढाँचे — ये सभी एक भिन्न रणनीतिक युग के लिए बनाए गए थे और अब बाधा बन रहे हैं। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि 'हर साल यह अंतर बना रहता है, वह एक और साल है जिसमें बीजिंग अपने औद्योगिक और तकनीकी लाभ को और मज़बूत करता है।'

आगे की राह

विश्लेषकों का मानना है कि जब तक अमेरिका अपने निर्यात नियंत्रण और प्रौद्योगिकी-साझाकरण के ढाँचे को नहीं बदलता, भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी अपनी पूरी क्षमता से नीचे ही काम करती रहेगी। भारत की ओर से यह संकेत स्पष्ट है कि बढ़ते द्विपक्षीय संबंधों का अर्थ बुनियादी तकनीक तक पहुँच होना चाहिए — और इस माँग को रिपोर्ट में उचित ठहराया गया है।

संपादकीय दृष्टिकोण

वाशिंगटन की पुरानी नौकरशाही में है। यह विडंबना है कि अमेरिकी विशेषज्ञ स्वयं स्वीकार कर रहे हैं कि रणनीतिक तर्क तीन साल पहले तय हो गया था, पर क्रियान्वयन ठहरा हुआ है। भारत के लिए यह एक अवसर भी है और चेतावनी भी — आत्मनिर्भरता की गति तब तक टिकाऊ नहीं होगी जब तक उन्नत तकनीक तक वास्तविक पहुँच सुनिश्चित न हो, न कि केवल दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर।
RashtraPress
22 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारत का 2029 तक रक्षा निर्यात लक्ष्य क्या है?
रिपोर्ट के अनुसार भारत ने 2029 तक लगभग 6 अरब डॉलर के रक्षा निर्यात का लक्ष्य रखा है। यह एक दशक पहले के लगभग 8 करोड़ डॉलर के निर्यात की तुलना में असाधारण वृद्धि है।
चीन का मैन्युफैक्चरिंग बेस इतना बड़ा क्यों माना जा रहा है?
अमेरिकी विशेषज्ञों के अनुसार चीन का मैन्युफैक्चरिंग बेस अब अमेरिका, जापान और जर्मनी के संयुक्त औद्योगिक आधार से भी बड़ा हो चुका है। यही कारण है कि अमेरिका और यूरोप मिलकर भी चीनी औद्योगिक पैमाने का मुकाबला करने में सक्षम नहीं हैं।
अमेरिका-भारत रक्षा सहयोग में क्या बाधाएँ हैं?
माइक कुइकेन और लेलैंड मिलर के अनुसार, अमेरिका की पुरानी निर्यात नियंत्रण प्रणाली, जटिल खरीद नियम और प्रौद्योगिकी-साझाकरण ढाँचे इस साझेदारी को सीमित कर रहे हैं। ये सभी एक भिन्न रणनीतिक युग के लिए बनाए गए थे और अब अद्यतन की ज़रूरत है।
आत्मनिर्भर भारत नीति ने रक्षा क्षेत्र में क्या बदलाव लाए हैं?
आत्मनिर्भर भारत नीति के तहत औद्योगिक कॉरिडोर बनाए गए हैं, विदेशी प्रत्यक्ष निवेश की सीमा बढ़ाई गई है और एक सक्रिय डिफेंस-टेक स्टार्टअप इकोसिस्टम विकसित हुआ है जो पहले से ही निर्यात कर रहा है। सैकड़ों कंपनियाँ इस क्षेत्र में सक्रिय हैं।
अमेरिका-भारत रक्षा रोडमैप में क्या शामिल है?
अक्टूबर 2024 में दोनों देश एक रोडमैप पर सहमत हुए जिसमें संयुक्त अनुसंधान, सह-विकास, आपूर्ति सुरक्षा और अमेरिकी-भारतीय डिफेंस स्टार्टअप्स के बीच नवाचार सेतु शामिल हैं। हालाँकि विशेषज्ञों का कहना है कि इरादे से क्रियान्वयन अभी भी पीछे है।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 1 महीना पहले
  2. 3 महीने पहले
  3. 5 महीने पहले
  4. 5 महीने पहले
  5. 6 महीने पहले
  6. 7 महीने पहले
  7. 9 महीने पहले
  8. 9 महीने पहले