चीन के विशाल मैन्युफैक्चरिंग बेस के सामने भारत की डिफेंस ग्रोथ वैश्विक संतुलन की उम्मीद: रिपोर्ट
सारांश
मुख्य बातें
अमेरिकी विशेषज्ञों की एक रिपोर्ट के अनुसार, चीन का मैन्युफैक्चरिंग बेस अब अमेरिका, जापान और जर्मनी के संयुक्त औद्योगिक आधार से भी बड़ा हो चुका है, और इस असंतुलन को पाटने में भारत की रक्षा विनिर्माण क्षमता को एकमात्र व्यावहारिक विकल्प बताया गया है। 21 मई को प्रकाशित इस विश्लेषण में रेखांकित किया गया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आत्मनिर्भर भारत नीति ने भारत को एक उभरते रक्षा निर्यातक के रूप में स्थापित किया है।
भारत की डिफेंस ग्रोथ का परिदृश्य
रिपोर्ट के अनुसार, आत्मनिर्भर भारत नीति के तहत औद्योगिक कॉरिडोर बनाए गए हैं, विदेशी प्रत्यक्ष निवेश की सीमा बढ़ाई गई है और एक सक्रिय डिफेंस-टेक स्टार्टअप इकोसिस्टम विकसित हुआ है जो पहले से ही निर्यात कर रहा है। सैकड़ों कंपनियाँ इस क्षेत्र में सक्रिय हैं और कई तेज़ी से विस्तार कर रही हैं। इसी पृष्ठभूमि में भारत ने 2029 तक लगभग 6 अरब डॉलर के रक्षा निर्यात का लक्ष्य रखा है — जबकि एक दशक पहले यह आँकड़ा मात्र लगभग 8 करोड़ डॉलर था।
अमेरिकी विशेषज्ञों का विश्लेषण
अमेरिका-चीन आर्थिक एवं सुरक्षा समीक्षा आयोग के उपाध्यक्ष माइक कुइकेन और आयुक्त लेलैंड मिलर ने ऑनलाइन पत्रिका 'द वायर चाइना' में लिखा कि बीजिंग में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हालिया बैठक ने वाशिंगटन को उस औद्योगिक असंतुलन की याद दिलाई जो अभी भी अमेरिका के पक्ष में नहीं है। उनके अनुसार, अमेरिका और यूरोप मिलकर भी चीनी औद्योगिक पैमाने का मुकाबला नहीं कर सकते।
कुइकेन और मिलर ने स्पष्ट शब्दों में कहा, 'यह किसी पसंद का नहीं, बल्कि रणनीतिक ज़रूरत का मामला है।' उनका तर्क है कि भारत की उत्तरी सीमा पर चीनी दबाव की वास्तविकता और भारत की सुरक्षा चिंताएँ इस रणनीतिक साझेदारी को स्वाभाविक बनाती हैं।
अमेरिका-भारत रक्षा सहयोग: प्रगति और अवरोध
विशेषज्ञों ने बताया कि पिछले अक्टूबर में दोनों देश एक रोडमैप पर सहमत हुए थे, जिसमें संयुक्त अनुसंधान, सह-विकास, आपूर्ति सुरक्षा और अमेरिकी-भारतीय डिफेंस स्टार्टअप्स के बीच नवाचार सेतु शामिल थे। 2023 में तत्कालीन सीनेट मेजॉरिटी लीडर चक शूमर ने म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में तर्क दिया था कि भारत को इस वैश्विक संतुलन के केंद्र में होना चाहिए।
हालाँकि, कुइकेन और मिलर ने चेताया कि केवल दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर करना पर्याप्त नहीं है। उनके अनुसार, 'अमेरिका-भारत साझेदारी के लिए रणनीतिक तर्क तीन साल से वाशिंगटन में तय हो चुके हैं, लेकिन ढाँचा आगे नहीं बढ़ा है। यह मुख्य रूप से भारत की विफलता नहीं है — यह हमारी तरफ से है।'
वाशिंगटन में बाधाएँ
रिपोर्ट में रेखांकित किया गया है कि निर्यात नियंत्रण प्रणाली, जटिल खरीद नियम, वित्तपोषण उपकरण और प्रौद्योगिकी-साझाकरण ढाँचे — ये सभी एक भिन्न रणनीतिक युग के लिए बनाए गए थे और अब बाधा बन रहे हैं। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि 'हर साल यह अंतर बना रहता है, वह एक और साल है जिसमें बीजिंग अपने औद्योगिक और तकनीकी लाभ को और मज़बूत करता है।'
आगे की राह
विश्लेषकों का मानना है कि जब तक अमेरिका अपने निर्यात नियंत्रण और प्रौद्योगिकी-साझाकरण के ढाँचे को नहीं बदलता, भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी अपनी पूरी क्षमता से नीचे ही काम करती रहेगी। भारत की ओर से यह संकेत स्पष्ट है कि बढ़ते द्विपक्षीय संबंधों का अर्थ बुनियादी तकनीक तक पहुँच होना चाहिए — और इस माँग को रिपोर्ट में उचित ठहराया गया है।