भारत-जर्मनी पनडुब्बी समझौता: जर्मनी ने दस्तावेज़ों पर सहमति दी, अब भारत की आंतरिक मंजूरी का इंतज़ार
सारांश
मुख्य बातें
भारत और जर्मनी के बीच प्रस्तावित पनडुब्बी (सबमरीन) रक्षा समझौते को जर्मनी की ओर से औपचारिक रूप से अंतिम रूप दे दिया गया है। नई दिल्ली में तैनात जर्मनी के राजदूत डॉ. जैस्पर विक ने 23 सितंबर 2026 को बुधवार को यह जानकारी दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि अब इस डील को अमलीजामा पहनाने के लिए भारत को अपनी आंतरिक प्रशासनिक प्रक्रियाएँ पूरी करनी हैं।
जर्मनी का रुख: दस्तावेज़ों पर सहमति
राजदूत विक ने कहा, 'दस्तावेजों के मामले में, इसे अंतिम रूप दिया जा चुका है और जर्मनी ने इस पर सहमति दे दी है। अब भारत को अपनी आंतरिक प्रक्रियाओं को पूरा करना और समझौते को अंतिम रूप देना है।' यह बयान इस बात का संकेत है कि बर्लिन अपनी ओर से तैयार है और गेंद अब नई दिल्ली के पाले में है।
गौरतलब है कि भारत की रक्षा खरीद प्रक्रिया — जिसमें रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) और कैबिनेट समिति (CCS) की मंजूरी शामिल होती है — अंतरराष्ट्रीय समझौतों में अक्सर समय लेती है। यह ऐसे समय में आया है जब भारत अपनी नौसैनिक क्षमता को तेजी से आधुनिक बनाने की दिशा में काम कर रहा है।
रक्षा साझेदारी की बड़ी तस्वीर
भारत-जर्मनी रक्षा संबंध पिछले कुछ वर्षों में उल्लेखनीय रूप से मज़बूत हुए हैं। जर्मनी की थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स (TKMS) भारतीय नौसेना के लिए उन्नत पारंपरिक पनडुब्बियाँ बनाने की प्रमुख दावेदार मानी जाती रही है। भारतीय नौसेना की परियोजना-75I (P-75I) के तहत छह उन्नत पनडुब्बियों की खरीद की योजना लंबे समय से चर्चा में है। इस समझौते का अंतिम रूप लेना 'मेक इन इंडिया' रक्षा नीति के लिए भी महत्त्वपूर्ण होगा।
रूस-यूक्रेन संघर्ष पर जर्मन राजदूत का कड़ा संदेश
रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध पर भी डॉ. विक ने बेबाकी से अपनी राय रखी। उन्होंने कहा, 'सबसे पहले, इस युद्ध को रोकने की जिम्मेदारी पुतिन की है। वो इसे कल ही रोक सकते हैं। वह हमलावर हैं और सीजफायर समझौते की राह में बाधा बने हुए हैं। यूक्रेन ऐसे समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए तैयार है, जबकि रूस नहीं है।'
उनका यह बयान ऐसे समय में आया है जब अंतरराष्ट्रीय समुदाय में संघर्ष विराम की संभावनाओं पर बहस तेज़ है और कई देश मध्यस्थता की भूमिका निभाने की कोशिश कर रहे हैं।
रूस पर दबाव बढ़ाने की अपील
राजदूत विक ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा, 'हमें प्रतिबंधों के जरिए लागत बढ़ाकर रूसी नेतृत्व के कॉस्ट-बेनिफिट उठाने के हिसाब-किताब को बदलना होगा।' उनके अनुसार, रूस के तेल निर्यात — जो उसकी सैन्य गतिविधियों का प्रमुख वित्तीय स्रोत हैं — को सीमित करने की कोशिशें की जानी चाहिए।
विक के मुताबिक, यदि रूस के तेल से होने वाला राजस्व पर्याप्त रूप से कम हो जाता है, तो संघर्ष को जारी रखना उसके लिए व्यावहारिक रूप से कठिन हो जाएगा। भारत इस मसले पर अपनी 'रणनीतिक स्वायत्तता' की नीति के तहत संतुलन बनाए रखता आया है।
आगे की राह
अब सभी की नज़रें भारत सरकार की आंतरिक प्रक्रियाओं पर हैं। रक्षा मंत्रालय की ओर से इस संदर्भ में अभी तक कोई आधिकारिक समयसीमा नहीं दी गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता भारत-जर्मनी रणनीतिक साझेदारी को एक नई ऊँचाई पर ले जाएगा और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की नौसैनिक क्षमता को और सुदृढ़ करेगा।