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यूएन बकाया समय पर चुकाएं सभी सदस्य देश: भारत ने पांचवीं समिति में दिया कड़ा संदेश

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यूएन बकाया समय पर चुकाएं सभी सदस्य देश: भारत ने पांचवीं समिति में दिया कड़ा संदेश

सारांश

यूएन महासभा की पांचवीं समिति में भारत ने दो-टूक कहा — बकाया समय पर और बिना शर्त चुकाओ। भारत खुद 'ऑनर रोल' में है; निशाना अमेरिका और चीन जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर, जिनकी देरी से यूएन वित्तीय संकट की कगार पर पहुँच गया था।

मुख्य बातें

BJP सांसद बंशीलाल गुर्जर ने 6 अक्टूबर 2026 को यूएन महासभा की पांचवीं समिति में भारत का पक्ष रखा।
भारत ने यूएन के सामान्य बजट में समय पर योगदान देकर प्रतिष्ठित 'ऑनर रोल' में जगह बनाई।
गुर्जर की टिप्पणी को अमेरिका पर परोक्ष निशाने के रूप में देखा गया, जो यूएन को बकाया रोकता और शर्तें लगाता रहा है।
चीन ने पिछले महीने महासभा की उच्च-स्तरीय बैठक से पहले इस वर्ष का पूरा बकाया जमा किया।
भारत ने शांति अभियानों में योगदान देने वाले विकासशील देशों को समय पर भुगतान की माँग भी उठाई।
भारत ने 'भुगतान करने की क्षमता' के सिद्धांत के लिए अपना समर्थन दोहराया और विकासशील देशों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ न डालने की अपील की।

संयुक्त राष्ट्र महासभा की बजट संबंधी पांचवीं समिति की बैठक में सोमवार, 6 अक्टूबर 2026 को भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सांसद बंशीलाल गुर्जर ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सभी सदस्य देशों को संयुक्त राष्ट्र (यूएन) में अपना तय योगदान समय पर और बिना किसी शर्त के जमा करना चाहिए। गुर्जर ने यह भी रेखांकित किया कि भारत ने यूएन के सामान्य बजट में अपना योगदान समय पर देने की परंपरा बरकरार रखी है, जिसके चलते भारत को प्रतिष्ठित 'ऑनर रोल' में स्थान मिला है।

मुख्य घटनाक्रम

गुर्जर ने हिंदी में अपना संबोधन दिया, जिसका यूएन की पाँच आधिकारिक भाषाओं में एक साथ अनुवाद किया गया — यह अपने आप में भारत की भाषाई पहचान का प्रतीक था। उन्होंने कहा कि सदस्य देशों द्वारा अपना हिस्सा चुकाने में देरी या शर्तें रखना संगठन की वित्तीय स्थिरता को नुकसान पहुँचाता है।

इसी बैठक में आंध्र प्रदेश से वाईएसआर कांग्रेस पार्टी (YSRCP) की सांसद गुम्मा तनुजा रानी ने भी अपनी बात रखी। उन्होंने महासभा के मौजूदा सत्र के दौरान सुधार प्रक्रिया को गति देने और विकास कार्यक्रमों के लिए पर्याप्त बजट सुनिश्चित करने पर जोर दिया।

अमेरिका और चीन पर परोक्ष निशाना

गुर्जर की इस टिप्पणी को व्यापक रूप से अमेरिका की ओर परोक्ष इशारे के रूप में देखा गया। अमेरिका यूएन के सबसे बड़े योगदानकर्ताओं में से एक है, लेकिन वह कथित तौर पर अपने बकाए का कुछ हिस्सा रोकता रहा है और यूएन चार्टर के तहत तय भुगतान को लेकर शर्तें लगाता रहा है।

चीन ने, जो यूएन का दूसरा सबसे बड़ा योगदानकर्ता है, पिछले महीने महासभा की उच्च-स्तरीय बैठक से ठीक पहले इस वर्ष का अपना पूरा बकाया जमा किया। इससे पहले, अमेरिका और चीन दोनों की तरफ से भुगतान में देरी के कारण यूएन गंभीर वित्तीय संकट की कगार पर पहुँच गया था।

शांति अभियानों में विकासशील देशों की चिंता

गुर्जर ने यूएन के शांति अभियानों (Peacekeeping Operations) के लिए सैनिक और पुलिसकर्मी भेजने वाले देशों को समय पर भुगतान नहीं मिलने पर भी चिंता जताई। उनका कहना था कि ऐसे देशों में अधिकांश विकासशील राष्ट्र हैं, जो अपनी सीमित क्षमता के बावजूद यूएन के अभियानों में योगदान देते हैं।

यह ऐसे समय में आया है जब कुछ प्रमुख सदस्य देशों द्वारा भुगतान में देरी से शांति अभियान संचालित करने वाले छोटे और विकासशील देशों पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव बढ़ता जा रहा है।

भुगतान क्षमता के सिद्धांत पर भारत का रुख

गुर्जर ने यह भी स्पष्ट किया कि सदस्य देशों का योगदान तय करते समय 'भुगतान करने की क्षमता' के सिद्धांत से कोई समझौता नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि विकासशील देशों पर उनकी आर्थिक क्षमता से अधिक बोझ नहीं डाला जाना चाहिए।

गौरतलब है कि यह सिद्धांत यूएन की बजट प्रणाली की आधारशिला है और भारत लंबे समय से इसका समर्थक रहा है। भारत का यह रुख विकासशील देशों के एक व्यापक समूह का प्रतिनिधित्व करता है जो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं द्वारा भुगतान टालने की प्रवृत्ति के विरुद्ध एकजुट हो रहे हैं।

आगे की राह

पांचवीं समिति की इस बैठक में उठाए गए मुद्दे महासभा के वर्तमान सत्र में यूएन के बजट सुधारों पर चल रही चर्चाओं को प्रभावित कर सकते हैं। भारत के इस स्पष्ट रुख से विकासशील देशों के बीच यूएन वित्त पोषण को लेकर नई बहस को गति मिलने की उम्मीद है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन संदेश तीखा था — बड़ी शक्तियाँ यूएन को अपनी शर्तों पर नहीं चला सकतीं। गौरतलब है कि अमेरिका वर्षों से यूएन बकाया को एक राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करता आया है, और भारत का 'ऑनर रोल' का हवाला देना इसी प्रवृत्ति की सीधी काट है। हिंदी में संबोधन देना महज प्रतीकात्मक नहीं — यह एक सचेत संकेत है कि भारत अब वैश्विक मंचों पर अपनी शर्तों पर मौजूद है। असली सवाल यह है कि क्या इस तरह के नैतिक दबाव से बड़े योगदानकर्ताओं की भुगतान संस्कृति में कोई बदलाव आएगा, या यह केवल रिकॉर्ड में दर्ज एक और बयान बनकर रह जाएगा।
RashtraPress
6 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारत को यूएन के 'ऑनर रोल' में जगह कैसे मिली?
भारत ने संयुक्त राष्ट्र के सामान्य बजट में अपना तय योगदान समय पर जमा किया, जिसके कारण उसे यूएन के 'ऑनर रोल' में शामिल किया गया। यह उन देशों की सूची है जो यूएन चार्टर के तहत अपने वित्तीय दायित्वों का समय पर निर्वहन करते हैं।
यूएन पांचवीं समिति में भारत ने क्या माँग रखी?
भारत ने माँग रखी कि सभी सदस्य देश अपना तय यूएन योगदान बिना किसी शर्त के और समय पर जमा करें। साथ ही, विकास कार्यक्रमों के लिए पर्याप्त बजट सुनिश्चित करने और शांति अभियानों में योगदान देने वाले विकासशील देशों को समय पर भुगतान की भी अपील की।
यूएन के वित्तीय संकट के लिए कौन से देश जिम्मेदार रहे?
रिपोर्टों के अनुसार अमेरिका और चीन — यूएन के दो सबसे बड़े योगदानकर्ता — की तरफ से भुगतान में देरी के कारण संगठन वित्तीय संकट के करीब पहुँचा। बाद में अमेरिका ने आंशिक भुगतान किया और चीन ने पिछले महीने महासभा की उच्च-स्तरीय बैठक से पहले इस वर्ष का पूरा बकाया जमा किया।
'भुगतान करने की क्षमता' का सिद्धांत क्या है और भारत इसे क्यों समर्थन देता है?
यह सिद्धांत यह तय करता है कि यूएन में किसी देश का योगदान उसकी आर्थिक क्षमता के अनुपात में निर्धारित हो। भारत इसका इसलिए समर्थन करता है ताकि विकासशील देशों पर उनकी क्षमता से अधिक वित्तीय बोझ न पड़े।
शांति अभियानों में योगदान देने वाले देशों को किन समस्याओं का सामना है?
यूएन के शांति अभियानों के लिए सैनिक और पुलिसकर्मी भेजने वाले अधिकतर विकासशील देशों को यूएन की तरफ से भुगतान में देरी का सामना करना पड़ता है। इससे उन पर अभियान का खर्च खुद उठाने का अतिरिक्त दबाव आता है, जबकि कुछ समृद्ध सदस्य देश यूएन को अपने हिस्से का भुगतान रोकते या देरी से करते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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