ईरान डील 'सरेंडर' जैसी, फिर भी जंग से बेहतर — डेमोक्रेट सांसद क्रिस मर्फी
सारांश
मुख्य बातें
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 15 जून 2025 को ट्रुथ सोशल पर ईरान के साथ शांति समझौते की घोषणा की, जिसके बाद तेहरान ने भी एमओयू को अंतिम रूप दिए जाने की पुष्टि की। दुनियाभर में राहत की लहर दौड़ी, लेकिन अमेरिकी संसद में डेमोक्रेट सांसदों ने स्वागत के साथ-साथ तीखी आलोचना भी की। कनेक्टिकट के डेमोक्रेट सांसद क्रिस मर्फी ने इस समझौते को तेहरान के सामने 'सरेंडर' करार दिया, हालाँकि उन्होंने माना कि युद्ध जारी रखने से यह विकल्प बेहतर है।
मर्फी का मूल्यांकन: सरेंडर, लेकिन ज़रूरी
सांसद क्रिस मर्फी ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर विस्तृत पोस्ट लिखकर कहा, "अगर ईरान के साथ कोई अंतिम समझौता होता है, तो वह तेहरान के सामने 'सरेंडर' जैसा लगेगा। हालाँकि, ऐसे समझौते का स्वागत किया जाना चाहिए, क्योंकि युद्ध जारी रहने से अमेरिका और कमज़ोर होगा।" उन्होंने तर्क दिया कि मौजूदा हालात में लंबी जंग अमेरिकी हितों को अधिक नुकसान पहुँचाएगी।
होर्मुज और परमाणु मुद्दे पर सवाल
मर्फी ने समझौते की शर्तों पर भी सवाल उठाए। उनके अनुसार, ईरान की ओर से एकमात्र रियायत स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से खोलने की थी — जबकि यह जलडमरूमध्य संघर्ष से पहले भी खुला हुआ था। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि ईरान पहले से ही जेसीपीओए (JCPOA) के तहत परमाणु हथियार न बनाने के लिए प्रतिबद्ध था — वह समझौता जिसे ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में छोड़ दिया था। गौरतलब है कि ट्रंप ने अपनी पोस्ट में लिखा था, "दुनिया के जहाजों, अपने इंजन चालू कर लो। तेल को बहने दो।"
सीनेटर कून्स की चेतावनी
डेलावेयर के सीनेटर क्रिस कून्स ने भी एक्स पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह समझौता स्थिति को "सही दिशा" में ले जाता है, लेकिन कई अहम सवाल अनुत्तरित हैं। उन्होंने विशेष रूप से चेतावनी दी कि समझौते का कोई लिखित पाठ अब तक सार्वजनिक नहीं हुआ है, जबकि ट्रंप और ईरानी नेता इसकी शर्तों पर अलग-अलग दावे कर रहे हैं।
कून्स ने कहा, "युद्धविराम और वार्ता एक सकारात्मक विकास हैं, लेकिन अब तक इस पसंद के युद्ध ने केवल अमेरिकी सैनिकों और नागरिकों को असुरक्षित किया है तथा कई महत्वपूर्ण सवालों को अनुत्तरित या अनसुलझा छोड़ दिया है।"
डेमोक्रेट्स का साझा रुख
डेमोक्रेट खेमे का समग्र रुख यह है कि यह युद्ध अनावश्यक था और यह समझौता केवल उसी स्थिति को बहाल करता है जो संघर्ष से पहले थी। आलोचकों का कहना है कि अमेरिका ने इस प्रक्रिया में कूटनीतिक और सामरिक दोनों मोर्चों पर कीमत चुकाई है।
आगे क्या
समझौते के लिखित पाठ का इंतज़ार है और दोनों पक्षों की व्याख्याओं में अंतर को देखते हुए विशेषज्ञ इसकी टिकाऊ स्थिरता पर सावधानी बरतने की सलाह दे रहे हैं। यह देखना बाकी है कि एमओयू की शर्तें आखिरकार किस रूप में सामने आती हैं और क्या दोनों देश उन पर कायम रहते हैं।