आईआरजीसी की चेतावनी: ब्रिटिश ठिकानों से अमेरिकी बमवर्षक अभियान जारी रहे तो होंगे वैध निशाने
सारांश
मुख्य बातें
ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) ने 26 जुलाई को ब्रिटेन और इजरायल को कड़ी चेतावनी दी कि यदि अमेरिकी सैन्य अभियानों में उनका सहयोग जारी रहा, तो उनके सैन्य ठिकानों को ईरान के वैध लक्ष्य माना जाएगा। आईआरजीसी के प्रवक्ता ब्रिगेडियर जनरल होसैन मोहेबी ने यह चेतावनी ऐसे समय दी जब रिपोर्टों में दावा किया गया कि ब्रिटेन ने अमेरिका को अपने कुछ सैन्य अड्डों के उपयोग की अनुमति दी है।
मुख्य घटनाक्रम
ईरान की अर्ध-सरकारी समाचार एजेंसी 'फार्स न्यूज' की रिपोर्ट के अनुसार, ब्रिगेडियर जनरल होसैन मोहेबी ने स्पष्ट शब्दों में कहा, 'हाल ही में अमेरिकी बी-1 बमवर्षकों ने ब्रिटिश सैन्य अड्डों से अभियान चलाए। अगर वे इसी तरह सहयोग जारी रखते हैं, तो उन्हें हमारे निश्चित और वैध लक्ष्य माना जाएगा। हमने हर स्थिति के लिए एक खास योजना तैयार कर रखी है।'
यह बयान ऐसे समय आया जब ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम ने अमेरिका को ईरान के विरुद्ध सैन्य अभियानों के लिए कुछ ब्रिटिश ठिकानों के उपयोग की अनुमति दी है।
कौन से ठिकाने हैं निशाने पर
रिपोर्टों के अनुसार, इस कथित समझौते के तहत अमेरिकी सेनाएं हिंद महासागर में स्थित डिएगो गार्सिया सैन्य अड्डे और इंग्लैंड के आरएएफ फेयरफोर्ड अड्डे का उपयोग ईरान के विरुद्ध हमलों में सहायता के लिए कर सकती हैं। ईरान ने इस निर्णय की कड़ी निंदा करते हुए इसे संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया है।
इजरायल पर ईरान का आरोप
मोहेबी ने इजरायल पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि वह राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को प्रभावित करने और भ्रामक जानकारी देकर अमेरिका को क्षेत्र में सक्रिय बनाए रखना चाहता है। उनके अनुसार, इजरायल 'अमेरिकी ताकत का इस्तेमाल अपने लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए कर रहा है।'
मोहेबी ने यह भी कहा कि इजरायल भलीभाँति जानता है कि यदि वह दोबारा युद्ध में उतरा और ईरान का पूरा ध्यान उस पर केंद्रित हुआ, तो परिणाम क्या हो सकते हैं। गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब पश्चिम एशिया में तनाव पहले से ही चरम पर है।
अंतरराष्ट्रीय कानून का सवाल
तेहरान ने इस पूरे घटनाक्रम को अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के विरुद्ध बताया है। आलोचकों का कहना है कि किसी तीसरे देश को अपने क्षेत्र से किसी अन्य देश पर हमले की अनुमति देना अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत जटिल प्रश्न खड़े करता है। यह ऐसे समय में आया है जब अमेरिका-ईरान के बीच कूटनीतिक प्रयास भी जारी बताए जा रहे हैं।
क्या होगा आगे
ईरान की यह चेतावनी पश्चिमी देशों के लिए एक स्पष्ट संकेत है कि तेहरान किसी भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सैन्य सहयोग को युद्ध में भागीदारी मानेगा। विश्लेषकों के अनुसार, ब्रिटेन पर अब कूटनीतिक और सुरक्षा दोनों स्तरों पर दबाव बढ़ेगा। आने वाले दिनों में ब्रिटिश सरकार की आधिकारिक प्रतिक्रिया और नाटो के रुख पर सबकी नज़रें टिकी रहेंगी।