एडिनबर्ग के रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स में महर्षि सुश्रुत की कांस्य प्रतिमा स्थापित, भारतीय चिकित्सा विरासत को वैश्विक सम्मान
सारांश
मुख्य बातें
स्कॉटलैंड के रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स ऑफ एडिनबर्ग में 24 जून 2026 को महर्षि सुश्रुत की कांस्य प्रतिमा का अनावरण किया गया — यह संस्थान विश्व के सबसे प्राचीन और प्रतिष्ठित शल्य-चिकित्सा संस्थानों में गिना जाता है। आयुष मंत्रालय ने इस अवसर को भारत के लिए 'गर्व का पल' बताते हुए कहा कि यह सम्मान प्राचीन भारत की समृद्ध वैज्ञानिक और चिकित्सा विरासत की वैश्विक स्वीकृति का प्रतीक है।
प्रतिमा की विशेषताएँ और उत्पत्ति
यह कांस्य प्रतिमा तमिलनाडु के स्वामीमलाई में निर्मित की गई है, जो अपनी पारंपरिक धातु-शिल्प कला के लिए विख्यात है। प्रतिमा उस महान चिकित्सक-ऋषि को श्रद्धांजलि देती है, जिन्होंने 2,500 वर्ष से भी पहले शल्य-चिकित्सा के उन्नत तरीकों का दस्तावेजीकरण किया था। आयुष मंत्रालय ने अपनी एक्स पोस्ट में इस प्रतिमा-स्थापना की जानकारी साझा की।
महर्षि सुश्रुत का ऐतिहासिक योगदान
महर्षि सुश्रुत को विश्व का प्रथम शल्य-चिकित्सक माना जाता है। उन्होंने अपने ग्रंथ 'सुश्रुत संहिता' में 300 से अधिक विभिन्न शल्य-क्रियाओं का विस्तृत वर्णन किया और लगभग 124 विभिन्न शल्य-उपकरणों का निर्माण किया। उनकी पुनर्निर्माण तकनीकें आधुनिक प्लास्टिक सर्जरी की नींव मानी जाती हैं। आयुष मंत्रालय के अनुसार, 'सुश्रुत संहिता में उनका कार्य चिकित्सा के इतिहास की सबसे उल्लेखनीय उपलब्धियों में से एक माना जाता है।'
आयुष मंत्रालय की प्रतिक्रिया
मंत्रालय ने अपनी पोस्ट में कहा, 'जैसे-जैसे दुनिया इन योगदानों को मान्यता दे रही है, इससे हमारी सभ्यता की विरासत को समझने, उसे संरक्षित करने और उसका जश्न मनाने का महत्व और भी बढ़ जाता है।' मंत्रालय ने इसे 'पारंपरिक ज्ञान से वैश्विक पहचान तक' की यात्रा का प्रमाण बताया।
वैश्विक संदर्भ और महत्व
गौरतलब है कि रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स ऑफ एडिनबर्ग की स्थापना 1505 में हुई थी और यह विश्व के सबसे पुराने शल्य-चिकित्सा संस्थानों में से एक है। इस संस्थान में महर्षि सुश्रुत की प्रतिमा का स्थापित होना इस बात का संकेत है कि पश्चिमी चिकित्सा जगत भी अब प्राचीन भारतीय चिकित्सा परंपरा के मूल योगदान को औपचारिक रूप से स्वीकार कर रहा है। यह पहल भारत की 'सॉफ्ट पावर' कूटनीति और सांस्कृतिक विरासत के वैश्वीकरण के व्यापक प्रयासों के अनुरूप है।
आगे की राह
इस प्रतिमा-स्थापना से भारत और स्कॉटलैंड के बीच चिकित्सा-शिक्षा एवं सांस्कृतिक आदान-प्रदान को नई गति मिलने की संभावना है। आयुष मंत्रालय ने संकेत दिया है कि प्राचीन भारतीय चिकित्सा ज्ञान को वैश्विक मंचों पर और अधिक प्रतिनिधित्व दिलाने के प्रयास जारी रहेंगे।