एनसीबी ने भारत-अमेरिका काउंटर नारकोटिक्स वर्किंग ग्रुप की बैठक की, प्रीकर्सर केमिकल नियंत्रण पर बना फोकस
सारांश
मुख्य बातें
नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) ने 7 अगस्त 2026 को भारत-अमेरिका काउंटर नारकोटिक्स वर्किंग ग्रुप (सीएनडब्ल्यूजी) के 'प्रथम पिलर' वर्किंग ग्रुप की बैठक आयोजित की, जिसमें दोनों देशों की प्रमुख कानून प्रवर्तन और नीति एजेंसियों के प्रतिनिधि शामिल हुए। यह बैठक हाइब्रिड मोड में गुरुवार, 6 अगस्त को संपन्न हुई और इसका मुख्य उद्देश्य द्विपक्षीय नशा-रोधी सहयोग को नई गति देना था।
बैठक में कौन-कौन शामिल हुए
भारतीय प्रतिनिधिमंडल में एनसीबी, सेंट्रल ब्यूरो ऑफ नारकोटिक्स (सीबीएन), डायरेक्टरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस (डीआरआई), सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन (सीडीएससीओ), विदेश मंत्रालय, राजस्व विभाग और रसायन व पेट्रो-रसायन विभाग के अधिकारी सम्मिलित थे।
अमेरिकी पक्ष से ड्रग एनफोर्समेंट एडमिनिस्ट्रेशन (डीईए), एलईजीएटी, ऑफिस ऑफ नेशनल ड्रग कंट्रोल पॉलिसी (ओएनडीसीपी) और अमेरिकी विदेश विभाग के प्रतिनिधि उपस्थित रहे। यह व्यापक भागीदारी दर्शाती है कि दोनों देश नशा तस्करी को केवल कानून-व्यवस्था नहीं, बल्कि एक समग्र नीतिगत प्राथमिकता के रूप में देख रहे हैं।
चर्चा के मुख्य बिंदु
एनसीबी के अनुसार, बैठक में परिचालन सहयोग को मजबूत करने, प्रीकर्सर केमिकल्स के दुरुपयोग को रोकने, नीतिगत समन्वय बेहतर बनाने और क्षमता निर्माण को आगे बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया गया।
एनसीबी ने अपनी एक्स पोस्ट में कहा, 'भारत ने प्रीकर्सर रसायनों के गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए अपने मजबूत प्रीकर्सर नियंत्रण ढांचे तथा नियामक व प्रवर्तन तंत्र को और मजबूत करने के लिए चल रही पहलों पर बात की।' यह उल्लेखनीय है क्योंकि मेथ और फेंटानिल जैसी सिंथेटिक दवाओं के निर्माण में प्रीकर्सर केमिकल्स की भूमिका वैश्विक स्तर पर बढ़ती चिंता का विषय बन चुकी है।
भारत का व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहयोग ढांचा
इसी सप्ताह केंद्र सरकार ने लोकसभा को सूचित किया कि एनसीबी ने 27 देशों के साथ द्विपक्षीय समझौतों और 19 देशों के साथ समझौता ज्ञापनों (MoU) के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय नशा नियंत्रण सहयोग को सुदृढ़ किया है।
केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने लोकसभा में नरेश गणपत म्हस्के और श्रीकांत शिंदे के सवालों का जवाब देते हुए बताया कि भारत म्यांमार, नेपाल, थाईलैंड, श्रीलंका, इंडोनेशिया, सिंगापुर और अमेरिका जैसे देशों के साथ नशीली दवाओं से जुड़े मामलों पर नियमित रूप से महानिदेशक (डीजी) स्तर पर द्विपक्षीय वार्ता करता है। गौरतलब है कि यह सूची भारत के पड़ोसी 'गोल्डन ट्राएंगल' और 'गोल्डन क्रेसेंट' क्षेत्रों को सीधे संबोधित करती है, जो ऐतिहासिक रूप से अफीम और हेरोइन के प्रमुख स्रोत रहे हैं।
विजन डॉक्यूमेंट और नारको-कोऑर्डिनेशन सिस्टम
राय ने यह भी बताया कि नशीली दवाओं की अवैध तस्करी और दुरुपयोग से निपटने के लिए 26 जून को 'नारकोटिक्स कंट्रोल (2026-2029) पर विजन डॉक्यूमेंट' जारी किया गया। इस तीन वर्षीय रोडमैप में 'पूरी सरकार' और 'पूरे समाज' के नजरिए से स्पष्ट प्राथमिकताएँ और समय-सीमाबद्ध लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं।
इसके अतिरिक्त, एनसीबी ने केंद्रीय व राज्य ड्रग कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच समन्वय सुनिश्चित करने के लिए चार-स्तरीय नारको-कोऑर्डिनेशन सेंटर सिस्टम भी स्थापित किया है। यह प्रणाली जमीनी स्तर से राष्ट्रीय स्तर तक सूचना के त्वरित प्रवाह को सुनिश्चित करने के लिए डिज़ाइन की गई है।
आगे की राह
भारत-अमेरिका काउंटर नारकोटिक्स वर्किंग ग्रुप की यह बैठक ऐसे समय में आई है जब वैश्विक स्तर पर सिंथेटिक ड्रग्स, विशेष रूप से फेंटानिल, की तस्करी में तेज़ वृद्धि दर्ज की जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, प्रीकर्सर केमिकल नियंत्रण पर भारत-अमेरिका का संयुक्त फोकस इस वैश्विक संकट से निपटने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। आने वाले महीनों में दोनों देशों के बीच इस सहयोग के ठोस परिणाम सामने आने की उम्मीद है।