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बालेन शाह का स्पष्टीकरण: ब्रिटिश मध्यस्थता नहीं, भारत-नेपाल सीमा विवाद खुद सुलझाएंगे

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बालेन शाह का स्पष्टीकरण: ब्रिटिश मध्यस्थता नहीं, भारत-नेपाल सीमा विवाद खुद सुलझाएंगे

सारांश

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने अपने विवादित बयान पर सफाई देते हुए कहा कि ब्रिटिश अभिलेखों का जिक्र मध्यस्थता के लिए नहीं, बल्कि साक्ष्य के रूप में था। भारत-नेपाल सीमा विवाद — कालापानी, लिपुलेख, लिम्पियाधुरा — दशकों पुराना है और दोनों देश तीसरे पक्ष की भूमिका नकारते हैं।

मुख्य बातें

नेपाल के PM बालेन शाह ने 22 जून 2026 को चितवन में स्पष्ट किया कि वे भारत-नेपाल सीमा विवाद में ब्रिटिश मध्यस्थता नहीं चाहते।
शाह ने कहा कि ब्रिटिश शासनकाल के अभिलेख केवल साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किए जा सकते हैं, न कि मध्यस्थता के लिए।
31 मई को संसद में दिए उनके पहले बयान की विपक्ष, विदेश नीति विशेषज्ञों और सीमा विशेषज्ञों ने आलोचना की थी।
भारत के विदेश मंत्रालय ने पहले ही कह दिया था कि भारत-नेपाल सीमा मामलों में किसी तीसरे पक्ष की कोई भूमिका नहीं।
कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा पर दोनों देशों के दावे दशकों से विवाद का केंद्र हैं; फिलहाल क्षेत्र भारत के प्रशासनिक नियंत्रण में है।

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने 22 जून 2026 को दक्षिणी चितवन जिले में स्पष्ट किया कि काठमांडू भारत-नेपाल सीमा विवाद सुलझाने में किसी भी ब्रिटिश मध्यस्थता का इच्छुक नहीं है। उन्होंने राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) के महाधिवेशन के उद्घाटन सत्र में यह बात कही, जो उनके 31 मई के उस बयान पर सफाई थी जिसने कूटनीतिक हलकों में हलचल मचा दी थी।

मूल बयान और विवाद

31 मई को संसद के निचले सदन में सांसदों के प्रश्नों का उत्तर देते हुए प्रधानमंत्री शाह ने कहा था कि नेपाल ने न केवल भारत और चीन से, बल्कि ब्रिटिश सरकार से भी बातचीत की है, क्योंकि ब्रिटिश शासनकाल के कुछ ऐतिहासिक अभिलेख उनके पास उपलब्ध हैं। उन्होंने तब कहा था, 'हमारा मानना है कि इंग्लैंड (यूके) को भी इस मामले में रुचि लेनी चाहिए, क्योंकि यह मुद्दा उस समय से जुड़ा है जब ब्रिटिश भारत पर शासन करते थे।' इसके साथ ही उन्होंने यह भी स्वीकार किया था कि जिस तरह नेपाल भारत पर अतिक्रमण के आरोप लगाता रहा है, उसी प्रकार नेपाल ने भी भारतीय क्षेत्र पर अतिक्रमण किया है।

इन टिप्पणियों की विपक्षी दलों, विदेश नीति विशेषज्ञों और सीमा मामलों के जानकारों ने कड़ी आलोचना की थी।

सफाई में क्या कहा शाह ने

चितवन महाधिवेशन में शाह ने अपने बयान का संदर्भ स्पष्ट करते हुए कहा, 'कालापानी और लिपुलेख के संबंध में हमारे पास सबूत हैं। मेरा मतलब सिर्फ इतना था कि अगर ब्रिटिश शासनकाल के रिकॉर्ड पेश करने की जरूरत पड़ी, तो हम उन्हें प्रस्तुत करने के लिए तैयार हैं। हम ब्रिटेन की मध्यस्थता नहीं चाहते।' उन्होंने जोर देकर कहा, 'हम अपने पड़ोसियों के साथ चर्चा करके इन मामलों का समाधान खुद करेंगे। मेरे राष्ट्रवाद को लेकर किसी को कोई संदेह नहीं होना चाहिए।'

भारत का रुख

शाह के मूल बयान पर भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने स्पष्ट किया था कि भारत-नेपाल सीमा विवाद के समाधान में किसी तीसरे पक्ष की कोई भूमिका नहीं है। जून की शुरुआत में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा था, 'सीमा संबंधी मुद्दों के समाधान के लिए हमारे पास स्थापित द्विपक्षीय तंत्र मौजूद हैं। भारत और नेपाल के बीच जो भी द्विपक्षीय मामले हैं, उनमें किसी तीसरे पक्ष की कोई भूमिका नहीं है।' यह ऐसे समय में आया जब दोनों देश पहले से मौजूद कूटनीतिक ढाँचे के तहत सीमा मसले सुलझाने की दिशा में काम कर रहे हैं।

विवादित क्षेत्र और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारत और नेपाल दोनों लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी क्षेत्रों पर अपना-अपना दावा करते हैं। फिलहाल यह इलाका भारत के प्रशासनिक नियंत्रण में है, जबकि नेपाल लंबे समय से इन क्षेत्रों को अपनी संप्रभु भूमि बताता रहा है। यह सीमा विवाद कई दशकों से दोनों देशों के संबंधों में एक प्रमुख संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है। गौरतलब है कि शाह की इन टिप्पणियों के कारण जून की शुरुआत में आरएसपी अध्यक्ष रबी लामिछाने की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के निमंत्रण पर हुई भारत यात्रा भी कुछ हद तक सुर्खियों से पीछे छूट गई।

आगे की राह

दोनों देशों का आधिकारिक रुख यही है कि लंबित सीमा विवादों का समाधान कूटनीतिक बातचीत और आपसी समझ के जरिए किया जाना चाहिए। शाह के स्पष्टीकरण के बाद अब देखना होगा कि क्या द्विपक्षीय वार्ता की गति में कोई बदलाव आता है और ब्रिटिश अभिलेखों का उपयोग केवल साक्ष्य के रूप में होता है या इससे आगे कोई कूटनीतिक पहल उभरती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह उस प्रश्न का उत्तर नहीं देता कि एक प्रधानमंत्री ने संसद में ऐसा बयान क्यों दिया जिसे तत्काल सफाई की जरूरत पड़ी। यह घटनाक्रम दर्शाती है कि नेपाल की घरेलू राजनीति और भारत के साथ कूटनीतिक संतुलन के बीच की रस्साकशी कितनी नाजुक है। कालापानी-लिपुलेख विवाद दशकों पुराना है और दोनों पक्षों के बीच कोई ठोस द्विपक्षीय प्रगति सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई है — ऐसे में 'खुद सुलझाएंगे' का दावा तब तक अधूरा लगता है जब तक वार्ता की कोई ठोस समयसीमा या ढाँचा सार्वजनिक न हो।
RashtraPress
10 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बालेन शाह ने ब्रिटिश मध्यस्थता पर सफाई क्यों दी?
31 मई को संसद में दिए बयान में शाह ने ब्रिटेन की संभावित भूमिका का जिक्र किया था, जिसे विपक्ष और विशेषज्ञों ने मध्यस्थता के रूप में व्याख्यायित किया। 22 जून को उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका आशय केवल ब्रिटिश शासनकाल के अभिलेखों को साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत करने से था, न कि किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता से।
भारत-नेपाल सीमा विवाद किन क्षेत्रों को लेकर है?
विवाद मुख्यतः लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी क्षेत्रों को लेकर है। ये क्षेत्र फिलहाल भारत के प्रशासनिक नियंत्रण में हैं, जबकि नेपाल इन्हें अपनी संप्रभु भूमि बताता है।
भारत का इस विवाद पर क्या रुख है?
भारत के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि सीमा विवाद सुलझाने में किसी तीसरे पक्ष की कोई भूमिका नहीं है। प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि दोनों देशों के बीच स्थापित द्विपक्षीय तंत्र ही इन मुद्दों के समाधान का सही माध्यम है।
राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) का महाधिवेशन कहाँ हुआ?
आरएसपी का महाधिवेशन दक्षिणी चितवन जिले में आयोजित किया गया, जहाँ पार्टी प्रमुख और प्रधानमंत्री बालेन शाह ने उद्घाटन सत्र को संबोधित किया।
क्या भारत-नेपाल सीमा विवाद में तीसरे पक्ष की भूमिका संभव है?
दोनों देशों ने तीसरे पक्ष की भूमिका को स्पष्ट रूप से नकारा है। भारत के विदेश मंत्रालय और नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह दोनों ने द्विपक्षीय वार्ता को ही एकमात्र उचित माध्यम बताया है।
राष्ट्र प्रेस
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