बैटरी स्टोरेज समर्थित नवीकरणीय ऊर्जा नए कोयला संयंत्रों से सस्ती: UC बर्कले अध्ययन
सारांश
मुख्य बातें
कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले के इंडिया एनर्जी एंड क्लाइमेट सेंटर द्वारा प्रकाशित एक नए अध्ययन के अनुसार, बैटरी स्टोरेज के साथ संयुक्त नवीकरणीय ऊर्जा भारत में नए कोयला-आधारित बिजली संयंत्रों की तुलना में कम लागत पर 24 घंटे विश्वसनीय बिजली आपूर्ति करने में सक्षम है। 'इंडियाज रिन्यूएबल एनर्जी ब्रेकथ्रू: कोल-लाइक रिलायबिलिटी ऐट अ लोअर, फिक्स्ड प्राइस' शीर्षक से प्रकाशित यह अध्ययन भारत के ऊर्जा नियोजन के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ का संकेत देता है।
अध्ययन का आधार: SECI नीलामी का विश्लेषण
शोधकर्ताओं ने भारतीय सौर ऊर्जा निगम (SECI) द्वारा आयोजित 1,000 मेगावाट क्षमता की एक महत्वपूर्ण नीलामी का विश्लेषण किया, जिसमें 25 वर्षों के लिए ₹5.25 प्रति किलोवाट-घंटे का टैरिफ तय हुआ। इस नीलामी में 16 कंपनियों ने भाग लिया और 7 डेवलपर्स को क्षमता आवंटित की गई। उल्लेखनीय यह रहा कि सभी सफल बोलियाँ ₹5.25 से ₹5.26 प्रति यूनिट के अत्यंत संकीर्ण दायरे में रहीं।
नीलामी की संरचना विशेष रूप से शाम, रात और सुबह के पीक घंटों में अधिकतम आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई थी। उत्पादकों के लिए अनिवार्य किया गया कि वे खरीदार द्वारा चुने गए 6 पीक घंटों में कम से कम 90 प्रतिशत अनुबंधित क्षमता उपलब्ध कराएँ। अन्य गैर-सौर घंटों में यह सीमा 70 प्रतिशत और सौर घंटों के दौरान 50 से 60 प्रतिशत निर्धारित की गई।
तकनीकी आवश्यकताएँ और भौगोलिक अनुकूलता
अध्ययन में 10 भारतीय राज्यों के 10 वर्षों के प्रति घंटा मौसम आंकड़ों का उपयोग किया गया। निष्कर्षों के अनुसार, प्रत्येक 1,000 मेगावाट अनुबंधित क्षमता के लिए राजस्थान जैसे उच्च सौर क्षमता वाले राज्यों में लगभग 3 गीगावाट सौर ऊर्जा क्षमता और 12 गीगावाट-घंटे बैटरी भंडारण की आवश्यकता होगी। जहाँ मानसून या सौर संसाधनों की स्थिति भिन्न है, वहाँ 15 से 20 प्रतिशत अधिक सौर क्षमता की ज़रूरत हो सकती है।
अध्ययन के प्रमुख लेखक और केंद्र में मॉडलिंग एवं विश्लेषण निदेशक उमेद पालीवाल ने कहा, "भारत की भूमध्य रेखा के निकट स्थिति के कारण यहाँ साल भर सौर ऊर्जा उत्पादन में मौसमी उतार-चढ़ाव अपेक्षाकृत कम रहता है। यूरोप जैसे उच्च अक्षांश वाले देशों में सर्दियों के दौरान उत्पादन में बड़ी गिरावट आती है, जबकि भारत की मुख्य चुनौती दिन में मिलने वाली प्रचुर सौर ऊर्जा को शाम और रात के समय के लिए संरक्षित करना है, जो आधुनिक और कम लागत वाली बैटरियों के माध्यम से संभव है।"
बाज़ार-आधारित मूल्य निर्धारण का संकेत
अध्ययन के सह-लेखक निकित अभ्यंकर ने इस परिणाम की व्याख्या करते हुए कहा, "यह किसी एक आक्रामक बोलीदाता का मामला नहीं है। सात विजेता केवल एक पैसे के अंतर में रहे, जिससे स्पष्ट होता है कि ₹5.25 प्रति यूनिट अब स्थिर और विश्वसनीय नवीकरणीय ऊर्जा की बाज़ार-आधारित कीमत बनती जा रही है।" यह मूल्य सौर और बैटरी प्रौद्योगिकी की लागत में आई भारी गिरावट को दर्शाता है।
गौरतलब है कि अनुबंध की शर्तों के अनुसार, हर 15 मिनट के ब्लॉक में प्रदर्शन का मूल्यांकन किया जाएगा और यदि निर्धारित आपूर्ति में कमी रहती है, तो अनुबंध मूल्य के डेढ़ गुने के बराबर जुर्माना लगाया जाएगा। यह कठोर प्रावधान इस मॉडल की विश्वसनीयता को और पुख्ता करता है।
उद्योग और वितरण कंपनियों पर संभावित असर
शोधकर्ताओं का मानना है कि यह मॉडल भारत की बिजली वितरण कंपनियों की भविष्य की योजना-निर्माण प्रक्रिया को बदल सकता है। डेटा सेंटर, इस्पात, एल्यूमीनियम और अन्य विनिर्माण उद्योगों के लिए भी यह आकर्षक विकल्प बन सकता है, क्योंकि उन्हें निरंतर और निर्बाध बिजली आपूर्ति की आवश्यकता होती है।
अध्ययन के सह-लेखक अमोल फड़के ने कहा, "यदि भारत इस मॉडल को बड़े पैमाने पर अपनाता है, तो उपभोक्ताओं और उद्योगों को 25 वर्षों तक निश्चित कीमत पर विश्वसनीय और स्वच्छ बिजली मिल सकती है। कम लागत, स्थिर कीमत और भरोसेमंद आपूर्ति का यह संयोजन भारतीय विनिर्माण क्षेत्र के लिए एक बड़ा प्रतिस्पर्धात्मक लाभ साबित हो सकता है।" यह ऐसे समय में आया है जब भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु प्रतिबद्धताओं को एक साथ साधने की कोशिश कर रहा है।