एससीओ समिट में मोदी-पेजेश्कियन मुलाकात: होर्मुज संकट और चाबहार पर भारत से ईरान की बड़ी उम्मीदें
सारांश
मुख्य बातें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन के बीच एससीओ समिट के दौरान प्रस्तावित द्विपक्षीय बैठक को ईरान अपनी कूटनीतिक प्राथमिकताओं में सर्वोच्च स्थान दे रहा है। अमेरिका-ईरान तनाव और होर्मुज स्ट्रेट पर गहराते संकट के बीच तेहरान को उम्मीद है कि भारत एक विश्वसनीय मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है। चाबहार बंदरगाह पर अधूरी पड़ी परियोजनाओं को पुनर्जीवित करने का मुद्दा भी इस बैठक के केंद्र में रहने की संभावना है।
बैठक का महत्व और पृष्ठभूमि
मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) ध्रुव कटोच के अनुसार, यह बैठक 'समय की ज़रूरत' है। उन्होंने कहा, 'एससीओ सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी और ईरानी राष्ट्रपति पेजेश्कियन के बीच होने वाली द्विपक्षीय बैठक में होने वाली बातचीत बहुत ज़रूरी है। एक तरफ अमेरिका और ईरान के बीच सीज़फायर चल रहा है, लेकिन वो टूट भी रहा है।'
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि होर्मुज स्ट्रेट पर भारत की ऊर्जा निर्भरता अत्यधिक है — तेल, गैस और उर्वरकों की आपूर्ति इसी मार्ग से होती है। यह ऐसे समय में आया है जब खाड़ी क्षेत्र में अस्थिरता भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए सीधा खतरा बन सकती है।
भारत की शांतिदूत भूमिका पर विशेषज्ञों की राय
कटोच ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी की ओर से शांति की दिशा में एक ठोस प्रयास होगा, जिससे अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष को पूर्ण विराम मिल सके। उनके अनुसार, 'भारत का बाकी देशों के साथ जैसा संबंध है, वह उसे किसी भी स्थिति में शांतिदूत की तरह काम करने में सक्षम बनाता है।'
मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) संजय सोनी ने कहा कि इस मुलाकात में कई अहम मुद्दों पर चर्चा होगी। उन्होंने याद दिलाया कि दोनों नेता इससे पहले अक्टूबर 2024 में मिल चुके हैं, लेकिन अब वे युद्ध जैसे माहौल में मिलेंगे। सोनी ने कहा, 'दुनिया में कहीं भी युद्ध होता है तो भारत की एक ही नीति है — यह समय युद्ध का नहीं है।'
चाबहार परियोजना: अधूरे सपनों की वापसी की उम्मीद
कटोच के अनुसार, चाबहार बंदरगाह पर भारत की आगे की रणनीति को लेकर भी इस बैठक में चर्चा हो सकती है। भारत ने जितनी विकास परियोजनाएँ शुरू की थीं, वे सब फिलहाल बंद पड़ी हैं। गौरतलब है कि चाबहार भारत के लिए मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक पहुँचने का सबसे व्यावहारिक भूमार्ग है, और इसकी पुनः सक्रियता भारत की कनेक्टिविटी रणनीति के लिए निर्णायक है।
नेपाल त्रासदी और क्षेत्रीय सहयोग
एससीओ समिट की पृष्ठभूमि में नेपाल में आई आपदा का मुद्दा भी प्रासंगिक रहा। सोनी ने बताया कि भारत ने 62 हज़ार टन की सहायता सामग्री भेजी और बचाव दल रेकी के लिए रवाना हुए। नेपाल ने शुरू में बाहरी बचाव दलों को मना किया था, क्योंकि कई देशों की टीमों के बीच समन्वय की कठिनाई थी — हालाँकि राशन, दवाइयों और धन की मदद के लिए वह तैयार था।
कटोच ने इस संदर्भ में कहा कि हिमालयी क्षेत्र में भविष्य की आपदाओं से निपटने के लिए तिब्बत, नेपाल और भारत के बीच पूर्व-चेतावनी तंत्र विकसित करना अनिवार्य है। यह बैठक इस दिशा में भी एक अवसर प्रदान करती है।
एससीओ समिट में मोदी-पेजेश्कियन की यह मुलाकात केवल द्विपक्षीय संबंधों का पुनर्मूल्यांकन नहीं, बल्कि पश्चिम एशिया में भारत की बढ़ती कूटनीतिक भूमिका की परीक्षा भी है।