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एससीओ समिट में मोदी-पेजेश्कियन मुलाकात: होर्मुज संकट और चाबहार पर भारत से ईरान की बड़ी उम्मीदें

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एससीओ समिट में मोदी-पेजेश्कियन मुलाकात: होर्मुज संकट और चाबहार पर भारत से ईरान की बड़ी उम्मीदें

सारांश

एससीओ समिट में मोदी-पेजेश्कियन की मुलाकात महज़ कूटनीतिक औपचारिकता नहीं — यह होर्मुज संकट के बीच भारत की ऊर्जा सुरक्षा और चाबहार की अटकी परियोजनाओं को पटरी पर लाने की असली कोशिश है। ईरान को भारत से शांतिदूत की भूमिका की उम्मीद है।

मुख्य बातें

PM नरेंद्र मोदी और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन की एससीओ समिट के दौरान द्विपक्षीय बैठक प्रस्तावित है।
होर्मुज स्ट्रेट पर जारी संकट भारत की तेल, गैस और उर्वरक आपूर्ति के लिए सीधा खतरा है।
चाबहार बंदरगाह पर भारत की सभी विकास परियोजनाएँ फिलहाल बंद हैं; पुनः सक्रियता पर चर्चा संभव।
मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) ध्रुव कटोच के अनुसार भारत अमेरिका-ईरान गतिरोध में शांतिदूत की भूमिका निभा सकता है।
दोनों नेता इससे पहले अक्टूबर 2024 में मिल चुके हैं; यह मुलाकात युद्ध जैसे माहौल में होगी।
भारत ने नेपाल आपदा में 62 हज़ार टन सहायता सामग्री भेजी; हिमालयी क्षेत्र में पूर्व-चेतावनी तंत्र की ज़रूरत रेखांकित।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन के बीच एससीओ समिट के दौरान प्रस्तावित द्विपक्षीय बैठक को ईरान अपनी कूटनीतिक प्राथमिकताओं में सर्वोच्च स्थान दे रहा है। अमेरिका-ईरान तनाव और होर्मुज स्ट्रेट पर गहराते संकट के बीच तेहरान को उम्मीद है कि भारत एक विश्वसनीय मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है। चाबहार बंदरगाह पर अधूरी पड़ी परियोजनाओं को पुनर्जीवित करने का मुद्दा भी इस बैठक के केंद्र में रहने की संभावना है।

बैठक का महत्व और पृष्ठभूमि

मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) ध्रुव कटोच के अनुसार, यह बैठक 'समय की ज़रूरत' है। उन्होंने कहा, 'एससीओ सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी और ईरानी राष्ट्रपति पेजेश्कियन के बीच होने वाली द्विपक्षीय बैठक में होने वाली बातचीत बहुत ज़रूरी है। एक तरफ अमेरिका और ईरान के बीच सीज़फायर चल रहा है, लेकिन वो टूट भी रहा है।'

उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि होर्मुज स्ट्रेट पर भारत की ऊर्जा निर्भरता अत्यधिक है — तेल, गैस और उर्वरकों की आपूर्ति इसी मार्ग से होती है। यह ऐसे समय में आया है जब खाड़ी क्षेत्र में अस्थिरता भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए सीधा खतरा बन सकती है।

भारत की शांतिदूत भूमिका पर विशेषज्ञों की राय

कटोच ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी की ओर से शांति की दिशा में एक ठोस प्रयास होगा, जिससे अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष को पूर्ण विराम मिल सके। उनके अनुसार, 'भारत का बाकी देशों के साथ जैसा संबंध है, वह उसे किसी भी स्थिति में शांतिदूत की तरह काम करने में सक्षम बनाता है।'

मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) संजय सोनी ने कहा कि इस मुलाकात में कई अहम मुद्दों पर चर्चा होगी। उन्होंने याद दिलाया कि दोनों नेता इससे पहले अक्टूबर 2024 में मिल चुके हैं, लेकिन अब वे युद्ध जैसे माहौल में मिलेंगे। सोनी ने कहा, 'दुनिया में कहीं भी युद्ध होता है तो भारत की एक ही नीति है — यह समय युद्ध का नहीं है।'

चाबहार परियोजना: अधूरे सपनों की वापसी की उम्मीद

कटोच के अनुसार, चाबहार बंदरगाह पर भारत की आगे की रणनीति को लेकर भी इस बैठक में चर्चा हो सकती है। भारत ने जितनी विकास परियोजनाएँ शुरू की थीं, वे सब फिलहाल बंद पड़ी हैं। गौरतलब है कि चाबहार भारत के लिए मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक पहुँचने का सबसे व्यावहारिक भूमार्ग है, और इसकी पुनः सक्रियता भारत की कनेक्टिविटी रणनीति के लिए निर्णायक है।

नेपाल त्रासदी और क्षेत्रीय सहयोग

एससीओ समिट की पृष्ठभूमि में नेपाल में आई आपदा का मुद्दा भी प्रासंगिक रहा। सोनी ने बताया कि भारत ने 62 हज़ार टन की सहायता सामग्री भेजी और बचाव दल रेकी के लिए रवाना हुए। नेपाल ने शुरू में बाहरी बचाव दलों को मना किया था, क्योंकि कई देशों की टीमों के बीच समन्वय की कठिनाई थी — हालाँकि राशन, दवाइयों और धन की मदद के लिए वह तैयार था।

कटोच ने इस संदर्भ में कहा कि हिमालयी क्षेत्र में भविष्य की आपदाओं से निपटने के लिए तिब्बत, नेपाल और भारत के बीच पूर्व-चेतावनी तंत्र विकसित करना अनिवार्य है। यह बैठक इस दिशा में भी एक अवसर प्रदान करती है।

एससीओ समिट में मोदी-पेजेश्कियन की यह मुलाकात केवल द्विपक्षीय संबंधों का पुनर्मूल्यांकन नहीं, बल्कि पश्चिम एशिया में भारत की बढ़ती कूटनीतिक भूमिका की परीक्षा भी है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन होर्मुज पर यह दाँव पहले से कहीं अधिक व्यक्तिगत है — क्योंकि इस बार ऊर्जा सुरक्षा सीधे तौर पर दाँव पर है। चाबहार की अटकी परियोजनाएँ यह भी बताती हैं कि भारत-ईरान संबंध अमेरिकी प्रतिबंधों की छाया में कितने सीमित हो गए हैं। असली परीक्षा यह है कि मोदी वाशिंगटन को नाराज़ किए बिना तेहरान को कितना आश्वस्त कर सकते हैं — यह संतुलन अब तक भारतीय कूटनीति की सबसे बड़ी चुनौती रही है। बिना ठोस प्रतिबद्धताओं के, यह बैठक भी अच्छे इरादों की एक और सूची बनकर रह सकती है।
RashtraPress
1 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एससीओ समिट में मोदी और पेजेश्कियन की बैठक क्यों अहम है?
यह बैठक अमेरिका-ईरान तनाव और होर्मुज स्ट्रेट संकट के बीच हो रही है, जो भारत की ऊर्जा आपूर्ति को सीधे प्रभावित करती है। ईरान चाहता है कि भारत मध्यस्थ बनकर इस गतिरोध को कम करने में भूमिका निभाए।
होर्मुज स्ट्रेट का भारत के लिए क्या महत्व है?
होर्मुज स्ट्रेट से भारत को तेल, प्राकृतिक गैस और उर्वरकों की बड़ी मात्रा में आपूर्ति होती है। इस मार्ग पर किसी भी संकट का भारत की ऊर्जा सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर सीधा असर पड़ सकता है।
चाबहार बंदरगाह पर भारत की परियोजनाओं की क्या स्थिति है?
भारत ने चाबहार में जितनी विकास परियोजनाएँ शुरू की थीं, वे सब फिलहाल बंद पड़ी हैं। एससीओ समिट की बैठक में इन परियोजनाओं को पुनः सक्रिय करने पर चर्चा हो सकती है।
मोदी और पेजेश्कियन पहले कब मिले थे?
दोनों नेता इससे पहले अक्टूबर 2024 में मिल चुके हैं। एससीओ समिट में यह उनकी दूसरी मुलाकात होगी, लेकिन इस बार माहौल कहीं अधिक तनावपूर्ण है।
नेपाल आपदा में भारत ने क्या सहायता दी?
भारत ने नेपाल को 62 हज़ार टन सहायता सामग्री भेजी और बचाव दल रेकी के लिए रवाना किए। नेपाल ने शुरू में बाहरी बचाव दलों को मना किया था, लेकिन राशन, दवाइयों और धन की मदद स्वीकार की।
राष्ट्र प्रेस
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