दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति रामाफोसा की मांग: दास प्रथा की क्षतिपूर्ति हो, औपनिवेशिक लूट ने अफ्रीका को कर्जदार बनाया

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दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति रामाफोसा की मांग: दास प्रथा की क्षतिपूर्ति हो, औपनिवेशिक लूट ने अफ्रीका को कर्जदार बनाया

सारांश

दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति रामाफोसा ने अफ्रीका माह पर दास प्रथा की क्षतिपूर्ति की माँग को नई धार दी — सिर्फ मुआवजा नहीं, बल्कि FDI, बाजार पहुँच, कौशल हस्तांतरण और लूटी गई सांस्कृतिक धरोहरों की वापसी। यह माँग संयुक्त राष्ट्र के उस प्रस्ताव के बाद आई है जिसने दास प्रथा को 'मानवता के खिलाफ सबसे गंभीर अपराध' करार दिया।

मुख्य बातें

दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा ने 4 मई 2026 को अपने साप्ताहिक न्यूजलेटर में दास प्रथा की क्षतिपूर्ति की माँग दोहराई।
क्षतिपूर्ति में FDI वृद्धि , बाजार पहुँच , प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और सांस्कृतिक धरोहरों की बिना शर्त वापसी शामिल होनी चाहिए।
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने मार्च 2026 में दास प्रथा को 'मानवता के खिलाफ सबसे गंभीर अपराध' घोषित करने वाला प्रस्ताव पारित किया।
अमेरिका, इजरायल और अर्जेंटीना ने प्रस्ताव का विरोध किया; यूरोपीय संघ के सदस्य देशों ने मतदान से परहेज किया।
रामाफोसा के अनुसार, यूरोपीय साम्राज्यों ने सहारा और उत्तर अफ्रीका के स्लेव ट्रेड नेटवर्क के साथ मिलकर अंतरमहाद्वीपीय दास व्यापार को अंजाम दिया।

दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा ने 4 मई 2026 को अपने साप्ताहिक न्यूजलेटर में अफ्रीका माह के अवसर पर दास प्रथा के लिए क्षतिपूर्ति (रिपेरेशन्स) की मांग को दोहराया और कहा कि सदियों के शोषण तथा अफ्रीकी संसाधनों की व्यवस्थित लूट का असर आज भी महाद्वीप की अर्थव्यवस्थाओं पर गहराई से पड़ा हुआ है। रामाफोसा के अनुसार, यह ऐतिहासिक अन्याय अफ्रीकी देशों पर बढ़ते कर्ज के बोझ का एक प्रमुख कारण है।

क्षतिपूर्ति की परिभाषा: सिर्फ मुआवजा नहीं

रामाफोसा ने स्पष्ट किया कि क्षतिपूर्ति केवल आर्थिक मुआवजे तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उनके अनुसार इसमें प्रभावित अफ्रीकी देशों के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) में वृद्धि, वैश्विक बाजारों तक बेहतर पहुँच, प्रौद्योगिकी और कौशल हस्तांतरण, तथा सदियों पहले लूटी गई सांस्कृतिक धरोहरों की बिना शर्त वापसी भी शामिल होनी चाहिए।

उन्होंने रेखांकित किया कि दास प्रथा केवल लोगों की गुलामी तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह एक ऐसी व्यवस्था थी जिससे पूर्व दास मालिकों ने अमानवीय तरीकों से भारी संपत्ति अर्जित की। सिन्हुआ न्यूज एजेंसी के अनुसार, राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि इस संपत्ति में सांस्कृतिक वस्तुओं की लूट से हुई वृद्धि भी शामिल है, जिनमें से कई आज भी यूरोप के संग्रहालयों में प्रदर्शित हैं।

राष्ट्रपति के प्रमुख उद्धरण

रामाफोसा ने कहा,

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन व्यावहारिक रूप से जटिल भी — क्योंकि 'क्षतिपूर्ति' की कोई सर्वमान्य परिभाषा या अंतरराष्ट्रीय बाध्यकारी तंत्र अभी तक नहीं है। संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव का अमेरिका और यूरोपीय संघ द्वारा विरोध या परहेज यह दर्शाता है कि पश्चिमी देश इस एजेंडे को आगे बढ़ाने में अनिच्छुक हैं। गौरतलब है कि अफ्रीकी देशों का कर्ज संकट वास्तविक और गंभीर है, लेकिन उसके समाधान के लिए ऐतिहासिक जवाबदेही के साथ-साथ ठोस नीतिगत ढाँचे की भी जरूरत है। बिना किसी बाध्यकारी समझौते के, यह माँग नैतिक रूप से सशक्त होते हुए भी कूटनीतिक गतिरोध में फँसी रह सकती है।
RashtraPress
14 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सिरिल रामाफोसा ने दास प्रथा की क्षतिपूर्ति में क्या-क्या शामिल करने की माँग की है?
राष्ट्रपति रामाफोसा ने क्षतिपूर्ति में सिर्फ आर्थिक मुआवजा नहीं, बल्कि FDI में वृद्धि, वैश्विक बाजारों तक पहुँच, प्रौद्योगिकी और कौशल हस्तांतरण, तथा लूटी गई सांस्कृतिक धरोहरों की बिना शर्त वापसी शामिल करने की माँग की है। उनके अनुसार यह क्षतिपूर्ति अफ्रीकी देशों के विकास लक्ष्यों और कर्ज के बोझ को कम करने में मदद कर सकती है।
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने दास प्रथा पर क्या प्रस्ताव पारित किया?
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने मार्च 2026 में एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें दास प्रथा को 'मानवता के खिलाफ सबसे गंभीर अपराध' माना गया। अधिकांश देशों ने इसका समर्थन किया, जबकि अमेरिका, इजरायल और अर्जेंटीना ने विरोध किया और यूरोपीय संघ के सदस्य देशों ने मतदान से परहेज किया।
अफ्रीकी देशों का कर्ज बोझ दास प्रथा से कैसे जुड़ा है?
रामाफोसा के अनुसार, औपनिवेशिक शासन के दौरान अफ्रीकी संसाधनों और भूमि की व्यवस्थित लूट ने महाद्वीप को आर्थिक रूप से कमजोर किया, जिसकी विरासत आज के कर्ज संकट में दिखती है। उनका तर्क है कि यह कर्ज बोझ दास प्रथा और औपनिवेशिक शोषण की ऐतिहासिक देन है।
यूरोप के संग्रहालयों में रखी अफ्रीकी धरोहरों का क्या मामला है?
रामाफोसा ने कहा कि औपनिवेशिक काल में लूटी गई अनेक सांस्कृतिक वस्तुएँ आज भी यूरोप के संग्रहालयों में प्रदर्शित हैं। उन्होंने इन धरोहरों की बिना शर्त वापसी को क्षतिपूर्ति का एक अनिवार्य हिस्सा बताया।
दास प्रथा क्षतिपूर्ति की माँग में कौन से देश विरोध में हैं?
संयुक्त राष्ट्र के दास प्रथा प्रस्ताव का अमेरिका, इजरायल और अर्जेंटीना ने विरोध किया, जबकि यूरोपीय संघ के सदस्य देशों ने मतदान में भाग नहीं लिया। यह विभाजन दर्शाता है कि पश्चिमी देश क्षतिपूर्ति के एजेंडे पर एकमत नहीं हैं।
राष्ट्र प्रेस
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