ईरान वार्ता में कतर-पाकिस्तान की भूमिका पर अमेरिकी सीनेटरों ने उठाए सवाल, आतंकवाद समर्थन का आरोप
सारांश
मुख्य बातें
अमेरिकी रिपब्लिकन पार्टी के दो वरिष्ठ सीनेटरों ने 24 जून 2026 को ईरान के साथ चल रही युद्धविराम बातचीत में कतर और पाकिस्तान की मध्यस्थ भूमिका पर कड़े सवाल उठाए हैं। दोनों सीनेटरों ने इन देशों पर आतंकवाद को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से समर्थन देने का आरोप लगाते हुए वार्ता प्रक्रिया की निष्पक्षता पर संदेह जताया है।
सीनेटर रिक स्कॉट के आरोप
फ्लोरिडा के रिपब्लिकन सीनेटर रिक स्कॉट ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि 'अब तक सबको समझ आ जाना चाहिए कि हमारे असली दोस्त कौन हैं।' उन्होंने कहा कि कतर और पाकिस्तान का आतंकवादियों को पनाह देने का लंबा इतिहास रहा है और इस समय वे एक सही व स्थायी शांति हासिल करने से ज़्यादा ईरान के दशकों पुराने आतंकवादी अभियान को बढ़ावा देने में लगे दिख रहे हैं।
स्कॉट ने यह भी स्पष्ट किया कि एक ऐसे समझौते की अभी भी गुंजाइश है जिससे सभी पक्षों को फायदा हो, परंतु उन्होंने जोर देकर कहा कि इस पूरी प्रक्रिया से ईरान के परमाणु हथियार बनाने की संभावना 'ज़ीरो' होनी चाहिए।
सीनेटर टिम शीही की आपत्तियाँ
मोंटाना के रिपब्लिकन सीनेटर टिम शीही ने एक टेलीविज़न कार्यक्रम में पाकिस्तान की मध्यस्थ भूमिका पर आपत्ति जताते हुए याद दिलाया कि पाकिस्तान ने अल-कायदा के संस्थापक ओसामा बिन लादेन को अपनी सरज़मीन पर छिपाया था। उन्होंने पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई पर अमेरिका-विरोधी विद्रोही संगठनों की मदद करने का भी आरोप लगाया।
शीही ने कतर पर आतंकवादी संगठनों के लिए वित्तीय लेन-देन में सहायता करने के दशकों पुराने आरोपों का हवाला दिया। उन्होंने कहा, 'कतर और पाकिस्तान की इसमें भूमिका हो सकती है, लेकिन अगर वे बातचीत की मेज पर होंगे, तो यूएई, सऊदी अरब और इजरायल को भी वहाँ होना चाहिए।' शीही ने यह भी कहा कि इन देशों को निष्पक्ष मध्यस्थ मान लेना तर्कसंगत नहीं लगता।
स्विट्जरलैंड वार्ता की पृष्ठभूमि
दोनों सीनेटरों के ये बयान ऐसे समय में आए हैं जब कतर और पाकिस्तान ने स्विट्जरलैंड में हुई अमेरिका-ईरान वार्ता में मध्यस्थ की भूमिका निभाई है। यह वार्ता ईरान के साथ युद्धविराम समझौते को लागू करने के तौर-तरीकों पर केंद्रित रही।
ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने सोमवार को बताया कि स्विट्जरलैंड में हुई हालिया बातचीत में समझौते को लागू करने के तरीकों पर चर्चा हुई। उन्होंने कहा कि दोनों पक्षों ने तकनीकी और विशेषज्ञ स्तर की बातचीत जारी रखने पर सहमति जताई है ताकि युद्ध खत्म करने वाले समझौते को प्रभावी तरीके से अमल में लाया जा सके।
क्या होगा आगे
अमेरिकी सीनेट के भीतर उठती इन आवाज़ों से वार्ता प्रक्रिया पर राजनीतिक दबाव बढ़ सकता है। यह ऐसे समय में आया है जब अमेरिकी प्रशासन ईरान के साथ किसी स्थायी समझौते की दिशा में काम कर रहा है। आलोचकों का कहना है कि मध्यस्थ देशों की विश्वसनीयता पर सवाल उठने से वार्ता की प्रभावशीलता कमज़ोर पड़ सकती है। आने वाले हफ्तों में अमेरिकी विदेश नीति की दिशा और ईरान वार्ता का अगला दौर इस बहस को और तेज़ कर सकता है।