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1984 सिख दंगों की पीड़िता निरप्रीत कौर की माँग: 1 नवंबर को 'काला दिवस' घोषित करे सरकार

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1984 सिख दंगों की पीड़िता निरप्रीत कौर की माँग: 1 नवंबर को 'काला दिवस' घोषित करे सरकार

सारांश

चार दशक बाद भी न्याय अधूरा — 1984 में 16 साल की उम्र में पिता को जिंदा जलते देखने वाली निरप्रीत कौर की माँग है कि 1 नवंबर को आधिकारिक 'काला दिवस' बनाया जाए। उनका सवाल सीधा है: पीड़ित केवल नवंबर में याद किए जाते हैं — बाकी समय वे राजनेताओं की 'दुकान' बनकर रह जाते हैं।

मुख्य बातें

निरप्रीत कौर ने 1 नवंबर को आधिकारिक 'काला दिवस' घोषित करने की माँग की है।
1984 में 16 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपने पिता को पड़ोसियों और कथित राजनीतिक नेताओं द्वारा जिंदा जलाए जाते देखा।
उन्होंने इंस्पेक्टर एन.के.
कौशिक , पार्षद बलवान खोखर , किशन खोखर , पूर्व विधायक महेंद्र यादव और कैप्टन भागमल सिंह समेत कई नामों का आरोप के रूप में उल्लेख किया।
कांग्रेस नेता कमल नाथ पर कार्रवाई न होने पर सवाल उठाया; केंद्र सरकार से जवाब माँगा।
बेरोज़गार पीड़ितों को रोज़गार और फ्लैट देने की माँग; पुनर्वास प्रक्रिया को अधूरा बताया।
पूर्व आईजी किरण बेदी की सलाह पर तिहाड़ जेल से बाहर आने के बाद से कलम के ज़रिए लड़ाई जारी।

1984 के सिख-विरोधी दंगों की पीड़िता निरप्रीत कौर ने 1 नवंबर को आधिकारिक रूप से 'काला दिवस' घोषित करने की माँग की है, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ उस त्रासदी को भूल न सकें और पीड़ितों को न्याय व सम्मान मिल सके। चंडीगढ़ में अपना दर्द साझा करते हुए उन्होंने कहा कि चार दशक बाद भी न्याय की लड़ाई अधूरी है।

पिता की हत्या की दर्दभरी दास्तान

निरप्रीत कौर ने बताया कि 1984 में वे मात्र 16 वर्ष की थीं, जब उनके पिता को जिंदा जला दिया गया। उन्होंने कहा, '1984 में मैं 16 साल की थी, जब मेरे पिता को जिंदा जला दिया गया था। उन्हें मारने वाले कोई बाहरी लोग नहीं थे बल्कि हमारे पड़ोस के ही लोग और कुछ राजनीतिक नेता थे।'

उन्होंने अपने पिता की हत्या में कथित तौर पर शामिल व्यक्तियों के नाम भी गिनाए। निरप्रीत के अनुसार, 'मेरे पिता की हत्या में शामिल लोगों में इंस्पेक्टर एन.के. कौशिक, पार्षद बलवान खोखर, सज्जन कुमार का भतीजा, उसका भाई किशन खोखर, पूर्व विधायक महेंद्र यादव, और कैप्टन भागमल सिंह शामिल थे। कैप्टन भागमल सिंह उस समय नौसेना के अधिकारी थे और ड्यूटी पर थे; उन्होंने ही मेरे पिता को रस्सियों से बांधा था।'

न्याय की लड़ाई — कलम से अदालत तक

निरप्रीत कौर ने बताया कि उन्होंने अपनी कलम के ज़रिए लड़ाई जारी रखने का संकल्प लिया। उन्होंने कहा, 'जब मैं तिहाड़ जेल में थी, तब उस समय की आईजी किरण बेदी ने मुझे सलाह दी थी कि मैं अपनी कलम से लड़ूँ। जेल से बाहर आने के बाद भी मैंने यह लड़ाई जारी रखी, लेकिन यह कोशिश अभी अधूरी है, क्योंकि कुछ ही लोगों के खिलाफ कार्रवाई हुई है जबकि इसमें कई और लोग भी शामिल थे।'

गौरतलब है कि 1984 के दंगों में हज़ारों सिखों की जानें गई थीं और इससे जुड़े कई मामले दशकों तक अदालतों में विचाराधीन रहे। एक विशेष जाँच दल (SIT) गठित किया गया था, जिसके बाद कुछ दोषियों को सज़ा मिली — परंतु पीड़ित संगठनों का मानना है कि अब भी कई ज़िम्मेदार लोग बचे हुए हैं।

कमल नाथ पर सवाल, सरकार से कार्रवाई की माँग

निरप्रीत कौर ने कांग्रेस नेता कमल नाथ का नाम लेते हुए सवाल उठाया। उन्होंने कहा, 'कमल नाथ को क्यों बख्शा जा रहा है? उनके खिलाफ कोई मामला क्यों नहीं चलाया जा रहा? केंद्र सरकार को उनके खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए।' यह आरोप उन्होंने अपनी व्यक्तिगत गवाही के आधार पर लगाए; इस विषय में कमल नाथ की प्रतिक्रिया फिलहाल उपलब्ध नहीं है।

पीड़ितों के पुनर्वास पर नाराज़गी

निरप्रीत ने पुनर्वास के मुद्दे पर भी सरकारों को आड़े हाथों लिया। उनके अनुसार, 'जिन लोगों को अब तक एक बार भी नौकरी नहीं मिली है, उन्हें रोज़गार और फ्लैट दिए जाने चाहिए। बहुत समय बीत चुका है और पीड़ितों का फिर से पुनर्वास किया जाना चाहिए।'

उन्होंने 1947 की हिंसा से तुलना करते हुए एक तीखा सवाल उठाया — 'अगर आप 1947 की हिंसा को देखें, तो वह कहीं ज़्यादा बड़े पैमाने पर थी, फिर भी लोग आगे बढ़ गए और उनका पुनर्वास हो गया। 1984 के मामले में ऐसा क्यों नहीं हुआ, क्योंकि हम, 1984 के दंगों के पीड़ित, दूसरों के लिए कमाई का ज़रिया बन गए हैं। हम एक तरह से 'दुकान' हैं, और वे 'दुकानदार' हैं।'

राजनीति बनाम न्याय

निरप्रीत कौर की पीड़ा केवल स्मृति तक सीमित नहीं है — वह व्यवस्था पर भी सवाल उठाती हैं। उन्होंने कहा, 'जब भी नवंबर आता है, लोग 1984 की वजह से हमें याद करते हैं, लेकिन बाकी समय सब हमें भूल जाते हैं। हर कोई इस पर राजनीति कर रहा है; आज भी, यह सब सिर्फ राजनीति ही है।'

यह ऐसे समय में आया है जब 1984 के दंगों की 42वीं वर्षगाँठ के अवसर पर देश भर में पीड़ित संगठन और सिख समुदाय के प्रतिनिधि स्मरण कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं। निरप्रीत कौर की माँग है कि 1 नवंबर को आधिकारिक 'काला दिवस' घोषित किया जाए — ताकि यह दिन केवल नेताओं के भाषणों तक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्मृति का स्थायी हिस्सा बने।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि जब SIT गठित हुई, कुछ दोषियों को सज़ा भी मिली — तो बाकी नामज़द आरोपियों पर कार्रवाई क्यों अटकी है? पीड़ितों को 'दुकान' वाला रूपक महज़ आक्रोश नहीं, बल्कि राजनीतिक पारिस्थितिकी का कड़वा सच है — हर चुनाव से पहले 1984 उठता है, हर बार बिना ठोस परिणाम के। मुख्यधारा की कवरेज जो चूकती है वह यह है कि पुनर्वास की माँग — रोज़गार, आवास, सम्मान — उतनी ही ज़रूरी है जितनी दोषसिद्धि, और इस पर राजनीतिक इच्छाशक्ति लगभग नदारद रही है।
RashtraPress
4 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

निरप्रीत कौर कौन हैं और उनकी माँग क्या है?
निरप्रीत कौर 1984 के सिख-विरोधी दंगों की एक पीड़िता हैं, जिन्होंने 16 वर्ष की उम्र में अपने पिता को जिंदा जलाए जाते देखा था। वे 1 नवंबर को आधिकारिक 'काला दिवस' घोषित करने और 1984 के सभी दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की माँग कर रही हैं।
'काला दिवस' क्या है और इसे 1 नवंबर को क्यों मनाने की माँग है?
1 नवंबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिख-विरोधी दंगों का सबसे भयावह दौर शुरू हुआ था, जिसमें देश भर में हज़ारों सिखों की जानें गईं। पीड़ित संगठन इस दिन को आधिकारिक 'काला दिवस' घोषित कराना चाहते हैं ताकि राष्ट्रीय स्तर पर इस त्रासदी को मान्यता मिले और आने वाली पीढ़ियाँ इसे याद रखें।
निरप्रीत कौर ने किन लोगों पर आरोप लगाए हैं?
निरप्रीत कौर ने अपने पिता की हत्या में इंस्पेक्टर एन.के. कौशिक, पार्षद बलवान खोखर, सज्जन कुमार के भतीजे, किशन खोखर, पूर्व विधायक महेंद्र यादव और नौसेना अधिकारी कैप्टन भागमल सिंह का नाम लिया है। ये आरोप उनकी व्यक्तिगत गवाही पर आधारित हैं।
कमल नाथ का 1984 दंगों से क्या संबंध बताया गया है?
निरप्रीत कौर ने कांग्रेस नेता कमल नाथ पर सवाल उठाते हुए माँग की है कि केंद्र सरकार उनके खिलाफ कार्रवाई करे। उन्होंने पूछा कि कमल नाथ को क्यों बख्शा जा रहा है। इस पर कमल नाथ की ओर से कोई प्रतिक्रिया फिलहाल सामने नहीं आई है।
1984 दंगा पीड़ितों के पुनर्वास की स्थिति क्या है?
निरप्रीत कौर के अनुसार, कई पीड़ितों को अब तक न रोज़गार मिला और न पर्याप्त आवास। उनकी माँग है कि जिन्हें अब तक कोई सरकारी सहायता नहीं मिली, उन्हें नौकरी और फ्लैट दिए जाएँ। उन्होंने 1947 की हिंसा के पीड़ितों के पुनर्वास से तुलना करते हुए इसे अधूरा बताया।
राष्ट्र प्रेस
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