मुस्लिम राष्ट्रीय मंच का 'आओ जड़ों से जुड़ें' अभियान: इंद्रेश कुमार बोले — धर्म अलग, पर वतन और जड़ें एक
सारांश
मुख्य बातें
मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने 9 अगस्त 2026 को नई दिल्ली के राजघाट स्थित गांधी स्मृति दर्शन में एक राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित कर 'आओ जड़ों से जुड़ें' अभियान को देशव्यापी स्तर पर विस्तार देने का संकल्प लिया। सम्मेलन का केंद्रीय संदेश था कि भारत में रहने वाले लोगों की पूजा-पद्धति और धार्मिक मान्यताएं भले ही अलग हों, किंतु उनकी मातृभूमि, नागरिक पहचान और साझा विरासत उन्हें अटूट रूप से जोड़ती है।
अभियान का उद्देश्य और पृष्ठभूमि
देश में सामाजिक दूरी, आपसी अविश्वास और नफरत की बढ़ती घटनाओं के बीच यह सम्मेलन एक सुनियोजित सामाजिक हस्तक्षेप के रूप में आयोजित किया गया। 'आओ जड़ों से जुड़ें' अभियान के राष्ट्रीय संयोजक डॉ. ताहिर हुसैन ने प्रस्तावना रखते हुए स्पष्ट किया कि यह पहल किसी एक वर्ग या समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि समूचे भारतीय समाज को संबोधित करती है। उन्होंने कहा कि समाज को कमज़ोर करने वाली सबसे बड़ी ताकत वह सोच है जो धर्म, जाति, भाषा या क्षेत्र के नाम पर लोगों के बीच दूरी पैदा करती है।
अभियान की राष्ट्रीय संयोजक डॉ. शालिनी अली ने कहा कि भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी विविधता है और इस विविधता को कमज़ोरी नहीं, बल्कि देश की शक्ति के रूप में देखा जाना चाहिए। उनका यह भी कहना था कि सामाजिक शांति केवल कानून से नहीं आती — इसके लिए परिवार, विद्यालय और समुदाय के स्तर पर निरंतर संवाद आवश्यक है।
इंद्रेश कुमार का संबोधन
सम्मेलन की अध्यक्षता मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के मार्गदर्शक और वरिष्ठ संघ नेता इंद्रेश कुमार ने की। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति का धर्म उसकी आस्था का विषय हो सकता है, पूजा-पद्धति अलग हो सकती है, लेकिन इससे उसकी भारतीय पहचान खत्म नहीं होती। उन्होंने कहा, "हम हिंदुस्तानी थे और हैं। इस सफर का इम्तेहान हमें रोज और 24 घंटे देना है।"
इंद्रेश कुमार ने अभियान को लेकर किसी भी गलतफहमी को दूर करते हुए स्पष्ट किया कि 'आओ जड़ों से जुड़ें' का उद्देश्य धर्मांतरण नहीं है। उन्होंने कहा कि इस पहल का मकसद भारत के लोगों को अपनी साझा विरासत समझाना, एक-दूसरे के धर्म और विश्वास का सम्मान करना तथा भारतीय एकता को मजबूत करना है। उन्होंने 1 से 15 अगस्त तक चलाए जा रहे 'हर घर तिरंगा' और 'घर-घर तिरंगा' अभियान में अधिकतम भागीदारी का आह्वान करते हुए कहा कि तिरंगा किसी एक दल या समुदाय का नहीं, पूरे देश की साझा पहचान है।
अन्य वक्ताओं के विचार
एनसीएमईआई के ऑफिशिएटिंग चेयरमैन डॉ. शाहिद अख्तर ने कहा, "एक कौम, एक वतन — हिंदुस्तान। हमारे पूर्वज सब एक थे। हम भारतीय थे, भारतीय हैं और भारतीय रहेंगे।" उन्होंने कहा कि आज ज़रूरत इस बात की है कि समाज में फैल रही नफरत और अविश्वास के बीच इंसानियत, एकता और अखंडता की आवाज़ को और मजबूत किया जाए।
ख्वाजा गरीब नवाज यूनिवर्सिटी के पूर्व वाइस चांसलर प्रो. माहरुख मिर्जा ने इंसानियत और साझा मानव विरासत पर जोर देते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को संकट में देखकर सबसे पहले उसकी जाति या धर्म नहीं पूछा जाना चाहिए। स्वामी दिनेशानंद महाराज ने राष्ट्रीय पहचान और नागरिकता के महत्व पर बल देते हुए कहा कि हर व्यक्ति की अपनी धार्मिक पहचान हो सकती है, लेकिन राष्ट्रीय पहचान सभी को एक सूत्र में जोड़ती है।
सम्मेलन में मोहम्मद अफजल, तुषारकांत हिन्दुस्थानी, गिरीश जूआल, मौलाना जुरूदिन, प्रो. आसिफ मलिक, एडवोकेट गुलाम साहब, प्रो. गीता सिंह, मेजर जनरल जावेद साहब, प्रो. मेरी और मूसा खान सनातनी मुसलमान सहित अनेक वक्ताओं ने अभियान के उद्देश्य का समर्थन किया।
आम जनता और युवाओं पर असर
सम्मेलन में वक्ताओं ने युवाओं से विशेष रूप से अपील की कि वे सोशल मीडिया पर फैलने वाली अफवाहों और नफरत भरी सामग्री से सावधान रहें और तथ्यों, संवाद तथा समझदारी के आधार पर समाज को आगे ले जाने में भूमिका निभाएं। यह बात भी रेखांकित की गई कि देश को सांप्रदायिक तनाव के साथ-साथ भेदभाव, अशिक्षा, बेरोजगारी और सामाजिक असमानता जैसी समस्याओं से भी मुक्त करना होगा।
आगे की राह
राजघाट से उठी इस आवाज़ ने यह संदेश देने की कोशिश की कि नफरत का जवाब नफरत नहीं, बल्कि संवाद, सम्मान और भाईचारा है। 'आओ जड़ों से जुड़ें' अभियान को अब देश के अलग-अलग हिस्सों तक ले जाने की तैयारी है, जिसका आधार यह विचार है कि व्यक्ति की धार्मिक आस्था, पूजा-पद्धति और सामाजिक परंपराएं अलग हो सकती हैं — लेकिन देश, संविधान, नागरिकता और मातृभूमि साझा हैं।