आदित्य ठाकरे बने शिवसेना (यूबीटी) टूट की वजह: मंत्री नितेश राणे का बड़ा आरोप
सारांश
मुख्य बातें
महाराष्ट्र सरकार में मंत्री नितेश राणे ने शुक्रवार, 19 जून को मुंबई में पत्रकारों से बातचीत में दावा किया कि शिवसेना (यूबीटी) से नेताओं के पलायन की असली वजह आदित्य ठाकरे हैं। राणे ने शिवसेना (यूबीटी) की तुलना तृणमूल कांग्रेस (TMC) से करते हुए कहा कि जिस तरह TMC में अभिषेक बनर्जी की भूमिका है, वैसी ही भूमिका शिवसेना (यूबीटी) में आदित्य ठाकरे की है।
नितेश राणे के मुख्य आरोप
राणे ने कहा कि शिवसेना (यूबीटी) छोड़ने वाले नेताओं ने स्वयं यह बात सामने रखी है कि आदित्य ठाकरे शिवसेना (यूबीटी) का विलय कांग्रेस में कराना चाहते थे। उन्होंने यह भी दावा किया कि कथित तौर पर आदित्य ठाकरे और कांग्रेस नेता राहुल गांधी के बीच मुलाकात हुई थी, जिसमें आदित्य को कांग्रेस का महासचिव (जनरल सेक्रेटरी) पद देने पर सहमति बनी थी। हालांकि, राणे ने इस दावे के साथ स्पष्ट किया कि यह उन्होंने 'सुना है' — इसकी स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है।
सांसदों के एकनाथ शिंदे गुट में जाने की वजह
राणे के अनुसार, जो सांसद बाला साहेब ठाकरे के सिद्धांतों पर चलते आए थे, वे कांग्रेस में विलय का विचार स्वीकार नहीं कर सके। इसी कारण उन्होंने एकनाथ शिंदे की शिवसेना में शामिल होने का निर्णय लिया। राणे ने कहा कि इन सांसदों ने कांग्रेस में जाने से सीधे इनकार कर दिया था।
संजय राउत पर निशाना
भारतीय जनता पार्टी (BJP) के विधायक संजय उपाध्याय ने भी शिवसेना (यूबीटी) की स्थिति पर टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि संजय राउत अपने नेतृत्व को खुश करने में व्यस्त रहे, लेकिन अपने सांसदों के साथ संवाद बनाए रखने में विफल रहे। उपाध्याय के अनुसार, राउत ने सांसदों को विश्वास में लेने के बजाय उन्हें अपमानित किया और अभद्र भाषा का प्रयोग किया, जो पार्टी के भीतर असंतोष का प्रमुख कारण बना।
नितेश राणे ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि यदि उद्धव ठाकरे के पास संजय राउत जैसे सलाहकार हैं, तो उन्हें किसी बाहरी दुश्मन की आवश्यकता नहीं है।
राजनीतिक पृष्ठभूमि
गौरतलब है कि 2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में हुई बगावत के बाद से शिवसेना दो धड़ों में बँट चुकी है — शिंदे गुट और उद्धव ठाकरे का यूबीटी गुट। तब से यूबीटी गुट से नेताओं के पलायन की खबरें लगातार आती रही हैं। आलोचकों का कहना है कि इस तरह के आरोप सत्तापक्ष की ओर से विपक्ष को कमज़ोर दिखाने की रणनीति का हिस्सा हो सकते हैं।
आगे क्या
शिवसेना (यूबीटी) की ओर से इन आरोपों पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। महाराष्ट्र की राजनीति में यह घटनाक्रम आगामी स्थानीय निकाय चुनावों की पृष्ठभूमि में और अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है।