मुंबई में आदिवासी छात्रों का 'हल्ला बोल': 48 दिन आंदोलन, 500 से अधिक गिरफ्तार, स्कॉलरशिप वसूली के आरोप
सारांश
मुख्य बातें
महाराष्ट्र में आदिवासी छात्रों का आंदोलन 5 अक्टूबर 2026 को मुंबई पहुँच गया, जब नासिक के ईदगाह मैदान से शुरू हुआ यह प्रदर्शन 48 दिनों बाद राजनीतिक हलचल का केंद्र बन गया। छात्र नेता सागर पावरा ने प्रशासन पर अनुमति न देने, 500 से अधिक छात्रों को गिरफ्तार करने और आंदोलन को बलपूर्वक दबाने का आरोप लगाया है। आश्रमशालाओं में छात्रों की मौतें, खराब भोजन और स्कॉलरशिप की आड़ में वसूली — ये मुद्दे इस आंदोलन की धुरी हैं।
आंदोलन की पृष्ठभूमि और मुंबई तक का सफर
छात्र नेता सागर पावरा के अनुसार, नासिक के ईदगाह मैदान में पहले 13 दिनों तक अनशन चला, उसके बाद 42 दिनों का धरना हुआ। 28 सितंबर को छात्र नासिक से मुंबई के लिए रवाना हुए। पावरा ने बताया कि उन्होंने 3 और 4 अक्टूबर को स्वयं पुलिस स्टेशन जाकर प्रदर्शन की अनुमति माँगने की कोशिश की, लेकिन चार घंटे इंतजार के बाद भी लिखित अनुमति नहीं मिली। उन्होंने कहा, "वो लिखित में भी कुछ नहीं दे रहे थे।"
यह ऐसे समय में आया है जब महाराष्ट्र में आदिवासी छात्रों की शैक्षणिक और रहन सहन संबंधी समस्याएँ लंबे समय से अनसुनी रही हैं। गौरतलब है कि राज्य में आश्रमशालाओं में रहने वाले आदिवासी छात्रों की स्थिति को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं।
गिरफ्तारियाँ और प्रशासन पर आरोप
पावरा के अनुसार, जब छात्र तिलक भवन में ठहरे, तो पुलिस सुबह ही पहुँच गई और तीन लड़कियों को डिटेन किया गया। बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन — हर जगह से छात्रों को हिरासत में लेने की कोशिश की गई। पावरा ने दावा किया कि 500 से अधिक छात्रों को गिरफ्तार किया गया। रहने की व्यवस्था न होने पर कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की मदद से रहने और खाने पीने का इंतजाम हुआ।
प्रशासन की ओर से इन आरोपों पर अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
आश्रमशालाओं में मौतें और खराब भोजन
सागर पावरा ने कहा कि पिछले दो वर्षों में आश्रमशालाओं में कई छात्रों की मौत हुई है और इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की माँग है। उन्होंने आदिवासी विकास मंत्री के इस्तीफे और संबंधित अधिकारियों के निलंबन की भी माँग की।
भोजन के मुद्दे पर पावरा ने कहा कि सेंट्रलाइज्ड किचन से 80 से 100 किलोमीटर दूर तक खाना भेजा जाता है, जो पहुँचते पहुँचते खाने लायक नहीं रहता। उन्होंने माँग की कि इस किचन व्यवस्था को तत्काल बंद किया जाए।
स्कॉलरशिप में वसूली के गंभीर आरोप
आंदोलन के सबसे संवेदनशील मुद्दों में से एक है — स्कॉलरशिप की आड़ में वसूली। पावरा ने आरोप लगाया कि सरकारी छात्रवृत्ति के नियमों में स्पष्ट लिखा है कि इससे एक भी रुपया नहीं लिया जा सकता, फिर भी कॉलेजों द्वारा डोनेशन के नाम पर ₹1 से ₹1.5 लाख तक वसूले जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि पैसे न देने पर छात्रों को दस्तावेज देने से इनकार किया जाता है और धमकियाँ दी जाती हैं।
ये आरोप, यदि सिद्ध होते हैं, तो सरकारी योजनाओं में गहरी खामियों और भ्रष्टाचार की ओर संकेत करते हैं।
आंदोलन की मुख्य माँगें
छात्र नेता पावरा ने स्पष्ट किया कि उनकी माँगें संविधान प्रदत्त मूलभूत शैक्षणिक अधिकारों तक सीमित हैं — न अधिक, न कम। आने वाले दिनों में यदि सरकार ने सुनवाई नहीं की, तो आंदोलन का विस्तार और तेज होने की संभावना है। महाराष्ट्र में आदिवासी समुदाय की राजनीतिक उपस्थिति को देखते हुए यह मसला राज्य सरकार के लिए लंबे समय तक दबाव का स्रोत बना रह सकता है।