चांदीवाल आयोग रिपोर्ट सार्वजनिक करें: अनिल देशमुख ने महाराष्ट्र गवर्नर को लिखा पत्र
सारांश
मुख्य बातें
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) के नेता और महाराष्ट्र के पूर्व गृह मंत्री अनिल देशमुख ने 17 जून 2026 को महाराष्ट्र के राज्यपाल जिष्णु देव वर्मा को पत्र लिखकर मांग की है कि वे राज्य सरकार को चांदीवाल आयोग की अंतिम रिपोर्ट तत्काल सार्वजनिक करने का निर्देश दें। यह आयोग मुंबई के पूर्व पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह द्वारा देशमुख पर लगाए गए ₹100 करोड़ की मासिक वसूली के आरोपों की जांच के लिए गठित किया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
मार्च 2021 में तत्कालीन मुख्यमंत्री को लिखे एक पत्र में परमबीर सिंह ने आरोप लगाया था कि देशमुख ने पुलिस अधिकारियों को ₹100 करोड़ की मासिक 'वसूली' का लक्ष्य दिया था। देशमुख ने इन आरोपों को सिरे से नकारा था। बाद में बॉम्बे उच्च न्यायालय ने सीबीआई को प्रारंभिक जांच का आदेश दिया, जिसके बाद देशमुख ने गृह मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था।
राज्य सरकार ने इन आरोपों की जांच के लिए बॉम्बे उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति के.यू. चांदीवाल की अध्यक्षता में एक जांच आयोग का गठन किया था।
रिपोर्ट चार साल से दबी है
देशमुख ने राज्यपाल को लिखे पत्र में बताया कि चांदीवाल आयोग ने 26 अप्रैल 2022 को अपनी 1,400 पन्नों की अंतिम रिपोर्ट सरकार को सौंप दी थी। इसके बावजूद रिपोर्ट मिलने के चार साल बाद तक महाराष्ट्र सरकार ने इसे सार्वजनिक नहीं किया है।
यह ऐसे समय में आया है जब जांच की पारदर्शिता को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठाता रहा है। गौरतलब है कि किसी भी जांच आयोग की रिपोर्ट को समयबद्ध तरीके से सार्वजनिक करना लोकतांत्रिक जवाबदेही का बुनियादी तकाज़ा माना जाता है।
देशमुख के प्रयास
अनिल देशमुख के अनुसार, उन्होंने रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग को लेकर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को 11 पत्र लिखे हैं। इसके अलावा उन्होंने संबंधित विभागों के मुख्य सचिव और सचिवों को भी पत्र भेजे हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस प्रतिक्रिया नहीं मिली है।
राज्यपाल से क्या मांग
देशमुख ने राज्यपाल जिष्णु देव वर्मा से दो स्पष्ट मांगें रखी हैं — पहली, राज्य सरकार को 1,400 पन्नों की पूरी रिपोर्ट प्रकाशित करने का निर्देश दिया जाए; और दूसरी, रिपोर्ट सार्वजनिक करने में हुई देरी के कारणों की जांच की जाए। आलोचकों का कहना है कि रिपोर्ट को दबाए रखना न्यायिक प्रक्रिया की भावना के विरुद्ध है।
आगे क्या होगा
अब यह देखना होगा कि राज्यपाल कार्यालय इस पत्र पर क्या रुख अपनाता है और क्या महाराष्ट्र सरकार चार साल से लंबित इस रिपोर्ट को जनता के सामने रखती है। यह मामला महाराष्ट्र की राजनीति में पारदर्शिता और जवाबदेही की बहस को नई धार दे सकता है।