आषाढ़ अमावस्या 2025: त्रिवेणी संगम पर उमड़े श्रद्धालु, पिंडदान-तर्पण से पितरों को दी श्रद्धांजलि
सारांश
मुख्य बातें
प्रयागराज के पवित्र त्रिवेणी संगम पर 14 जुलाई 2025 को आषाढ़ अमावस्या के अवसर पर हजारों श्रद्धालु एकत्रित हुए और गंगा, यमुना व सरस्वती के पावन संगम में आस्था की डुबकी लगाई। श्रद्धालुओं ने पूर्वजों की आत्मा की शांति, परिवार की सुख-समृद्धि और जीवन में मंगल की कामना करते हुए पिंडदान, तर्पण, श्राद्ध और दान-पुण्य जैसे धार्मिक अनुष्ठान संपन्न किए। इस वर्ष अमावस्या का मंगलवार को पड़ना इसे और अधिक फलदायी मानने का कारण बना।
मंगलवार की अमावस्या का विशेष महत्व
संगम तट पर उपस्थित एक साधु ने धार्मिक महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि संगम में स्नान का महत्व हर समय रहता है, किंतु अमावस्या का दिन विशेष माना जाता है। उन्होंने बताया कि मंगलवार के दिन पड़ने वाली अमावस्या को अत्यंत फलदायी माना जाता है। साधु के अनुसार, इस दिन पितरों के लिए किए गए पिंडदान, श्राद्ध, तर्पण और दान से पूर्वज प्रसन्न होते हैं।
पितर-तृप्ति से देवकृपा का मार्ग
साधु ने आगे कहा कि जब पितर प्रसन्न होते हैं, तब देवी-देवताओं की कृपा भी प्राप्त होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस पावन दिन किए गए सत्कर्मों से परिवार में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है। गौरतलब है कि प्रयागराज का त्रिवेणी संगम वर्षभर तीर्थयात्रियों के लिए आस्था का केंद्र बना रहता है, परंतु अमावस्या तिथियों पर यहाँ श्रद्धालुओं की संख्या कई गुना बढ़ जाती है।
श्रद्धालुओं की आवाज़
संगम में स्नान करने पहुँचे श्रद्धालु कमलेश पांडेय ने बताया कि अमावस्या का दिन पितरों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। उन्होंने कहा कि पूर्वजों के नाम से तर्पण और दान-पुण्य करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है, और बड़ी संख्या में श्रद्धालु संगम पर पहुँचकर परिवार की सुख-शांति और खुशहाली की प्रार्थना करते हैं।
एक अन्य श्रद्धालु ने कहा कि इस बार अमावस्या मंगलवार को पड़ी है, जिससे इसका महत्व और बढ़ गया है। उन्होंने बताया कि लोग गंगा माँ से देश की खुशहाली और सभी की मनोकामनाएँ पूर्ण होने की प्रार्थना कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि पितरों को प्रसन्न रखना आवश्यक है, क्योंकि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जब पितर संतुष्ट होते हैं तो परिवार में सुख और समृद्धि बनी रहती है।
आस्था और परंपरा का संगम
यह ऐसे समय में आया है जब उत्तर प्रदेश में धार्मिक पर्यटन और तीर्थाटन को सरकारी स्तर पर भी प्रोत्साहन मिल रहा है। प्रयागराज, जो महाकुंभ 2025 की भव्य मेजबानी कर चुका है, हर पर्व-तिथि पर श्रद्धालुओं के लिए स्वाभाविक आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। आषाढ़ अमावस्या पर उमड़ी यह भीड़ इस नगरी की अटूट धार्मिक आस्था का प्रमाण है।