असम यूसीसी विधेयक पर ओवैसी का तीखा हमला: 'यह लैंगिक न्याय से कोसों दूर, किसी को नहीं चाहिए यह कानून'
सारांश
मुख्य बातें
ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने 25 मई 2026 को असम में पेश किए गए समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि यह कानून न तो वास्तव में 'समान' है और न ही लैंगिक न्याय की कसौटी पर खरा उतरता है। असम विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी (BJP) सरकार द्वारा सोमवार को पेश किए गए इस विधेयक ने विपक्षी दलों की तीखी प्रतिक्रिया को जन्म दिया है।
ओवैसी का एक्स पर हमला
ओवैसी ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट करते हुए लिखा कि यह संहिता 'बिल्कुल भी समान नहीं है', क्योंकि यह जनजातीय समुदायों को यूसीसी के दायरे से पूरी तरह बाहर रखती है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब अनुच्छेद 29 के तहत हर समुदाय को अपनी संस्कृति की रक्षा का अधिकार है, तो केवल आदिवासियों की स्वायत्तता को ही संरक्षण क्यों दिया जा रहा है। ओवैसी ने यह भी कहा कि संविधान सभा ने कभी किसी अनिवार्य यूसीसी की कल्पना नहीं की थी।
विरासत कानून पर ओवैसी की आपत्ति
ओवैसी ने विरासत के प्रावधानों पर विशेष आपत्ति जताई। उनका कहना था कि इस्लामी कानून में कोई भी वारिस को विरासत से वंचित नहीं कर सकता और न ही ऐसी वसीयत लिखी जा सकती है जिससे संपत्ति केवल एक बेटे को मिले या बेटी को उसके उचित हिस्से से महरूम किया जाए। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रस्तावित यूसीसी किसी को भी इस प्रकार की वसीयत लिखने की अनुमति देता है, जिससे बेटियाँ उनके वाजिब हक से वंचित हो सकती हैं। ओवैसी ने इसे 'लैंगिक न्याय से कोसों दूर' करार दिया।
कांग्रेस विधायकों की प्रतिक्रिया
कांग्रेस विधायक जॉय प्रकाश दास ने कहा कि उनकी पार्टी का रुख बिल्कुल स्पष्ट है। उन्होंने सवाल किया कि यदि यूसीसी वास्तव में लाभकारी है, तो फिर आदिवासी समुदायों को इसके दायरे से बाहर क्यों रखा जा रहा है। एक अन्य कांग्रेस विधायक रेकिबुद्दीन अहमद ने इसे 'पूर्व-नियोजित चाल' बताते हुए कहा कि कांग्रेस इसका 'जोरदार विरोध' करेगी। अहमद ने आरोप लगाया कि यह विधेयक एक विशेष समुदाय को समाप्त करने की योजना का हिस्सा है।
क्या होगा आगे
यह ऐसे समय में आया है जब उत्तराखंड पहले ही यूसीसी लागू कर चुका है और केंद्र सरकार पर भी इस दिशा में कदम उठाने का दबाव है। असम में यूसीसी विधेयक का पारित होना या न होना आने वाले दिनों में राष्ट्रीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकता है। विपक्षी दलों के कड़े विरोध के बीच विधानसभा में इस पर चर्चा और मतदान की प्रक्रिया निर्णायक रहेगी।