तमिलनाडु में बकरीद पर मस्जिदों-ईदगाहों में उमड़े हजारों नमाजी, शांतिपूर्ण माहौल में मनाई ईद-उल-अजहा
सारांश
मुख्य बातें
तमिलनाडु में 28 मई 2026 को ईद-उल-अजहा (बकरीद) का पर्व श्रद्धा, उत्साह और सामुदायिक एकता के साथ मनाया गया। राज्यभर की मस्जिदों, खुले मैदानों और स्टेडियमों में हजारों नमाजियों ने विशेष ईद की नमाज अदा की। चेन्नई से लेकर तिरुनेलवेली तक, हर कोने में बकरीद का उल्लास देखने को मिला।
त्योहार का महत्व और पृष्ठभूमि
बकरीद इस्लामी कैलेंडर के महीने जिलहिज्जा की 10वीं तारीख को मनाई जाती है। यह पर्व पैगंबर इब्राहिम की उस अटूट आस्था की स्मृति में है, जिसमें उन्होंने खुदा के आदेश पर अपने पुत्र की कुर्बानी देने का संकल्प लिया था। इस्लामी परंपरा में यह त्याग, करुणा और ईश्वर-भक्ति का प्रतीक माना जाता है।
नमाज के बाद परिवारों ने पारंपरिक कुर्बानी की रस्म अदा की, जिसमें बकरों, मवेशियों और अन्य अनुमत पशुओं की कुर्बानी दी गई। इस्लामी परंपरा के अनुसार कुर्बानी के मांस का एक बड़ा हिस्सा गरीब और जरूरतमंद लोगों में वितरित किया गया, शेष रिश्तेदारों और पड़ोसियों में बाँटा गया।
चेन्नई में उत्सव का माहौल
चेन्नई के पेरंबूर, ओटेरी, रोयापुरम, पुरसावक्कम, अन्ना नगर, आइस हाउस, वाशरमेनपेट, टोंडियारपेट और कोडुंगैयूर सहित दर्जनों इलाकों में बकरीद का पर्व बड़े उत्साह से मनाया गया। नए पारंपरिक परिधान पहने पुरुष, महिलाएँ और बच्चे सुबह से ही नमाज स्थलों पर एकत्र होने लगे। नमाज की समाप्ति के बाद लोगों ने एक-दूसरे को गले लगाकर बधाइयाँ दीं।
तिरुनेलवेली और अन्य जिलों में भी जोश
तिरुनेलवेली जिले के मुस्लिम बहुल मेलापालयम क्षेत्र में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु नमाज के लिए जमा हुए। राज्य के अन्य जिलों में भी मस्जिदों और खुले स्टेडियमों में विशेष नमाज का आयोजन हुआ, जहाँ हर उम्र के लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासन की तैयारी
तमिलनाडु प्रशासन ने त्योहार को शांतिपूर्वक संपन्न कराने के लिए व्यापक इंतजाम किए। नमाज स्थलों के आसपास कड़ी सुरक्षा और यातायात प्रबंधन की व्यवस्था की गई थी। राजनीतिक और सामाजिक नेताओं ने इस अवसर पर शांति, भाईचारे और सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने की अपील की।
धार्मिक संदेश और सामाजिक सौहार्द
धार्मिक विद्वानों ने अपने संबोधनों में बकरीद के मूल मूल्यों — त्याग, करुणा, दान और सामाजिक एकता — पर जोर दिया। देश में शांति, समृद्धि और सांप्रदायिक सौहार्द के लिए विशेष दुआएँ भी की गईं। यह पर्व एक बार फिर तमिलनाडु की बहुधर्मी सामाजिक संरचना की मिसाल बना।