बकरीद पर खंडवा के काजी सैयद निसार अली का संदेश: फिजूलखर्ची छोड़ें, पर्यावरण बचाएं
सारांश
मुख्य बातें
मध्य प्रदेश के खंडवा में ईद-उल-अजहा (बकरीद) का पर्व 28 मई को धार्मिक उत्साह और सामाजिक जागरूकता के संदेशों के साथ मनाया गया। शहर की 44 मस्जिदों और ईदगाह में सुबह नमाज अदा की गई, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए।
काजी का मुख्य संदेश
काजी सैयद निसार अली ने नमाज से पूर्व और पश्चात समाज को कई अहम संदेश दिए। उन्होंने कहा कि इस्लाम धर्म में भी फिजूलखर्ची को गलत माना गया है और हर व्यक्ति को अपनी दिनचर्या में सादगी अपनानी चाहिए। उन्होंने लोगों से डीजल और पेट्रोल की खपत कम करने, जरूरत के अनुसार वाहनों का उपयोग करने और पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी निभाने की अपील की।
प्रधानमंत्री की अपीलों का समर्थन
काजी सैयद निसार अली ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देशहित में की गई सात प्रमुख अपीलों का उल्लेख करते हुए लोगों को उनके प्रति जागरूक किया। उन्होंने कहा कि विदेशी आयातित वस्तुओं और ईंधन पर निर्भरता कम की जानी चाहिए। उनका कहना था कि प्रधानमंत्री मोदी हमेशा देशहित में सोचते हैं और उनकी सकारात्मक पहलों को समाज के हर वर्ग तक पहुँचाया जाना चाहिए।
पौधरोपण अभियान
काजी ने प्रधानमंत्री मोदी के इटली दौरे का उल्लेख करते हुए कहा कि जिस प्रकार उन्होंने 'एक पेड़ माँ के नाम' पर पौधा लगाया, उसी भावना को आगे बढ़ाते हुए ईदगाह में नमाज अदा करने आए श्रद्धालुओं को पौधे वितरित किए गए। यह पहल लोगों को अपने घरों और आसपास के क्षेत्रों में पौधरोपण के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से की गई।
कुर्बानी विवाद पर प्रतिक्रिया
देश में कुर्बानी को लेकर चल रहे विवादों पर काजी सैयद निसार अली ने कहा कि गाय को लेकर सड़कों पर तनाव और मॉब लिंचिंग जैसी घटनाएँ सामाजिक सौहार्द के लिए हानिकारक हैं। ऐसी परिस्थितियों को देखते हुए समाज से अपील की गई कि गोवंश की कुर्बानी न दी जाए। उन्होंने यह भी कहा कि मुस्लिम समाज प्रधानमंत्री मोदी से गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की माँग करता है।
नशामुक्ति और सामाजिक सौहार्द
काजी सैयद निसार अली ने धार्मिक और सामाजिक आयोजनों के माध्यम से नशामुक्ति अभियान चलाने की बात कही। उनका कहना था कि इस प्रकार के आयोजनों के ज़रिए लोगों को जागरूक कर एक स्वस्थ और सकारात्मक समाज बनाने की दिशा में निरंतर प्रयास जारी हैं। यह संदेश ऐसे समय में आया है जब धार्मिक पर्वों पर सामाजिक जिम्मेदारी की भूमिका पर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा हो रही है।