13 जुलाई 2026
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ईद उल अजहा 2026: मौलाना मुमताज अहमद कासमी और सैयद नसीरुद्दीन चिश्ती ने दिया एकता और भाईचारे का संदेश

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ईद उल अजहा 2026: मौलाना मुमताज अहमद कासमी और सैयद नसीरुद्दीन चिश्ती ने दिया एकता और भाईचारे का संदेश

सारांश

बकरीद 2026 पर दो प्रमुख धार्मिक आवाजें एक सुर में बोलीं — मौलाना कासमी ने कुर्बानी को इंसानी त्याग से जोड़ा, तो चिश्ती ने भारत की बहुलतावादी ताकत को याद दिलाया। संदेश साफ था: त्योहार की असली भावना नफरत नहीं, इंसानियत है।

मुख्य बातें

मौलाना मुमताज अहमद कासमी ने ईद उल अजहा 2026 पर कहा कि इस्लाम का सबसे बड़ा संदेश तौहीद — अल्लाह की एकता — है।
कासमी ने कुर्बानी की व्याख्या करते हुए कहा कि असली त्याग देश, प्रदेश और इंसानियत के लिए समर्पण की भावना है।
अजमेर शरीफ के सज्जादानशीन सैयद नसीरुद्दीन चिश्ती ने कहा कि भारत की असली ताकत सभी धर्मों के लोगों का मिलकर त्योहार मनाना है।
चिश्ती ने स्पष्ट किया कि कुर्बानी केवल अनुमत पशुओं की दी जाए और किसी की भावनाएं आहत न हों।
दोनों नेताओं ने स्वच्छता , सद्भाव और वैश्विक शांति के लिए अपील की।

बकरीद के पावन अवसर पर देश के प्रमुख धार्मिक नेताओं ने 28 मई 2026 को इंसानियत, त्याग और सांप्रदायिक सौहार्द का आह्वान किया। मौलाना मुमताज अहमद कासमी ने ईद उल अजहा के गहरे आध्यात्मिक अर्थ को रेखांकित किया, जबकि अजमेर शरीफ के सज्जादानशीन सैयद नसीरुद्दीन चिश्ती ने भारत की बहुलतावादी संस्कृति की ताकत को याद दिलाया। दोनों नेताओं ने नागरिकों से अपील की कि त्योहार को आपसी प्रेम और जिम्मेदारी के साथ मनाएं।

तौहीद और कुर्बानी का सच्चा संदेश

मौलाना मुमताज अहमद कासमी ने कहा, 'इस्लाम में सबसे बड़ा संदेश तौहीद का है, यानी अल्लाह को एक मानना और उसी की इबादत करना। हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने भी यही शिक्षा दी कि अल्लाह एक है।' उन्होंने कुर्बानी की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि यह केवल पशुबलि तक सीमित नहीं है — इसका वास्तविक अर्थ है इंसान के भीतर त्याग और समर्पण की भावना को जीवित करना।

मौलाना कासमी ने कहा, 'हमें देश, प्रदेश और पूरी इंसानियत के लिए कुर्बानी देने वाला बनना चाहिए।' उन्होंने समाज में व्याप्त नफरत और वैमनस्य को समाप्त करने की अपील करते हुए कहा कि ईद उल अजहा का सबसे बड़ा संदेश इंसानियत, एकता और प्रेम है।

अजमेर शरीफ से सद्भाव की पुकार

अजमेर शरीफ के सज्जादानशीन और ऑल इंडिया सूफी सज्जादानशीन काउंसिल के चेयरमैन सैयद नसीरुद्दीन चिश्ती ने देशवासियों को बकरीद की शुभकामनाएं देते हुए कहा, 'भारत की असली ताकत इसी में है कि यहां सभी धर्मों के लोग एक-दूसरे के त्योहार मिलकर मनाते हैं।' उन्होंने पूरी दुनिया को ईद की मुबारकबाद दी और वैश्विक शांति तथा संघर्षों के खात्मे के लिए दुआ की।

चिश्ती ने नागरिकों से आग्रह किया कि वे सभी जारी निर्देशों का पालन करें। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, 'ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए जिससे दूसरे नागरिकों की भावनाओं को ठेस पहुंचे। कुर्बानी केवल उन्हीं जानवरों की दी जानी चाहिए जिनकी अनुमति है।'

स्वच्छता और सामाजिक जिम्मेदारी पर जोर

सैयद नसीरुद्दीन चिश्ती ने त्योहार के दौरान सार्वजनिक स्वच्छता बनाए रखने पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि भाईचारे का त्योहार तभी सार्थक होता है जब समाज के हर वर्ग की संवेदनाओं का ध्यान रखा जाए। यह संदेश ऐसे समय में आया है जब देश में सामाजिक सौहार्द को लेकर जागरूकता अभियान तेज हो रहे हैं।

आगे का संदर्भ

गौरतलब है कि ईद उल अजहा इस्लामी कैलेंडर के सबसे महत्वपूर्ण पर्वों में से एक है, जो हजरत इब्राहीम की कुर्बानी की याद में मनाया जाता है। दोनों धार्मिक नेताओं के संदेश भारत की उस साझा सांस्कृतिक विरासत को रेखांकित करते हैं, जिसमें विविधता में एकता को सर्वोच्च मूल्य माना जाता है। आने वाले दिनों में देशभर में ईद की नमाज और सामुदायिक कार्यक्रमों के आयोजन की उम्मीद है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली परीक्षा यह है कि ये अपीलें जमीनी स्तर पर व्यवहार बदलती हैं या सिर्फ वार्षिक रिवायत बनकर रह जाती हैं। चिश्ती का 'अनुमत पशुओं' और 'दूसरों की भावनाओं' वाला बयान सीधे उन विवादों को संबोधित करता है जो हर बकरीद पर सार्वजनिक विमर्श में उठते हैं — यह सक्रिय नेतृत्व का संकेत है। हालांकि, सूफी और देवबंदी दोनों धाराओं का एक स्वर में बोलना भारतीय मुस्लिम नेतृत्व की उस आंतरिक विविधता को दर्शाता है जिसे मुख्यधारा की कवरेज अक्सर नजरअंदाज करती है।
RashtraPress
13 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ईद उल अजहा 2026 पर मौलाना मुमताज अहमद कासमी ने क्या संदेश दिया?
मौलाना कासमी ने कहा कि इस्लाम का सबसे बड़ा संदेश तौहीद है और कुर्बानी का वास्तविक अर्थ पशुबलि नहीं, बल्कि देश और इंसानियत के लिए त्याग की भावना विकसित करना है। उन्होंने लोगों से नफरत छोड़कर भाईचारे के साथ त्योहार मनाने की अपील की।
सैयद नसीरुद्दीन चिश्ती कौन हैं और उन्होंने क्या कहा?
सैयद नसीरुद्दीन चिश्ती अजमेर शरीफ के सज्जादानशीन और ऑल इंडिया सूफी सज्जादानशीन काउंसिल के चेयरमैन हैं। उन्होंने बकरीद 2026 पर देशवासियों को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि भारत की असली ताकत सभी धर्मों के लोगों का मिलकर त्योहार मनाना है और कुर्बानी केवल अनुमत पशुओं की दी जाए।
ईद उल अजहा (बकरीद) क्यों मनाई जाती है?
ईद उल अजहा इस्लामी कैलेंडर का प्रमुख पर्व है, जो हजरत इब्राहीम की अल्लाह के प्रति असीम आस्था और त्याग की याद में मनाया जाता है। इस अवसर पर नमाज, कुर्बानी और जरूरतमंदों में मांस वितरण की परंपरा है।
धार्मिक नेताओं ने कुर्बानी को लेकर क्या दिशानिर्देश दिए?
सैयद नसीरुद्दीन चिश्ती ने स्पष्ट किया कि कुर्बानी केवल उन्हीं जानवरों की दी जाए जिनकी अनुमति है और कोई भी ऐसा कार्य न किया जाए जिससे दूसरे नागरिकों की भावनाएं आहत हों। साथ ही सार्वजनिक स्वच्छता बनाए रखने पर भी जोर दिया गया।
क्या ईद उल अजहा पर भारत में सांप्रदायिक सद्भाव की अपील नई बात है?
नहीं, हर वर्ष प्रमुख धार्मिक नेता बकरीद पर सद्भाव और जिम्मेदारी की अपील करते हैं। हालांकि, इस बार देवबंदी और सूफी दोनों धाराओं के नेताओं का एक साथ समान संदेश देना उल्लेखनीय है, जो भारतीय मुस्लिम नेतृत्व की व्यापक सहमति को दर्शाता है।
राष्ट्र प्रेस
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