22 जुलाई 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जयंती: 'स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है' का उद्घोष करने वाले महानायक की गाथा

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जयंती: 'स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है' का उद्घोष करने वाले महानायक की गाथा

सारांश

23 जुलाई को लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की जयंती पर याद करें उस महानायक को जिन्होंने 'स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है' का उद्घोष कर स्वतंत्रता की लौ जन-जन तक पहुँचाई, मंडले कारावास में 'गीता रहस्य' लिखी और गणेश उत्सव को राष्ट्रीय एकता का माध्यम बनाया।

मुख्य बातें

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का जन्म 23 जुलाई 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में हुआ था।
उन्होंने मराठी में 'केसरी' और अंग्रेजी में 'द मराठा' समाचार-पत्र स्थापित कर जनचेतना जगाई।
1908 में उन्हें बर्मा के मंडले कारागार में छह वर्ष के कठोर कारावास की सजा दी गई; इसी दौरान 'गीता रहस्य' की रचना की।
गणेश उत्सव और शिवाजी उत्सव को सार्वजनिक स्वरूप देकर उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन को जन-आंदोलन में बदला।
महात्मा गांधी ने उन्हें 'आधुनिक भारत का निर्माता' कहा; 1 अगस्त 1920 को उनका निधन हुआ।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अग्रदूत लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की जयंती 23 जुलाई को पूरे देश में श्रद्धा और गौरव के साथ मनाई जाती है। उनका प्रसिद्ध उद्घोष — 'स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा' — आज भी करोड़ों भारतीयों के हृदय में देशभक्ति और आत्मसम्मान की लौ जलाता है। तिलक वह नेता थे जिन्होंने स्वतंत्रता की चिंगारी को अभिजात वर्ग की सभाओं से निकालकर आम जन-जन तक पहुँचाया।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

23 जुलाई 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में जन्मे तिलक का मूल नाम केशव गंगाधर तिलक था। उन्होंने पुणे के दक्कन कॉलेज से गणित में स्नातक की उपाधि प्राप्त की और बाद में बॉम्बे विश्वविद्यालय से एलएलबी की डिग्री हासिल की। शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात उन्होंने कुछ समय शिक्षण कार्य किया, किंतु शीघ्र ही पत्रकारिता और राष्ट्रसेवा को अपने जीवन का ध्येय बना लिया।

पत्रकारिता से राष्ट्रजागरण

तिलक ने मराठी भाषा में 'केसरी' और अंग्रेजी में 'द मराठा' समाचार-पत्रों की स्थापना की। इन पत्रों के माध्यम से उन्होंने औपनिवेशिक शासन की अन्यायपूर्ण नीतियों की निर्भीक आलोचना की और जनसाधारण में राष्ट्रीय चेतना का संचार किया। उनके तीखे लेखों ने लोगों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया और स्वतंत्रता आंदोलन को एक नई वैचारिक दिशा प्रदान की।

कारावास और 'गीता रहस्य' की रचना

1896-97 में महाराष्ट्र में फैली प्लेग महामारी के दौरान ब्रिटिश सरकार की कठोर नीतियों का खुलकर विरोध करने पर तिलक पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया और उन्हें 18 महीने की जेल हुई। इसके बाद 1908 में क्रांतिकारियों खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चंद्र चाकी के समर्थन में 'केसरी' में लेख प्रकाशित करने पर उन्हें पुनः गिरफ्तार किया गया और बर्मा के मंडले कारागार में छह वर्ष के कठोर कारावास की सजा दी गई। इसी कारावास काल में उन्होंने अपनी बहुचर्चित पुस्तक 'गीता रहस्य' की रचना की, जिसमें कर्मयोग और राष्ट्रसेवा का गहन संदेश निहित है।

सामाजिक एकता के सूत्रधार

तिलक केवल राजनीतिक नेता नहीं थे — वे एक दूरदर्शी समाज-सुधारक भी थे। उन्होंने गणेश उत्सव और शिवाजी उत्सव को सार्वजनिक स्वरूप देकर जनमानस में राष्ट्रीय एकता और देशभक्ति की भावना को सुदृढ़ किया। इन आयोजनों के ज़रिये वे युवाओं को संगठित करते और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जनजागरण फैलाते थे। यह ऐसे समय में आया जब स्वतंत्रता आंदोलन मुख्यतः शिक्षित वर्ग तक सीमित था — तिलक ने उसे जन-आंदोलन का रूप दिया।

विरासत और ऐतिहासिक महत्व

तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल की त्रयी 'लाल-बाल-पाल' के नाम से इतिहास में अमर है। इन तीनों ने उग्र राष्ट्रवाद को नई शक्ति दी और स्वराज की माँग को जन-जन तक पहुँचाया। महात्मा गांधी ने तिलक को 'आधुनिक भारत का निर्माता' कहा, जबकि ब्रिटिश इतिहासकारों ने उन्हें 'भारतीय अशांति के जनक' की संज्ञा दी। 1 अगस्त 1920 को उनका निधन हुआ, परंतु उनका जीवन-दर्शन — त्याग, साहस और राष्ट्रसेवा — आज भी प्रासंगिक है और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देता रहेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन उनका असली योगदान यह था कि उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन की भाषा और रणनीति दोनों बदल दीं — याचना की जगह अधिकार की माँग रखी। गणेश उत्सव और शिवाजी उत्सव जैसे सांस्कृतिक आयोजनों को राजनीतिक गोलबंदी के उपकरण में बदलना उनकी दूरदर्शिता का प्रमाण है, जो आज के जन-संचार युग में भी प्रासंगिक है। गौरतलब है कि मंडले जेल में लिखी 'गीता रहस्य' न केवल धार्मिक ग्रंथ थी, बल्कि कर्मयोग के माध्यम से प्रतिरोध का दार्शनिक आधार थी। आज जब राष्ट्रीय एकता की चर्चा होती है, तो तिलक का वह मॉडल — विविधता को उत्सव में बदलना — पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक लगता है।
RashtraPress
22 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक कौन थे?
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख नेता, पत्रकार और समाज-सुधारक थे, जिनका जन्म 23 जुलाई 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में हुआ था। उन्हें 'स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है' के उद्घोष और 'केसरी' समाचार-पत्र के माध्यम से जनजागरण के लिए याद किया जाता है।
तिलक को मंडले जेल क्यों भेजा गया था?
1908 में क्रांतिकारियों खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चंद्र चाकी के समर्थन में 'केसरी' में लेख प्रकाशित करने पर ब्रिटिश सरकार ने तिलक को गिरफ्तार कर बर्मा के मंडले कारागार में छह वर्ष के कठोर कारावास की सजा दी। इसी कारावास काल में उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'गीता रहस्य' लिखी।
तिलक ने गणेश उत्सव को सार्वजनिक क्यों बनाया?
तिलक ने गणेश उत्सव और शिवाजी उत्सव को सार्वजनिक स्वरूप देकर उन्हें राष्ट्रीय एकता और जनगोलबंदी के माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया। इन आयोजनों के ज़रिये वे युवाओं को संगठित करते और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जनजागरण फैलाते थे, जिससे स्वतंत्रता आंदोलन एक जन-आंदोलन बन सका।
'लाल-बाल-पाल' की त्रयी क्या थी?
'लाल-बाल-पाल' लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चंद्र पाल की प्रसिद्ध तिकड़ी थी, जिन्होंने मिलकर उग्र राष्ट्रवाद को नई शक्ति दी। इन तीनों नेताओं ने स्वराज की माँग को पूरे देश में लोकप्रिय बनाया और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जन-प्रतिरोध को संगठित किया।
महात्मा गांधी ने तिलक को क्या कहा था?
महात्मा गांधी ने लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को 'आधुनिक भारत का निर्माता' कहा था। वहीं ब्रिटिश इतिहासकारों ने उन्हें 'भारतीय अशांति के जनक' की संज्ञा दी थी। 1 अगस्त 1920 को उनका निधन हुआ।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 3 घंटे पहले
  2. 3 महीने पहले
  3. 3 महीने पहले
  4. 11 महीने पहले
  5. 12 महीने पहले
  6. 12 महीने पहले
  7. 1 साल पहले
  8. 1 साल पहले