बरेली में दुनिया का पहला गिर गाय भ्रूण प्रत्यारोपण व जेनॉमिक्स कार्यक्रम, ₹1,500 करोड़ का निवेश लक्ष्य
सारांश
मुख्य बातें
बरेली में 14 सितंबर 2026 को पशुपालन क्षेत्र में एक ऐतिहासिक पहल की शुरुआत हुई — देसी गिर गाय की नस्ल सुधार के लिए दुनिया का पहला भ्रूण प्रत्यारोपण (एम्ब्रियो ट्रांसफर) और जेनॉमिक्स आधारित कार्यक्रम आरंभ किया गया। बीएल एग्रो और लीड्स जेनेटिक्स के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में ब्राजील और तंजानिया के वैज्ञानिक एवं विशेषज्ञ भी सम्मिलित हुए। इसका उद्देश्य देसी गायों की दूध उत्पादन क्षमता को कई गुना बढ़ाना और किसानों की आय में क्रांतिकारी सुधार लाना है।
कार्यक्रम की मुख्य विशेषताएँ
यह पहल भारत में अपनी तरह की पहली है, जो भ्रूण प्रत्यारोपण तकनीक को जेनॉमिक्स से जोड़कर देसी गाय की नस्ल में सुधार करती है। लीड्स जेनेटिक्स के निदेशक आशीष खंडेलवाल ने बताया कि सरकार पिछले 12 वर्षों से ब्राजील से भ्रूण लाने का प्रयास कर रही थी, जिसे उनकी संस्था ने अब सफलतापूर्वक संभव कर दिखाया। उन्होंने बताया कि इस परियोजना की प्रेरणा 2022 में उनकी माता की इच्छा से मिली। अब तक इस परियोजना पर लगभग ₹200 करोड़ व्यय हो चुके हैं और आगामी पाँच वर्षों में ₹1,500 करोड़ के निवेश की योजना है।
बीएल एग्रो के चेयरमैन डॉ. घनश्याम खंडेलवाल ने कहा कि किसान की समृद्धि ही देश की समृद्धि है। उन्होंने बताया कि ऐतिहासिक रूप से गायों की उपेक्षा के कारण नस्ल खराब होती गई, और इस कार्यक्रम का लक्ष्य उसी स्वर्णिम परंपरा को पुनर्स्थापित करना है। उनके अनुसार यदि गायें 20 से 50 किलो प्रतिदिन तक दूध देने लगें, तो किसान की आर्थिक स्थिति में आमूलचूल परिवर्तन संभव है।
किसानों की आय पर असर
आशीष खंडेलवाल ने आँकड़ों के साथ समझाया कि वर्तमान में 4-5 लीटर दूध देने वाली गाय से किसान को मात्र ₹240 प्रतिदिन मिलते हैं, जबकि गाय की देखभाल पर ₹300-₹400 खर्च होते हैं। इस घाटे के कारण किसान गायों को सड़क पर छोड़ देते हैं। यदि उत्पादन 40 लीटर प्रतिदिन तक पहुँच जाए और दर ₹60 प्रति लीटर मानी जाए, तो किसान की दैनिक आय ₹240 से बढ़कर ₹2,400 हो सकती है — अर्थात् दस गुना वृद्धि।
गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब आवारा मवेशियों की समस्या उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में किसानों के लिए गंभीर चुनौती बनी हुई है। नस्ल सुधार से गाय का आर्थिक मूल्य बढ़ने पर किसान स्वयं उन्हें संरक्षित रखेंगे, जो इस समस्या का दीर्घकालिक समाधान हो सकता है।
राज्य सरकारों की प्रतिक्रिया
मध्य प्रदेश के उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल ने इस पहल की प्रशंसा करते हुए कहा, 'और ज्यादा दूध उत्पादन होगा और जितनी दूध की आवश्यकता है उतना दूध उपलब्ध न होने के कारण जो नकली तरीके से पनीर और अन्य चीजें बनाई जाती हैं, उसमें कमी आएगी। स्वस्थ भारत बनाने का जो प्रधानमंत्री का संकल्प है, 2047 तक विकसित भारत और साथ में स्वस्थ भारत, उसमें इस प्रकार के कार्यक्रम की भी बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका होगी।' उन्होंने यह भी संकेत दिया कि मध्य प्रदेश के रीवा में स्थित गोवंश वन्यविहार — जहाँ वर्तमान में 10,000 गायें हैं और 20,000 तक विस्तार की योजना है — में भी यह नस्ल सुधार तकनीक अपनाई जाएगी।
उत्तर प्रदेश के कैबिनेट मंत्री धर्मपाल सिंह ने कहा, 'दुनिया का यह पहला कार्यक्रम है। बरेली में पहली बार भ्रूण प्रत्यारोपित करने का कार्यक्रम किया जा रहा है। भ्रूण स्थानांतरण से देसी गाय में नस्ल सुधार होगी। देसी गाय का दूध अमृत है।' वन मंत्री अरुण सक्सेना ने आश्वासन दिया कि सरकार इस आधुनिक तकनीक को छोटे और सामान्य किसानों तक पहुँचाने के लिए ठोस योजना बनाएगी।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग और तकनीकी पहलू
इस कार्यक्रम की विशिष्टता यह है कि इसमें ब्राजील और तंजानिया के वैज्ञानिकों का सक्रिय सहयोग प्राप्त हुआ है। भ्रूण और जेनॉमिक चिप निर्माण की कार्यशाला बरेली में ही स्थापित की जा रही है, जो इस तकनीक को भारत में ही विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। वर्तमान में जो गाय 2-4 किलो दूध देती है, उसे इस तकनीक के माध्यम से 12-14 किलो और अंततः 40 लीटर प्रतिदिन तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है।
आगे की राह
इस कार्यक्रम का सफल क्रियान्वयन भारत के डेयरी क्षेत्र में संरचनात्मक बदलाव ला सकता है। आने वाले वर्षों में यह तकनीक देशभर के किसानों तक पहुँचाने की दिशा में राज्य सरकारें नीतिगत योजना बनाएंगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह प्रयोग सफल रहा, तो भारत एक बार फिर वैश्विक डेयरी उत्पादन में अग्रणी भूमिका निभा सकता है।