25 अक्टूबर 2026
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भरत तिवारी एनकाउंटर: नोटिस पर भड़के राजद सांसद सुधाकर सिंह, सुप्रीम कोर्ट से स्पष्टीकरण की मांग

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भरत तिवारी एनकाउंटर: नोटिस पर भड़के राजद सांसद सुधाकर सिंह, सुप्रीम कोर्ट से स्पष्टीकरण की मांग

सारांश

भरत तिवारी एनकाउंटर मामले में STF DG कुंदन कृष्णन के नोटिस को राजद सांसद सुधाकर सिंह ने 'चेन ऑफ कमांड' का उल्लंघन और संवैधानिक संकट करार दिया। हस्ताक्षरहीन, निजी वकील के ज़रिए भेजे नोटिस पर सवाल उठाते हुए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट जाने और कृष्णन की कथित करोड़ों की संपत्ति का खुलासा करने की चेतावनी दी।

मुख्य बातें

राजद सांसद सुधाकर सिंह ने भरत तिवारी एनकाउंटर मामले में STF DG कुंदन कृष्णन द्वारा भेजे गए कानूनी नोटिस की वैधता पर सवाल उठाए।
नोटिस पर कुंदन कृष्णन के हस्ताक्षर नहीं हैं और इसे निजी वकील के माध्यम से भेजा गया, जबकि बिहार सरकार के पास एडवोकेट जनरल मौजूद हैं।
सुधाकर सिंह ने मामले को संवैधानिक संकट बताते हुए सर्वोच्च न्यायालय से स्पष्टीकरण मांगने की घोषणा की।
उन्होंने कुंदन कृष्णन पर कैमूर में 16 एकड़ 88 डिसमिल जमीन और सैकड़ों करोड़ रुपये की कथित अवैध संपत्ति के आरोप लगाए।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की माँग दोहराई; 1 नवंबर की इंडिया गठबंधन रैली के विरोध को BJP की चाल बताया।

राजद सांसद सुधाकर सिंह ने भरत तिवारी एनकाउंटर मामले में राज्य एसटीएफ के महानिदेशक कुंदन कृष्णन द्वारा भेजे गए कानूनी नोटिस को लेकर 25 अक्टूबर 2026 को तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने नोटिस की प्रक्रियागत वैधता पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि इस मामले में वे सर्वोच्च न्यायालय से संवैधानिक स्पष्टीकरण मांगेंगे। पटना में पत्रकारों से बात करते हुए सुधाकर सिंह ने मुख्यमंत्री से संतोषजनक जवाब न मिलने पर अदालत का दरवाजा खटखटाने की चेतावनी भी दी।

नोटिस की वैधता पर उठे सवाल

सुधाकर सिंह ने तीन प्रमुख आपत्तियाँ दर्ज कराईं — पहली, कुंदन कृष्णन को संविधान और सेवा नियमों के तहत उन्हें नोटिस भेजने का अधिकार है या नहीं; दूसरी, नोटिस पर कुंदन कृष्णन के हस्ताक्षर नहीं हैं; और तीसरी, जब बिहार सरकार के पास एडवोकेट जनरल मौजूद हैं, तो कानूनी नोटिस निजी वकील के माध्यम से क्यों भेजा गया।

उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री से यह भी पूछा है कि क्या उनके विरुद्ध मामला दर्ज करने की अनुमति सरकार ने दी है। यदि संतोषजनक उत्तर नहीं मिला, तो वे न्यायालय का दरवाजा खटखटाएंगे।

चेन ऑफ कमांड और संवैधानिक संकट का आरोप

सांसद ने इस नोटिस को प्रशासनिक 'चेन ऑफ कमांड' का उल्लंघन बताते हुए इसे संवैधानिक संकट की संज्ञा दी। उनका तर्क था कि जब अधिकारियों के पदों का क्रम निर्धारित है, तो 28वें स्थान पर मौजूद कोई अधिकारी सातवें स्थान पर बैठे वरिष्ठ अधिकारी को नोटिस कैसे जारी कर सकता है।

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र और कार्यपालिका की व्यवस्था अधिकारों के एक निश्चित पदानुक्रम के तहत संचालित होती है। इस व्यवस्था का पालन न होने पर प्रशासनिक ढाँचे की नींव ही हिल जाती है। संवैधानिक व्याख्या का अधिकार सर्वोच्च न्यायालय के पास है और इसी कारण वे शीर्ष अदालत से स्पष्टीकरण का आग्रह करेंगे।

बिहार के अधिकारियों पर नाराज़गी और संपत्ति के आरोप

सुधाकर सिंह ने बिहार के अधिकारियों के रवैये पर भी कड़ी नाराज़गी जताई। उनका आरोप था कि राज्य में अधिकारी न मुख्यमंत्री की सुनते हैं, न सांसदों और विधायकों की। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि यही रवैया जारी रहा, तो जनप्रतिनिधियों को पूरी तरह अनदेखा करने में देर नहीं लगेगी।

इसके साथ ही उन्होंने कुंदन कृष्णन पर संपत्ति संबंधी गंभीर आरोप लगाए। उनके अनुसार, कृष्णन ने कैमूर में 16 एकड़ और 88 डिसमिल ज़मीन खरीदी है, जिसका अब तक सार्वजनिक खुलासा नहीं हुआ। उन्होंने सवाल किया कि यदि किसी अधिकारी को सेवाकाल में 4 से 5 करोड़ रुपये वेतन मिले और खर्च 2 से 3 करोड़ रुपये रहा, तो वह शेष राशि से सैकड़ों करोड़ रुपये की संपत्ति कैसे अर्जित कर सकता है। उन्होंने कहा कि अवैध संपत्ति का अलग हिसाब उनके पास है, जिसे वे बाद में सार्वजनिक करेंगे।

इंडिया गठबंधन रैली और मुख्य चुनाव आयुक्त पर बयान

इंडिया गठबंधन की 1 नवंबर को प्रस्तावित दिल्ली रैली के संदर्भ में सुधाकर सिंह ने कहा कि इससे व्यापारियों को कोई नुकसान नहीं होगा। दीपावली 1 नवंबर के बाद पड़ने के कारण बड़ी संख्या में लोग दिल्ली पहुंचेंगे। उन्होंने आरोप लगाया कि रैली के खिलाफ जो विरोध सुनाई दे रहा है, उसके पीछे व्यापारी नहीं, बल्कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) के लोग हैं।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि उन्हें एक न एक दिन पद छोड़ना ही होगा — चाहे वे स्वयं इस्तीफा दें, संसद के माध्यम से हटाए जाएं, या जनता के दबाव में ऐसा करना पड़े।

आगे क्या

सुधाकर सिंह ने स्पष्ट किया कि वे मुख्यमंत्री के जवाब का इंतजार करेंगे और यदि उत्तर संतोषजनक नहीं रहा तो न्यायालय की शरण लेंगे। साथ ही उन्होंने कुंदन कृष्णन की कथित अवैध संपत्तियों का विवरण सार्वजनिक करने का भी संकेत दिया। यह मामला बिहार में पुलिस-राजनेता संबंधों और प्रशासनिक जवाबदेही की बहस को नई धार दे सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

क्योंकि विधिक नोटिस की प्रक्रिया पद-क्रम से नहीं, बल्कि क़ानूनी प्राधिकार से तय होती है। संपत्ति के आरोप गंभीर हैं, लेकिन अभी तक केवल एकपक्षीय — सत्यापन की प्रतीक्षा है। असली सवाल यह है कि क्या यह विवाद भरत तिवारी एनकाउंटर की मूल जाँच को पटरी से उतारने का माध्यम बन रहा है।
RashtraPress
25 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भरत तिवारी एनकाउंटर मामला क्या है?
भरत तिवारी एनकाउंटर बिहार में राज्य एसटीएफ से जुड़ा एक विवादित मामला है, जिसमें राजद सांसद सुधाकर सिंह का नाम भी सामने आया है। STF के महानिदेशक कुंदन कृष्णन ने इस संदर्भ में सुधाकर सिंह को कानूनी नोटिस भेजा, जिस पर अब राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है।
सुधाकर सिंह ने नोटिस पर क्या आपत्तियाँ जताई हैं?
उन्होंने तीन प्रमुख आपत्तियाँ दर्ज कराई हैं — नोटिस पर कुंदन कृष्णन के हस्ताक्षर नहीं हैं, इसे निजी वकील के ज़रिए भेजा गया जबकि सरकारी एडवोकेट जनरल उपलब्ध हैं, और संविधान व सेवा नियमों के तहत कृष्णन को यह नोटिस भेजने का अधिकार है या नहीं — यह स्पष्ट नहीं है।
सुधाकर सिंह सुप्रीम कोर्ट क्यों जाना चाहते हैं?
उनका कहना है कि यह मामला प्रशासनिक 'चेन ऑफ कमांड' और संवैधानिक व्याख्या से जुड़ा है, जिसे केवल सर्वोच्च न्यायालय ही स्पष्ट कर सकता है। उनके अनुसार, एक कनिष्ठ अधिकारी द्वारा वरिष्ठ को नोटिस जारी करना संवैधानिक संकट की स्थिति पैदा करता है।
कुंदन कृष्णन पर क्या आरोप लगाए गए हैं?
सुधाकर सिंह ने आरोप लगाया है कि कुंदन कृष्णन ने कैमूर में 16 एकड़ और 88 डिसमिल ज़मीन खरीदी है। उनका दावा है कि सेवाकाल के कुल वेतन के अनुपात में यह संपत्ति बेहिसाब है और अवैध संपत्ति का अलग विवरण बाद में सार्वजनिक किया जाएगा। ये आरोप अभी तक केवल सांसद की ओर से हैं; कृष्णन का पक्ष सामने नहीं आया है।
इंडिया गठबंधन की 1 नवंबर रैली पर सुधाकर सिंह का क्या कहना है?
सुधाकर सिंह ने कहा कि इस रैली से व्यापारियों को कोई नुकसान नहीं होगा क्योंकि दीपावली 1 नवंबर के बाद है। उनके अनुसार रैली का विरोध BJP द्वारा किया जा रहा है, व्यापारियों द्वारा नहीं।
राष्ट्र प्रेस
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