जमात-ए-इस्लामी हिंद के उपाध्यक्ष मोतासिम खान बोले — भारतीय मुसलमान न देश छोड़ेंगे, न इस्लाम
सारांश
मुख्य बातें
जमात-ए-इस्लामी हिंद के उपाध्यक्ष मलिक मोतासिम खान ने 28 अक्टूबर 2026 को हैदराबाद में कहा कि भारतीय मुसलमान किसी भी परिस्थिति में न तो यह देश छोड़ेंगे और न ही इस्लाम, तथा देश की एकता और तरक्की में अपना पूरा योगदान देते रहेंगे। उन्होंने मस्जिदों को गिराए जाने, मदरसों को कथित तौर पर परेशान किए जाने और अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के समक्ष उत्पन्न हो रही चुनौतियों की कड़ी आलोचना करते हुए सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने का आह्वान किया।
मस्जिदों और मदरसों पर खान की चिंताएँ
मोतासिम खान ने कहा कि पूरे भारत में कथित तौर पर समय-समय पर मस्जिदें गिराई जा रही हैं। उनके अनुसार, एक ओर मस्जिदों को ढहाने का सिलसिला जारी है, तो दूसरी ओर इस्लामी मदरसों को रुकावटों, तालाबंदी और उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि इन मदरसों को कथित तौर पर आतंकवाद के अड्डों के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिशें की जा रही हैं।
अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों पर दबाव का आरोप
खान ने आगे कहा कि जौहर यूनिवर्सिटी, अल-फलाह यूनिवर्सिटी, असम-मेघालय सीमा पर स्थित एक विश्वविद्यालय, तथा अलीगढ़ और जामिया जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के अल्पसंख्यक स्वरूप को कमज़ोर करने की कोशिशें लगातार जारी हैं। इसके साथ ही, उन्होंने वक्फ संशोधन अधिनियम और समान नागरिक संहिता (यूनिफॉर्म सिविल कोड) को लागू करने के प्रयासों पर भी चिंता व्यक्त की। गौरतलब है कि ये मुद्दे पिछले कुछ वर्षों से लगातार राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में रहे हैं।
सांप्रदायिक ताकतों पर कड़ी टिप्पणी
मोतासिम खान ने कहा कि इन सभी घटनाओं से ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ सांप्रदायिक ताकतें नहीं चाहतीं कि मुसलमान इस्लाम का पालन करें। उन्होंने कहा, 'सांप्रदायिक सोच रखने वालों को फिरौन, नमरूद, हिटलर और मुसोलिनी का अंजाम याद रखना चाहिए।' उनके अनुसार जो लोग नफरत फैलाने में लगे हैं, वे न समाज की सेवा कर रहे हैं और न देश की।
एकता और भाईचारे का संकल्प
खान ने स्पष्ट किया कि भारतीय मुसलमानों का पक्का इरादा है कि वे भारत को 'दया और प्रेम का देश' बनाने में योगदान देंगे। उन्होंने कहा, 'इस देश की नींव प्रेम और भाईचारे पर टिकी है।' उन्होंने यह भी जताया कि उन्हें भारत के लोगों की अंतरात्मा पर पूरा भरोसा है कि वे अंततः एकता, सद्भाव और प्रेम की राह पर वापस लौट आएंगे।
व्यापक संदर्भ और आगे की स्थिति
यह बयान ऐसे समय में आया है जब अल्पसंख्यक अधिकारों और धार्मिक संस्थाओं को लेकर देश भर में बहस तेज़ है। जमात-ए-इस्लामी हिंद पहले भी वक्फ संशोधन और यूसीसी जैसे मुद्दों पर अपनी आपत्तियाँ दर्ज करा चुकी है। मोतासिम खान के इस बयान के बाद यह देखना अहम होगा कि अन्य समुदायों और राजनीतिक दलों की इस पर क्या प्रतिक्रिया आती है।