29 अक्टूबर 2026
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जमात-ए-इस्लामी हिंद के उपाध्यक्ष मोतासिम खान बोले — भारतीय मुसलमान न देश छोड़ेंगे, न इस्लाम

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जमात-ए-इस्लामी हिंद के उपाध्यक्ष मोतासिम खान बोले — भारतीय मुसलमान न देश छोड़ेंगे, न इस्लाम

सारांश

जमात-ए-इस्लामी हिंद के उपाध्यक्ष मलिक मोतासिम खान ने मस्जिदों को गिराए जाने, मदरसों पर कथित उत्पीड़न और अल्पसंख्यक विश्वविद्यालयों के स्वरूप को कमज़ोर करने के आरोपों के बीच स्पष्ट किया — भारतीय मुसलमान न देश छोड़ेंगे, न इस्लाम, और देश की एकता में योगदान देते रहेंगे।

मुख्य बातें

जमात-ए-इस्लामी हिंद के उपाध्यक्ष मलिक मोतासिम खान ने 28 अक्टूबर 2026 को हैदराबाद में बयान दिया।
उन्होंने देश भर में मस्जिदें गिराए जाने और मदरसों पर कथित तौर पर उत्पीड़न की आलोचना की।
जौहर यूनिवर्सिटी , अल-फलाह यूनिवर्सिटी , अलीगढ़ और जामिया जैसे संस्थानों के अल्पसंख्यक स्वरूप को कमज़ोर करने के प्रयासों पर भी चिंता जताई।
वक्फ संशोधन अधिनियम और समान नागरिक संहिता को लेकर भी आपत्ति दर्ज कराई।
खान ने कहा — भारतीय मुसलमान किसी भी परिस्थिति में न देश छोड़ेंगे, न इस्लाम , और देश को 'दया व प्रेम का देश' बनाने में योगदान देंगे।

जमात-ए-इस्लामी हिंद के उपाध्यक्ष मलिक मोतासिम खान ने 28 अक्टूबर 2026 को हैदराबाद में कहा कि भारतीय मुसलमान किसी भी परिस्थिति में न तो यह देश छोड़ेंगे और न ही इस्लाम, तथा देश की एकता और तरक्की में अपना पूरा योगदान देते रहेंगे। उन्होंने मस्जिदों को गिराए जाने, मदरसों को कथित तौर पर परेशान किए जाने और अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के समक्ष उत्पन्न हो रही चुनौतियों की कड़ी आलोचना करते हुए सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने का आह्वान किया।

मस्जिदों और मदरसों पर खान की चिंताएँ

मोतासिम खान ने कहा कि पूरे भारत में कथित तौर पर समय-समय पर मस्जिदें गिराई जा रही हैं। उनके अनुसार, एक ओर मस्जिदों को ढहाने का सिलसिला जारी है, तो दूसरी ओर इस्लामी मदरसों को रुकावटों, तालाबंदी और उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि इन मदरसों को कथित तौर पर आतंकवाद के अड्डों के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिशें की जा रही हैं।

अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों पर दबाव का आरोप

खान ने आगे कहा कि जौहर यूनिवर्सिटी, अल-फलाह यूनिवर्सिटी, असम-मेघालय सीमा पर स्थित एक विश्वविद्यालय, तथा अलीगढ़ और जामिया जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के अल्पसंख्यक स्वरूप को कमज़ोर करने की कोशिशें लगातार जारी हैं। इसके साथ ही, उन्होंने वक्फ संशोधन अधिनियम और समान नागरिक संहिता (यूनिफॉर्म सिविल कोड) को लागू करने के प्रयासों पर भी चिंता व्यक्त की। गौरतलब है कि ये मुद्दे पिछले कुछ वर्षों से लगातार राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में रहे हैं।

सांप्रदायिक ताकतों पर कड़ी टिप्पणी

मोतासिम खान ने कहा कि इन सभी घटनाओं से ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ सांप्रदायिक ताकतें नहीं चाहतीं कि मुसलमान इस्लाम का पालन करें। उन्होंने कहा, 'सांप्रदायिक सोच रखने वालों को फिरौन, नमरूद, हिटलर और मुसोलिनी का अंजाम याद रखना चाहिए।' उनके अनुसार जो लोग नफरत फैलाने में लगे हैं, वे न समाज की सेवा कर रहे हैं और न देश की।

एकता और भाईचारे का संकल्प

खान ने स्पष्ट किया कि भारतीय मुसलमानों का पक्का इरादा है कि वे भारत को 'दया और प्रेम का देश' बनाने में योगदान देंगे। उन्होंने कहा, 'इस देश की नींव प्रेम और भाईचारे पर टिकी है।' उन्होंने यह भी जताया कि उन्हें भारत के लोगों की अंतरात्मा पर पूरा भरोसा है कि वे अंततः एकता, सद्भाव और प्रेम की राह पर वापस लौट आएंगे।

व्यापक संदर्भ और आगे की स्थिति

यह बयान ऐसे समय में आया है जब अल्पसंख्यक अधिकारों और धार्मिक संस्थाओं को लेकर देश भर में बहस तेज़ है। जमात-ए-इस्लामी हिंद पहले भी वक्फ संशोधन और यूसीसी जैसे मुद्दों पर अपनी आपत्तियाँ दर्ज करा चुकी है। मोतासिम खान के इस बयान के बाद यह देखना अहम होगा कि अन्य समुदायों और राजनीतिक दलों की इस पर क्या प्रतिक्रिया आती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

यूसीसी और मदरसा विनियमन पर चल रही नीतिगत बहस के बीच आई है। ध्यान देने योग्य यह है कि खान ने आरोप तो लगाए, लेकिन न्यायपालिका या संसदीय रास्ते से राहत माँगने की बजाय सामुदायिक संकल्प और नैतिक अपील का सहारा लिया — जो रणनीतिक चुप्पी भी है और राजनीतिक सीमाओं का स्वीकार भी। मुख्यधारा की कवरेज जो अक्सर चूकती है वह यह है कि इस तरह के बयानों का असर वास्तविक नीति पर कम, और सामुदायिक मनोबल व पहचान की राजनीति पर अधिक होता है। असली सवाल यह है कि क्या ये चिंताएँ संसदीय या न्यायिक मंचों पर उसी ऊर्जा के साथ उठाई जा रही हैं।
RashtraPress
29 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मलिक मोतासिम खान कौन हैं और उन्होंने यह बयान क्यों दिया?
मलिक मोतासिम खान जमात-ए-इस्लामी हिंद के उपाध्यक्ष हैं। उन्होंने 28 अक्टूबर 2026 को हैदराबाद में मस्जिदों को गिराए जाने, मदरसों पर कथित उत्पीड़न और अल्पसंख्यक संस्थाओं पर दबाव की पृष्ठभूमि में यह बयान दिया।
मोतासिम खान ने किन संस्थानों का ज़िक्र किया?
उन्होंने जौहर यूनिवर्सिटी, अल-फलाह यूनिवर्सिटी, असम-मेघालय सीमा पर स्थित एक विश्वविद्यालय, तथा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और जामिया मिल्लिया इस्लामिया के अल्पसंख्यक स्वरूप को कमज़ोर करने के कथित प्रयासों का ज़िक्र किया।
जमात-ए-इस्लामी हिंद का वक्फ संशोधन अधिनियम पर क्या रुख है?
खान के बयान के अनुसार, जमात-ए-इस्लामी हिंद वक्फ संशोधन अधिनियम और समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लागू करने के प्रयासों को अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए चुनौती मानती है। संगठन पहले भी इन मुद्दों पर आपत्ति जता चुका है।
मोतासिम खान ने भारतीय मुसलमानों को क्या संकल्प दिलाया?
खान ने कहा कि भारतीय मुसलमान किसी भी परिस्थिति में न तो देश छोड़ेंगे और न ही इस्लाम। उन्होंने भारत को 'दया और प्रेम का देश' बनाने में योगदान देने का संकल्प दिलाया और सांप्रदायिक सद्भाव पर बल दिया।
यह बयान किस व्यापक संदर्भ में आया है?
यह बयान ऐसे समय में आया है जब वक्फ संशोधन, यूसीसी और मदरसा नियमन को लेकर राष्ट्रीय बहस चल रही है। अल्पसंख्यक संस्थाओं की स्वायत्तता और धार्मिक स्वतंत्रता के मुद्दे पिछले कुछ वर्षों से न्यायालयों और संसद दोनों में चर्चा में हैं।
राष्ट्र प्रेस
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