बिलासपुर का पातालेश्वर महादेव मंदिर: 7वीं सदी की बेसाल्ट शिल्पकला और गायब होते जल का रहस्य

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बिलासपुर का पातालेश्वर महादेव मंदिर: 7वीं सदी की बेसाल्ट शिल्पकला और गायब होते जल का रहस्य

सारांश

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में 7वीं सदी का पातालेश्वर महादेव मंदिर एक ही बेसाल्ट चट्टान से तराशा गया है — और यहाँ शिवलिंग पर चढ़ाया जल अदृश्य हो जाता है। आस्था कहती है यह पाताल लोक में जाता है; विज्ञान के पास अभी उत्तर नहीं। यही रहस्य इसे छत्तीसगढ़ की सबसे अनोखी धरोहर बनाता है।

मुख्य बातें

पातालेश्वर महादेव मंदिर , बिलासपुर (छत्तीसगढ़) , 7वीं सदी में निर्मित एक दुर्लभ एकाश्म मंदिर है।
संपूर्ण मंदिर एक ही विशाल बेसाल्ट चट्टान को तराशकर बनाया गया है — दीवारें, खंभे और छत सभी एक ही शिला से।
मंदिर का निर्माण कल्चुरी काल में सोमराज नामक ब्राह्मण ने कराया; इसे राष्ट्रकूट राजवंश की उत्कृष्ट कृति माना जाता है।
शिवलिंग पर चढ़ाया जल दृश्य रूप से गायब हो जाता है — स्थानीय मान्यता के अनुसार यह पाताल लोक में समाता है।
सावन मास और महाशिवरात्रि पर हज़ारों श्रद्धालु दूर-दूर से जलाभिषेक के लिए यहाँ पहुँचते हैं।
आसपास खुटाघाट बांध और रतनपुर किला प्रमुख पर्यटन स्थल हैं।

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में स्थित पातालेश्वर महादेव मंदिर एक ऐसा प्राचीन तीर्थस्थल है जो अपनी 7वीं सदी की दुर्लभ वास्तुकला और एक अनसुलझी धार्मिक परंपरा के कारण देशभर के शिव भक्तों और पुरातत्व प्रेमियों को आकर्षित करता है। यहाँ की सबसे चर्चित मान्यता यह है कि शिवलिंग पर चढ़ाया गया जल दृश्य रूप से गायब हो जाता है — स्थानीय श्रद्धालुओं की आस्था है कि महादेव उस जल को स्वीकार कर पाताल लोक में पहुँचा देते हैं। इसी मान्यता के आधार पर इस मंदिर को पातालेश्वर का नाम मिला।

मंदिर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

यह मंदिर कल्चुरी काल में सोमराज नामक एक ब्राह्मण द्वारा निर्मित कराया गया था और इसे राष्ट्रकूट राजवंश के शासनकाल की उत्कृष्ट स्थापत्य कृति माना जाता है। उल्लेखनीय यह है कि संपूर्ण मंदिर एक ही विशाल बेसाल्ट चट्टान को तराशकर निर्मित किया गया है — दीवारें, खंभे और छत सभी उसी एकाश्म संरचना का हिस्सा हैं। यह निर्माण शैली प्राचीन भारतीय शिल्पकला की उस परंपरा की याद दिलाती है जो एलोरा और महाबलीपुरम में भी दिखती है।

मंदिर की दीवारों और खंभों पर उकेरी गई महीन नक्काशी तत्कालीन कारीगरों की असाधारण दक्षता का प्रमाण है। भगवान शिव के शिवलिंग स्वरूप के साथ-साथ उनके परम भक्त नंदी की प्रतिमा भी यहाँ स्थापित है, जो इस मंदिर की विशिष्ट पहचान है।

जलाभिषेक का रहस्य

पातालेश्वर महादेव मंदिर में सर्वाधिक चर्चा का विषय है — जलाभिषेक के दौरान शिवलिंग पर अर्पित जल का अदृश्य हो जाना। भक्त जल चढ़ाते हैं, किंतु वह जल नीचे नहीं गिरता और कहीं समा जाता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह बेसाल्ट चट्टान की सरंध्रता या किसी प्राकृतिक जल-निकासी संरचना का परिणाम हो सकता है, हालाँकि इस पर कोई आधिकारिक पुरातात्विक अध्ययन सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। श्रद्धालुओं की मान्यता के अनुसार यह जल सीधे पाताल लोक में पहुँचता है, और यही विश्वास इस मंदिर को एक विशेष आध्यात्मिक महत्व देता है।

आस्था का केंद्र: सावन और महाशिवरात्रि

विशेष रूप से सावन मास और महाशिवरात्रि के अवसर पर इस मंदिर में दूर-दूर से श्रद्धालुओं की बड़ी भीड़ उमड़ती है। जलाभिषेक करने और भोलेनाथ का आशीर्वाद पाने की चाह में हज़ारों भक्त यहाँ पहुँचते हैं। यह मंदिर धार्मिक आस्था और पुरातात्विक महत्व — दोनों दृष्टियों से छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरोहर का अभिन्न अंग बन चुका है।

आसपास के पर्यटन स्थल

बिलासपुर आने वाले पर्यटक पातालेश्वर मंदिर के साथ-साथ खुटाघाट बांध की प्राकृतिक शांति का भी आनंद ले सकते हैं, जो हरे-भरे परिवेश और शांत जलराशि के लिए जाना जाता है। रतनपुर किला प्राचीन इतिहास और स्थानीय किंवदंतियों से भरा एक और उल्लेखनीय स्थल है। इसके अतिरिक्त, पास के बाज़ार क्षेत्र में स्थानीय हस्तशिल्प, पारंपरिक वस्तुएँ और स्मृति-चिह्न खरीदे जा सकते हैं।

पातालेश्वर महादेव मंदिर — अपने रहस्य, इतिहास और आस्था के त्रिवेणी संगम के साथ — छत्तीसगढ़ के उन गिने-चुने स्थलों में से एक है जो एक साथ तीर्थयात्री, इतिहासकार और जिज्ञासु पर्यटक — सभी को समान रूप से आमंत्रित करता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इस घटना पर अब तक कोई सार्वजनिक पुरातात्विक या भूवैज्ञानिक अध्ययन सामने नहीं आया है — यह एक चूक है। बेसाल्ट चट्टान की प्राकृतिक सरंध्रता और संभावित भूमिगत जल-निकासी प्रणाली इसका वैज्ञानिक आधार हो सकती है, जिसे समझना इस धरोहर के संरक्षण के लिए भी ज़रूरी है। छत्तीसगढ़ में कल्चुरी-कालीन स्थापत्य की विरासत अभी भी पर्याप्त राष्ट्रीय ध्यान से वंचित है — जबकि एलोरा जैसी एकाश्म संरचनाओं को मिली वैश्विक पहचान यह बताती है कि उचित दस्तावेज़ीकरण और प्रचार से यह मंदिर भी अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर आ सकता है।
RashtraPress
19 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पातालेश्वर महादेव मंदिर कहाँ स्थित है?
पातालेश्वर महादेव मंदिर छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में स्थित है। यह 7वीं सदी में एक विशाल बेसाल्ट चट्टान को तराशकर बनाया गया एकाश्म मंदिर है।
पातालेश्वर मंदिर में जल गायब क्यों हो जाता है?
स्थानीय मान्यता के अनुसार शिवलिंग पर चढ़ाया गया जल सीधे पाताल लोक में समा जाता है, इसीलिए वह दिखाई नहीं देता। वैज्ञानिक दृष्टि से यह बेसाल्ट चट्टान की प्राकृतिक जल-अवशोषण क्षमता या भूमिगत जल-निकासी का परिणाम हो सकता है, हालाँकि इस पर कोई आधिकारिक अध्ययन अभी सार्वजनिक नहीं है।
इस मंदिर का निर्माण किसने और कब कराया?
यह मंदिर कल्चुरी काल में सोमराज नामक ब्राह्मण द्वारा निर्मित कराया गया था और इसे राष्ट्रकूट राजवंश के शासनकाल की उत्कृष्ट स्थापत्य कृति माना जाता है। इसका निर्माण-काल 7वीं सदी बताया जाता है।
पातालेश्वर मंदिर जाने का सबसे अच्छा समय कौन सा है?
सावन मास और महाशिवरात्रि के दौरान यहाँ सबसे अधिक श्रद्धालु आते हैं और विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं। पर्यटन की दृष्टि से अक्टूबर से मार्च का मौसम अनुकूल रहता है।
बिलासपुर में पातालेश्वर मंदिर के अलावा और क्या देखने योग्य है?
बिलासपुर में खुटाघाट बांध प्रकृति प्रेमियों के लिए और रतनपुर किला इतिहास-प्रेमियों के लिए उल्लेखनीय स्थल हैं। पास के बाज़ार में स्थानीय हस्तशिल्प और पारंपरिक वस्तुएँ भी मिलती हैं।
राष्ट्र प्रेस
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