राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण ने 33 राज्य बोर्डों को ₹3.79 करोड़ वितरित, मध्य प्रदेश को सर्वाधिक हिस्सा
सारांश
मुख्य बातें
राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) ने पहुंच और लाभ साझाकरण (ABS) योजना के तहत 33 राज्य जैव विविधता बोर्डों (SBB), केंद्र शासित प्रदेश जैव विविधता परिषदों (UTBC) और विभिन्न कृषि जैव विविधता अनुसंधान संस्थानों को कुल ₹3.79 करोड़ वितरित किए हैं। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के एक अधिकारी ने 9 अगस्त को यह जानकारी दी। यह वितरण भारत के उस कानूनी ढाँचे का हिस्सा है जो जैविक संसाधनों के व्यावसायिक उपयोग से होने वाले लाभ को मूल स्रोत राज्यों तक पहुँचाना सुनिश्चित करता है।
किसे कितना मिला
वितरित की गई ₹3.79 करोड़ की ABS राशि में सबसे बड़ा हिस्सा — ₹46.93 लाख — मध्य प्रदेश को मिला। इसके बाद पश्चिम बंगाल को ₹44.76 लाख और ओडिशा को ₹44.08 लाख जारी किए गए। राशि का आवंटन उन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के खेती के रकबे के आँकड़ों के आधार पर आनुपातिक रूप से किया गया, जहाँ संबंधित फसलें उगाई जाती हैं। यह डेटा कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय ने उपलब्ध कराया था।
अनुसंधान संस्थानों को भी लाभ
इस राशि का एक हिस्सा ICAR-नेशनल ब्यूरो ऑफ प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेज (NBPGR) और हरियाणा राज्य जैव विविधता बोर्ड के माध्यम से हिसार बोवाइन स्पर्म स्टेशन और अनुसंधान केंद्र को भी जारी किया गया। इससे स्पष्ट है कि ABS ढाँचे का लाभ केवल राज्य बोर्डों तक सीमित नहीं है, बल्कि कृषि जैव विविधता से जुड़े शोध संस्थान भी इसके दायरे में आते हैं।
किन कंपनियों से वसूली गई ABS राशि
मंत्रालय के बयान के अनुसार, सब्जियों और तिलहन के आनुवंशिक संसाधनों तक अनुसंधान और व्यावसायिक उपयोग के लिए पहुँच बनाने वाली कंपनियों — बायर साइंस एंड इनोवेशन प्राइवेट लिमिटेड, HM क्लॉज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड और एडवांटा एंटरप्राइजेज लिमिटेड — से यह ABS राशि वसूल की गई। गौरतलब है कि इन कंपनियों ने बाज़ारों, व्यापारियों या बिचौलियों के माध्यम से जैविक संसाधनों तक पहुँच प्राप्त की थी, इसलिए पहुँच के मूल स्रोत की सटीक पहचान संभव नहीं हो सकी।
ABS फ्रेमवर्क और नागोया प्रोटोकॉल
भारत का ABS ढाँचा जैविक विविधता अधिनियम, 2002 के तहत लागू किया गया है और यह नागोया प्रोटोकॉल के अनुरूप है। यह सुनिश्चित करता है कि जब कोई उपयोगकर्ता — चाहे देशी हो या विदेशी — जैविक संसाधनों तक पहुँचता है, तो उससे होने वाले लाभ का उचित और न्यायसंगत बंटवारा मूल समुदायों और राज्यों के साथ हो। जहाँ मूल स्रोत की पहचान नहीं हो सकी, वहाँ NBA ने एक विशेषज्ञ समिति द्वारा तैयार और प्राधिकरण द्वारा अनुमोदित लाभ-साझाकरण के तौर-तरीके अपनाए।
आगे की राह
यह वितरण भारत में ABS तंत्र को व्यावहारिक रूप देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे-जैसे अधिक कंपनियाँ भारत के जैविक संसाधनों का व्यावसायिक उपयोग करेंगी, ABS के तहत वसूली जाने वाली राशि और उसका वितरण दायरा और व्यापक होता जाएगा।