के. एन. सिंह: वकालत छोड़ 200+ फिल्मों में बने बॉलीवुड के 'जेंटलमैन विलेन'
सारांश
मुख्य बातें
हिंदी सिनेमा के इतिहास में कृष्ण निरंजन सिंह — जिन्हें दुनिया के. एन. सिंह के नाम से जानती है — एक ऐसे खलनायक थे जिन्होंने पर्दे पर न चीखकर, न चिल्लाकर, बल्कि केवल अपनी कातिलाना नज़रों, गहरी आवाज़ और चेहरे के भावों से दर्शकों के दिलों में खौफ पैदा किया। 1 सितंबर 1908 को देहरादून, उत्तराखंड में जन्मे इस दिग्गज अभिनेता ने पाँच दशकों में 200 से अधिक हिंदी फिल्मों में अभिनय किया और भारतीय सिनेमा के शुरुआती दौर के सबसे प्रभावशाली चरित्र कलाकारों में अपनी जगह बनाई।
वकालत से सिनेमा तक का सफर
के. एन. सिंह के पिता चंडी प्रसाद सिंह एक प्रसिद्ध क्रिमिनल लॉयर और कुछ रियासतों के राजा थे। स्वाभाविक रूप से के. एन. सिंह भी बैरिस्टर बनने का सपना देखते थे। लेकिन एक निर्णायक घटना ने उनकी राह बदल दी — उनके पिता द्वारा एक कातिल को कानून की बारीकियों के सहारे बचाए जाने की घटना ने उनके मन में वकालत के प्रति जो जुनून था, उसे हमेशा के लिए बुझा दिया।
इसके बाद उन्होंने कई व्यवसाय आज़माए — लाहौर में प्रिंटिंग प्रेस स्थापित की, राजा-रजवाड़ों के लिए जंगली जानवरों की सप्लाई की, चाय बागानों के मज़दूरों के लिए विशेष जूते बनवाए और फौज को खुखरी की आपूर्ति की। शुरुआती सफलता के बावजूद ये सभी उद्यम लंबे समय तक टिक नहीं सके।
निजी जीवन और ओलंपिक से चूकना
लगातार असफलताओं से आत्मविश्वास डगमगाने पर उनके पिता ने 1930 में उनकी शादी मेरठ के फौलादा गाँव की आनंद देवी से करवाई। दुर्भाग्यवश, कुछ समय बाद बीमारी के कारण आनंद देवी का निधन हो गया।
के. एन. सिंह केवल अभिनेता नहीं, बल्कि एक कुशल एथलीट भी थे। 1935 के बर्लिन ओलंपिक के लिए उनका चयन लगभग तय था, किंतु बहन की गंभीर बीमारी के कारण वे इस अवसर से वंचित रह गए। बहन को देखने कलकत्ता गए तो वहाँ उनकी मुलाकात पृथ्वीराज कपूर से हुई, जिन्होंने उन्हें निर्देशक देबाकी बोस से मिलवाया — और यहीं से उनके सिनेमाई जीवन की नींव पड़ी।
पाँच दशकों का शानदार फ़िल्मी करियर
के. एन. सिंह ने अपने अभिनय करियर की शुरुआत 1936 में फिल्म 'सुनहरा संसार' से की, जिसमें उन्होंने एक डॉक्टर का किरदार निभाया। इसके बाद वे मुंबई आए और 1937 की सुपरहिट फिल्म 'बागवान' से बतौर खलनायक इंडस्ट्री में पहचान बनाई। उनकी प्रमुख फिल्मों में 'बरसात' (1949), 'आवारा' (1951), 'बाज़ी' (1951), 'जाल' (1952), 'सीआईडी' (1956), 'हावड़ा ब्रिज' (1958), 'चलती का नाम गाड़ी' (1958), 'तीसरी मंज़िल' (1966), 'हाथी मेरे साथी' (1971) और 'डॉन' (1978) शामिल हैं।
उनकी अंतिम फिल्म 'दानवीर' थी, जो 20 सितंबर 1996 को रिलीज़ हुई। गौरतलब है कि हिंदी सिनेमा में उन्हें पहला ऐसा खलनायक माना जाता है जिसने नकारात्मक किरदार को शालीनता और संयम के साथ परदे पर उतारा — इसीलिए उन्हें 'जेंटलमैन विलेन' की उपाधि मिली।
परिवार और विरासत
छह भाई-बहनों में सबसे बड़े के. एन. सिंह की दूसरी पत्नी प्रवीण पाल स्वयं एक सफल चरित्र अभिनेत्री थीं। दोनों की कोई संतान नहीं थी, इसलिए उन्होंने अपने छोटे भाई विक्रम सिंह के पुत्र पुष्कर सिंह को गोद लिया, जो आगे चलकर टेलीविज़न धारावाहिकों के सफल निर्माता बने।
जीवन के अंतिम वर्षों में के. एन. सिंह की दृष्टि चली गई। 31 जनवरी 2000 को मुंबई में उनका निधन हो गया। भारतीय सिनेमा में उनकी विरासत आज भी उन तमाम खलनायकों के लिए प्रेरणा है जो बिना शोर मचाए, केवल अभिनय की ताकत से दर्शकों को बाँधना चाहते हैं।