बृजभूषण शरण सिंह बरी: दिल्ली कोर्ट ने महिला पहलवानों के यौन उत्पीड़न मामले में सुनाया फैसला
सारांश
मुख्य बातें
दिल्ली की राऊज एवेन्यू कोर्ट ने सोमवार, 3 अगस्त को भारतीय कुश्ती संघ (WFI) के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह को छह महिला पहलवानों द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों से बरी कर दिया। अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अश्विनी पंवार ने यह फैसला सुनाया। इस मामले में सह-आरोपी और WFI के पूर्व सहायक सचिव विनोद तोमर को भी बरी कर दिया गया।
मुख्य घटनाक्रम
फैसले से पहले बृजभूषण शरण सिंह स्वयं कोर्ट में उपस्थित हुए। सुनवाई से पूर्व उन्होंने कहा, 'जो कहेगा कोर्ट, कहेगा — हम अभी कुछ नहीं कहेंगे।' अदालत ने 2 जुलाई को इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था और 3 अगस्त को वह फैसला सार्वजनिक किया गया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद जनवरी 2023 में उस समय सामने आया जब नए संसद भवन के उद्घाटन के दौरान ओलंपिक पदक विजेता साक्षी मलिक, बजरंग पुनिया और विनेश फोगाट ने तत्कालीन भारतीय जनता पार्टी (BJP) सांसद बृजभूषण शरण सिंह पर यौन उत्पीड़न और सत्ता के दुरुपयोग के गंभीर आरोप लगाए। इन आरोपों के आधार पर दिल्ली पुलिस ने एफआईआर दर्ज की, जिसमें बृजभूषण के साथ विनोद तोमर का नाम भी शामिल किया गया।
जून 2023 में पुलिस ने बृजभूषण के विरुद्ध कई धाराओं के अंतर्गत आरोप-पत्र दाखिल किया। इसके बाद मई 2024 में ट्रायल कोर्ट ने पाँच महिला पहलवानों के उत्पीड़न और उनकी गरिमा को आहत करने के आरोप औपचारिक रूप से बृजभूषण शरण सिंह पर तय किए।
नाबालिग पहलवान का मामला
एक नाबालिग पहलवान ने भी बृजभूषण पर आरोप लगाए थे। हालाँकि, कथित तौर पर बाद में उसने अपनी शिकायत वापस ले ली, जिसके बाद दिल्ली पुलिस ने 'बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम' (POCSO) के अंतर्गत उस मामले में कैंसिलेशन रिपोर्ट दाखिल की और वह मामला बंद कर दिया गया।
आम जनता और खेल जगत पर असर
यह मामला भारतीय खेल जगत के इतिहास में सबसे चर्चित और संवेदनशील विवादों में से एक रहा है। साक्षी मलिक, बजरंग पुनिया और विनेश फोगाट जैसे शीर्ष पहलवानों के आरोपों ने देशभर में महिला खिलाड़ियों की सुरक्षा और खेल संस्थाओं में जवाबदेही को लेकर व्यापक बहस छेड़ी थी। यह ऐसे समय में आया था जब भारत में महिलाओं के विरुद्ध कार्यस्थल पर उत्पीड़न के मुद्दे पर राष्ट्रीय चर्चा तेज हो रही थी।
आगे क्या
अदालत के इस फैसले के बाद यह देखना होगा कि आरोप लगाने वाले पहलवान उच्च न्यायालय में अपील का रास्ता चुनते हैं या नहीं। खेल संस्थाओं में पारदर्शिता और महिला खिलाड़ियों की सुरक्षा को लेकर यह बहस अभी समाप्त नहीं हुई है।