कैप्टन मोहित शर्मा ने आतंकियों के गढ़ में 'इफ्तिखार भट्ट' बनकर किया ऑपरेशन
सारांश
Key Takeaways
- कैप्टन मोहित शर्मा ने अदम्य साहस दिखाया।
- उन्होंने हिजबुल मुजाहिदीन के प्रमुख कमांडरों को निष्क्रिय किया।
- उन्हें 'अशोक चक्र' से नवाजा गया।
- उनकी कहानी प्रेरणा का स्रोत है।
- देश सेवा के प्रति उनका समर्पण अद्वितीय था।
नई दिल्ली, 20 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। वर्ष 2004 में जम्मू-कश्मीर के शोपियां जिले में आतंकवादी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर एक सुरक्षित स्थान पर बैठकर भारतीय सेना पर हमले की योजना बना रहे थे। इसी भीड़ में एक शख्स था, जिसका नाम था 'इफ्तिखार भट्ट'। यह 'इफ्तिखार भट्ट' कोई आतंकवादी नहीं था, बल्कि वह भारतीय सेना की विशेष बलों के '1 पैरा स्पेशल फोर्सेज' (1 पैरा एसएफ) के एक साहसी अधिकारी कैप्टन मोहित शर्मा थे।
कई दिनों तक आतंकियों के बीच गुप्त रूप से रहने के बाद, 16 मार्च 2004 को जब आतंकियों ने अपनी चौकसी में कमी की, तो 'इफ्तिखार भट्ट' ने अपनी वास्तविक पहचान प्रकट की। पलक झपकते ही कैप्टन मोहित ने हिजबुल के प्रमुख कमांडर अबू तोरारा और सबजारा को मार गिराया और पूरे आतंकी नेटवर्क को तोड़ दिया। इस अद्वितीय साहस के लिए उन्हें 'सेना मेडल' (वीरता) से सम्मानित किया गया।
13 जनवरी 1978 को हरियाणा के रोहतक में जन्मे मोहित शर्मा को घर में सब प्यार से 'चिंटू' बुलाते थे। उनके पिता राजेंद्र प्रसाद शर्मा बैंक में कार्यरत थे और मां सुशीला शर्मा एक गृहिणी थीं। उनका परिवार बाद में गाजियाबाद (यूपी) के साहिबाबाद क्षेत्र में बस गया। मोहित की शिक्षा दिल्ली के मानव स्थली स्कूल, साहिबाबाद के होली एंजल्स और फिर डीपीएस गाजियाबाद से हुई।
12वीं के बाद मोहित ने महाराष्ट्र के एक इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला लिया। लेकिन, उनके दिल में तो सेना की वर्दी बसती थी। इसी दौरान उन्होंने एनडीए (राष्ट्रीय रक्षा अकादमी) का कठिन इंटरव्यू पास किया और इंजीनियरिंग छोड़कर 1995 में सेना में शामिल होने के लिए पुणे चले गए।
यहां मोहित को 'इंडिया स्क्वाड्रन' में रखा गया और दोस्तों ने उन्हें 'माइक' नाम दिया। मोहित ने यहां खुद को हर मोर्चे पर साबित किया। वह एक चैंपियन घुड़सवार बने। इतना ही नहीं, उन्होंने बॉक्सिंग में फेदरवेट चैंपियनशिप जीती और एकेडमी के सबसे अच्छे तैराकों में अपना नाम दर्ज कराया।
1998 में मोहित शर्मा देहरादून की इंडियन मिलिट्री एकेडमी (आईएएमए) पहुंचे। उनकी नेतृत्व क्षमता इतनी शानदार थी कि उन्हें 'बटालियन कैडेट एडजुटेंट' (बीसीए) का प्रतिष्ठित पद मिला। उनके उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन से राष्ट्रपति भवन में मिलने का अवसर भी प्राप्त हुआ। 11 दिसंबर 1999 को वह सेना की '5 मद्रास' रेजिमेंट में लेफ्टिनेंट बनकर शामिल हुए।
शुरुआती पोस्टिंग के बाद मोहित को कश्मीर में '38 राष्ट्रीय राइफल्स' में भेजा गया। यहां उन्होंने आतंकियों से सीधे लोहा लेना सीखा। उनके शानदार कार्य के लिए 2002 में उन्हें 'थल सेनाध्यक्ष प्रशंसा पदक' मिला।
मोहित शर्मा को कुछ और बड़ा करना था। दिसंबर 2002 में उन्होंने सेना की 'पैरा स्पेशल फोर्सेज' में जाने का निर्णय लिया। 2003 में 'मैरून बेरेट' पहनकर 1 पैरा (एसएफ) के कमांडो बन गए। उनके अनुभव को देखते हुए सेना ने उन्हें 2005 से 2006 तक बेलगाम में नए कमांडोज को प्रशिक्षित करने के लिए 'इंस्ट्रक्टर' भी बनाया।
मार्च 2009 में कश्मीर के कुपवाड़ा का हाफरुदा जंगल आतंकियों की घुसपैठ का अड्डा बना हुआ था। 21 मार्च 2009 को खुफिया जानकारी मिली कि कुछ आतंकी घने जंगल में छिपे हैं। मेजर मोहित शर्मा अपनी 'ब्रावो असॉल्ट टीम' के साथ 'ऑपरेशन पिनाका' के तहत जंगल में घुस गए।
अचानक तीन तरफ से आतंकियों ने उनकी टीम पर भारी गोलाबारी शुरू कर दी। यह एक खतरनाक घात था। इस अचानक हुए हमले में मोहित के चार कमांडो साथी बुरी तरह घायल होकर 'किल जोन' में फंस गए।
अपनी जान की परवाह किए बिना मेजर मोहित शर्मा ने दो घायल साथियों को सुरक्षित निकाला और अपनी गन से आतंकियों पर कहर बनकर टूट पड़े। इस भीषण गोलाबारी में उन्हें कई गोलियां लगीं। लहूलुहान होने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और अपनी आखिरी सांस तक आतंकियों से लड़ते रहे, ताकि उनकी टीम सुरक्षित रह सके।
उन्होंने इस एनकाउंटर में अपनी जान की आहुति दे दी, लेकिन आतंकियों के मंसूबों को खाक में मिला दिया। अदम्य साहस, निस्वार्थ भाव और देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने के लिए मेजर मोहित शर्मा को मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार 'अशोक चक्र' से सम्मानित किया गया।