29 अक्टूबर 2026
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सीबीआई अदालत का फैसला: नेशनल आर्काइव्स के पूर्व अभिलेखापाल सतधारी लाल साहू को रिश्वतखोरी में 3 वर्ष की सजा

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सीबीआई अदालत का फैसला: नेशनल आर्काइव्स के पूर्व अभिलेखापाल सतधारी लाल साहू को रिश्वतखोरी में 3 वर्ष की सजा

सारांश

अहमदाबाद की सीबीआई अदालत ने नेशनल आर्काइव्स के पूर्व अभिलेखापाल को 2012 में ब्रिटिशकालीन भूमि अभिलेखों की प्रतियों के लिए ₹15,000 की रिश्वत लेने के मामले में दोषी ठहराया। तीन वर्ष की सजा और ₹20,000 का जुर्माना — और एक अलग मामले में ईडी के दो अधिकारी भी ₹5 लाख की रिश्वत में पकड़े गए।

मुख्य बातें

अहमदाबाद सीबीआई अदालत ने 28 अक्टूबर 2026 को सतधारी लाल साहू को तीन वर्ष के कठोर कारावास और ₹20,000 जुर्माने की सजा सुनाई।
साहू नेशनल आर्काइव्स ऑफ इंडिया के जयपुर स्थित झालाना डूंगरी रिकॉर्ड सेंटर में अभिलेखापाल थे।
उन्होंने राजकोट के सर्वे से जुड़े ब्रिटिशकालीन भूमि अभिलेखों की प्रतियों के लिए ₹15,000 की रिश्वत माँगी और 26 दिसंबर 2012 को रंगे हाथों पकड़े गए।
सीबीआई ने 28 जून 2013 को चार्जशीट दाखिल की थी; एक दशक से अधिक लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद फैसला आया।
अलग मामले में, 23 अक्टूबर को सीबीआई ने ईडी के लखनऊ जोन के अधिकारी दीपक कुमार और हेड कांस्टेबल मनोज द्विवेदी को ₹5 लाख की रिश्वत लेते पकड़ा।

अहमदाबाद की एक सीबीआई विशेष अदालत ने 28 अक्टूबर 2026 को सतधारी लाल साहू को रिश्वतखोरी के मामले में दोषी ठहराते हुए तीन वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई और ₹20,000 का जुर्माना लगाया। साहू नेशनल आर्काइव्स ऑफ इंडिया के जयपुर स्थित झालाना डूंगरी रिकॉर्ड सेंटर में अभिलेखापाल (आर्काइविस्ट) के पद पर तैनात थे, जब यह मामला 26 दिसंबर 2012 को दर्ज हुआ था।

मामले की पृष्ठभूमि

शिकायतकर्ता ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को आरोप लगाते हुए बताया था कि साहू ने सरकारी अभिलेखों की प्रतियाँ उपलब्ध कराने के एवज में अवैध रूप से धनराशि की माँग की थी। सीबीआई के अनुसार, साहू ने राजकोट के सर्वे से जुड़े पुराने सीआरओ रिकॉर्ड और ब्रिटिश काल के भूमि अभिलेखों की एक फाइल की प्रतियाँ देने के बदले ₹15,000 की रिश्वत माँगी थी।

गौरतलब है कि ये रिकॉर्ड ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील थे और सार्वजनिक संस्था की अभिरक्षा में थे। यह मामला सरकारी अभिलेखागारों में पारदर्शिता की कमी और सार्वजनिक सेवकों द्वारा आधिकारिक पद के दुरुपयोग की व्यापक समस्या को रेखांकित करता है।

रंगे हाथों गिरफ्तारी और जाँच

शिकायत मिलने के बाद सीबीआई ने जाल बिछाया और साहू को शिकायतकर्ता से ₹15,000 की रिश्वत लेते हुए 26 दिसंबर 2012 को रंगे हाथों पकड़ लिया। गिरफ्तारी के तत्काल बाद एजेंसी ने उनके घर और कार्यालय में भी तलाशी ली।

जाँच पूरी होने के बाद सीबीआई ने 28 जून 2013 को साहू के विरुद्ध चार्जशीट दाखिल की। करीब एक दशक से अधिक समय तक मुकदमा चलने के बाद अदालत ने बुधवार को अंतिम फैसला सुनाया।

अदालत का निर्णय

सुनवाई पूरी होने के बाद अहमदाबाद सीबीआई अदालत ने साहू को दोषी करार देते हुए तीन वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई। इसके अतिरिक्त ₹20,000 का जुर्माना भी अधिरोपित किया गया। यह निर्णय उन मामलों में सीबीआई की अभियोजन क्षमता की पुष्टि करता है जिनमें रंगे हाथों गिरफ्तारी के साक्ष्य उपलब्ध हों।

ईडी अधिकारियों पर अलग कार्रवाई

इससे अलग एक अन्य मामले में, 23 अक्टूबर को सीबीआई ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के लखनऊ जोन के दो अधिकारियों — प्रवर्तन अधिकारी दीपक कुमार और हेड कांस्टेबल मनोज द्विवेदी — को ₹5 लाख की कथित रिश्वतखोरी के मामले में रंगे हाथों गिरफ्तार किया।

शिकायत के अनुसार, द्विवेदी ने ईडी के एक मामले में सहायता के बदले शिकायतकर्ता के पिता से रिश्वत माँगी थी। शिकायतकर्ता के पिता को अगस्त और सितंबर में ईडी के लखनऊ जोन से दो समन जारी किए गए थे। सीबीआई ने जाल बिछाकर द्विवेदी को प्रवर्तन अधिकारी दीपक कुमार की ओर से ₹5 लाख की रिश्वत लेते हुए पकड़ा।

भ्रष्टाचार विरोधी अभियान का संदर्भ

यह ऐसे समय में आया है जब केंद्र सरकार सार्वजनिक सेवाओं में पारदर्शिता को प्राथमिकता दे रही है। सीबीआई द्वारा एक ही सप्ताह में दो अलग-अलग भ्रष्टाचार मामलों में सफल कार्रवाई, जाँच एजेंसी की सक्रियता का संकेत देती है। आलोचकों का कहना है कि ऐसे मामलों का त्वरित निपटान भविष्य में अन्य सरकारी कर्मचारियों के लिए निवारक का काम कर सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

इस तरह की देरी खुद भ्रष्टाचार को प्रोत्साहन देती है।
RashtraPress
29 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सतधारी लाल साहू कौन हैं और उन्हें किस मामले में सजा हुई?
सतधारी लाल साहू नेशनल आर्काइव्स ऑफ इंडिया के जयपुर स्थित झालाना डूंगरी रिकॉर्ड सेंटर के पूर्व अभिलेखापाल हैं। उन्हें 2012 में राजकोट के ब्रिटिशकालीन भूमि अभिलेखों की प्रतियाँ देने के बदले ₹15,000 की रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ा गया था, जिसके बाद अहमदाबाद की सीबीआई अदालत ने उन्हें 28 अक्टूबर 2026 को तीन वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई।
इस मामले में सीबीआई ने जाल कैसे बिछाया?
शिकायतकर्ता की शिकायत पर सीबीआई ने एक ट्रैप ऑपरेशन चलाया, जिसमें साहू को शिकायतकर्ता से ₹15,000 की रिश्वत स्वीकार करते हुए 26 दिसंबर 2012 को मौके पर ही गिरफ्तार किया गया। इसके बाद उनके घर और कार्यालय में तलाशी ली गई और 28 जून 2013 को चार्जशीट दाखिल की गई।
ईडी लखनऊ के अधिकारियों पर क्या आरोप हैं?
सीबीआई ने 23 अक्टूबर को प्रवर्तन निदेशालय के लखनऊ जोन के प्रवर्तन अधिकारी दीपक कुमार और हेड कांस्टेबल मनोज द्विवेदी को ₹5 लाख की कथित रिश्वत लेते पकड़ा। आरोप है कि द्विवेदी ने ईडी मामले में सहायता के बदले शिकायतकर्ता के पिता से यह राशि माँगी थी, जिन्हें पहले दो समन भेजे जा चुके थे।
नेशनल आर्काइव्स ऑफ इंडिया में इस तरह की रिश्वतखोरी का जनता पर क्या असर पड़ता है?
नेशनल आर्काइव्स में संग्रहीत ब्रिटिशकालीन और ऐतिहासिक अभिलेखों तक आम नागरिकों, शोधकर्ताओं और भूमि दावेदारों की कानूनी पहुँच होती है। ऐसे में रिश्वत की माँग सार्वजनिक रिकॉर्ड तक नागरिकों के अधिकार को अवरुद्ध करती है और सरकारी संस्थाओं में जनविश्वास को कमज़ोर करती है।
इस मामले में फैसला आने में इतने वर्ष क्यों लगे?
साहू को दिसंबर 2012 में गिरफ्तार किया गया था और जून 2013 में चार्जशीट दाखिल हुई थी, जबकि अंतिम फैसला अक्टूबर 2026 में आया — यानी करीब 14 वर्ष की लंबी कानूनी प्रक्रिया। यह भारत की विशेष भ्रष्टाचार न्यायालयों में लंबित मामलों की व्यापक समस्या को दर्शाता है।
राष्ट्र प्रेस
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