CEA नागेश्वरन: वैश्विक प्रतिस्पर्धा ही एफडीआई की असली चाबी, भारत को सुधार जारी रखने होंगे
सारांश
मुख्य बातें
मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) वी. अनंत नागेश्वरन ने 25 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में आयोजित 13वें पीएएफआई वार्षिक फोरम में कहा कि भारत ने विनिर्माण क्षेत्र और व्यापक आर्थिक सुधारों के ज़रिए विदेशी निवेशकों का भरोसा जीता है, लेकिन प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) आकर्षित करने की असली कुंजी वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बने रहना है। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल सुधारों की सूची पूरी कर लेने से अगले ही दिन पूंजी प्रवाह की गारंटी नहीं मिलती — निवेश के फैसले एक बड़े और तेज़ी से बदलते वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में लिए जाते हैं।
मुख्य संदेश: सुधार काफी नहीं, प्रतिस्पर्धा ज़रूरी
नागेश्वरन ने कहा कि एफडीआई बढ़ाने की चर्चा में अक्सर यह धारणा हावी रहती है कि भारत को 'और प्रयास' करने चाहिए। उनके अनुसार यह नज़रिया अधूरा है। उन्होंने कहा, 'कई बार कोई देश सभी सही कदम उठाता है, लेकिन फिर भी तत्काल परिणाम नहीं दिखते — इसकी वजह वैश्विक वित्तीय और आर्थिक परिदृश्य का लगातार बदलना है।' उनके अनुसार निवेशक किसी देश की नीतियाँ अकेले नहीं, बल्कि वैश्विक ब्याज दरों, भू-राजनीतिक जोखिम और पूंजी की लागत के व्यापक संदर्भ में देखते हैं।
भारत के मैक्रो संकेतक: निवेशकों के लिए सकारात्मक संकेत
CEA ने रेखांकित किया कि 7 प्रतिशत या उससे अधिक की स्थिर आर्थिक वृद्धि, घटती मुद्रास्फीति और राजकोषीय अनुशासन ने निवेशकों की धारणा पर सकारात्मक असर डाला है। उन्होंने बताया कि इन्हीं कारकों के चलते भारत को हाल के वर्षों में क्रेडिट रेटिंग अपग्रेड का लाभ मिला है। इसके अतिरिक्त, निवेशकों की सुरक्षा, कर नीति में स्थिरता और पूर्वानुमेयता, कुशल कार्यबल की उपलब्धता तथा मज़बूत लॉजिस्टिक्स नेटवर्क भी निवेश निर्णयों में अहम भूमिका निभाते हैं। हालाँकि उन्होंने स्पष्ट किया कि व्यापक मैक्रो स्थिरता के बिना ये उपाय अकेले पर्याप्त नहीं होते।
एफडीआई के आंकड़े: दो दशकों में ऐतिहासिक उछाल
डीपीआईआईटी और भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारत में कुल एफडीआई प्रवाह वित्त वर्ष 2000-01 के लगभग 4 अरब डॉलर से बढ़कर वित्त वर्ष 2025-26 में करीब 95 अरब डॉलर तक पहुँच गया है। इसी अवधि में एफडीआई इक्विटी निवेश 2 अरब डॉलर से बढ़कर 59 अरब डॉलर हो गया। आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2000-01 से 2025-26 के बीच भारत को कुल मिलाकर लगभग 1.16 ट्रिलियन डॉलर का एफडीआई प्राप्त हुआ है, जबकि एफडीआई इक्विटी निवेश का संचयी प्रवाह 791 अरब डॉलर रहा है।
एफडीआई नीति का अगला चरण: टिकाऊ और गहरे एकीकरण पर ज़ोर
इस सप्ताह जारी एसोचैम के एक अध्ययन का हवाला देते हुए नागेश्वरन ने कहा कि भारत की एफडीआई नीति का अगला चरण केवल निवेश आकर्षित करने तक सीमित नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसा वातावरण बनाना होगा जिसमें निवेश लंबे समय तक टिक सके, उसका विस्तार हो सके और वह भारतीय औद्योगिक एवं आर्थिक तंत्र के साथ अधिक गहराई से जुड़ सके। यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक ब्याज दरों के बदलते माहौल ने सीमा-पार निवेश के फैसलों को पहले की तुलना में कहीं अधिक संवेदनशील बना दिया है।
आगे की राह
गौरतलब है कि भारत उस दौर में यह संदेश दे रहा है जब चीन+1 रणनीति के तहत वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएँ पुनर्गठित हो रही हैं और कई देश एक साथ निवेश के लिए होड़ में हैं। नागेश्वरन के वक्तव्य से स्पष्ट है कि सरकार नीति-सुधारों की रफ़्तार बनाए रखने के साथ-साथ वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को अपना दीर्घकालिक लक्ष्य मान रही है।