राम मंदिर ट्रस्ट में चंपत राय और अनिल मिश्रा का इस्तीफा, ₹7 करोड़ दान घोटाले की जांच के बीच नैतिक जिम्मेदारी
सारांश
मुख्य बातें
श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्रा ने शुक्रवार, 26 जून को अपने पदों से इस्तीफा दे दिया। अयोध्या स्थित राम मंदिर में मिले दान में ₹7 करोड़ से अधिक की कथित हेराफेरी की जांच के बीच यह कदम उठाया गया है। दोनों पर सीधे कोई आरोप नहीं है, फिर भी इन इस्तीफों को उनकी नेतृत्व भूमिकाओं के चलते नैतिक जवाबदेही के रूप में देखा जा रहा है।
मामले की पृष्ठभूमि
एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) को मंदिर में दान के लेन-देन में गड़बड़ियाँ मिलीं, जिसके बाद अब तक आठ लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। यह मामला पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया है और मंदिर प्रशासन के प्रति आम जनता का भरोसा हिल गया है। गौरतलब है कि ₹7 करोड़ से अधिक की यह कथित हेराफेरी उस दान राशि से जुड़ी है जो करोड़ों श्रद्धालुओं ने राम मंदिर निर्माण के लिए समर्पित की थी।
चंपत राय: दशकों की सेवा का सफर
80 वर्षीय चंपत राय का जन्म उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले में हुआ था। सार्वजनिक जीवन में आने से पहले वे केमिस्ट्री के प्रोफेसर थे। कम उम्र में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े और 1980 में विश्व हिंदू परिषद (VHP) के सदस्य बने। आपातकाल के दौरान उन्होंने 18 महीने जेल में बिताए, जिसने उनके संकल्प को और दृढ़ किया।
राम मंदिर के लिए दशकों तक चले आंदोलन में वे एक प्रमुख चेहरा रहे। फरवरी 2020 में सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले के बाद जब श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन हुआ, तो चंपत राय को इसका महासचिव नियुक्त किया गया। वे मंदिर निर्माण, प्रशासन और दान प्रबंधन की देखरेख करते थे।
अनिल मिश्रा: अयोध्या की स्थानीय पहचान
60 वर्ष से अधिक आयु के अनिल मिश्रा ट्रस्ट में शामिल होने से पहले अयोध्या के नागरिक और सामाजिक हलकों में एक जानी-मानी हस्ती थे। उनकी भूमिका मुख्यतः प्रशासनिक थी — वे दान के लेन-देन और संगठनात्मक कार्यों की देखरेख के लिए अन्य ट्रस्टियों के साथ मिलकर काम करते थे। रिपोर्टों के अनुसार, मंदिर में प्राप्त दान और चढ़ावे की निगरानी उनकी प्रमुख जिम्मेदारियों में शामिल थी, जिस कारण इस विवाद में उनकी जवाबदेही को अहम माना जा रहा है।
उनकी ट्रस्टी नियुक्ति यह दर्शाती है कि ट्रस्ट अयोध्या और उसके स्थानीय समुदाय से गहरे जुड़ाव वाले व्यक्तियों को शामिल करना चाहता था।
इस्तीफे का कारण और संदेश
दोनों पदाधिकारियों ने कथित तौर पर यह फैसला पारदर्शिता सुनिश्चित करने और SIT को बिना किसी हितों के टकराव या पक्षपात की आशंका के निष्पक्ष जांच करने देने के उद्देश्य से लिया। यह ऐसे समय में आया है जब मंदिर प्रशासन पर जनता की नज़रें टिकी हैं और विपक्षी दलों ने जवाबदेही की मांग तेज कर दी है।
आगे क्या होगा
SIT की जांच जारी है और मंदिर प्रशासन में नई नियुक्तियों की प्रक्रिया शुरू होने की संभावना है। इन इस्तीफों के बाद ट्रस्ट के भविष्य के नेतृत्व और दान प्रबंधन की पारदर्शिता पर सभी की नज़र बनी रहेगी।