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कच्चे तेल की गिरावट से पेट्रोल-डीजल तुरंत सस्ता नहीं होगा: मंत्री सुरेश गोपी

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कच्चे तेल की गिरावट से पेट्रोल-डीजल तुरंत सस्ता नहीं होगा: मंत्री सुरेश गोपी

सारांश

कच्चे तेल में गिरावट के बावजूद पेट्रोल-डीजल तुरंत सस्ता नहीं होगा — मंत्री सुरेश गोपी ने साफ किया कि होर्मुज़ मार्ग से तेल पहुँचने में समय लगता है और सरकार पहले ही ₹12,000 करोड़ का बोझ उठा चुकी है। ब्रेंट क्रूड 78 डॉलर और WTI 75 डॉलर पर आया।

मुख्य बातें

पेट्रोलियम राज्य मंत्री सुरेश गोपी ने 18 जून को कहा कि कच्चे तेल की कीमत घटने का मतलब पेट्रोल-डीजल का तुरंत सस्ता होना नहीं है।
कम कीमत का कच्चा तेल होर्मुज़ जलडमरूमध्य के रास्ते भारत पहुँचने में समय लेता है।
पश्चिम एशिया संघर्ष के दौरान उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए सरकार को ₹12,000 करोड़ का नुकसान उठाना पड़ा।
ब्रेंट क्रूड गुरुवार को 1.64% गिरकर करीब 78 डॉलर प्रति बैरल पर आया; WTI करीब 2% गिरकर 75 डॉलर पर पहुँचा।
मंत्री ने कहा कि ऊंची कीमतों के दौरान किसी भी राज्य सरकार ने अपने कर राजस्व में कटौती नहीं की।

पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस तथा पर्यटन राज्य मंत्री सुरेश गोपी ने गुरुवार, 18 जून को स्पष्ट किया कि वैश्विक बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट का अर्थ यह नहीं है कि भारत में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतें फ़ौरन कम हो जाएंगी। नई दिल्ली में पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि घरेलू ईंधन मूल्य निर्धारण एक जटिल प्रक्रिया है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय भाव के अलावा परिवहन, आपूर्ति-श्रृंखला और सरकारी वित्तीय स्थिति जैसे कई कारक शामिल होते हैं।

होर्मुज़ मार्ग और आपूर्ति में देरी

मंत्री ने समझाया कि कम कीमत पर खरीदा गया कच्चा तेल होर्मुज़ जलडमरूमध्य के रास्ते भारत तक पहुँचने में समय लेता है। उन्होंने कहा, 'इसमें समय लगेगा क्योंकि कम कीमत वाला कच्चा तेल होर्मुज़ जलडमरूमध्य के रास्ते भारत पहुंचेगा। वहां जहाजों की आवाजाही काफी अधिक रहेगी। हालात को सामान्य होने में समय लगेगा।' यह ऐसे समय में आया है जब पश्चिम एशिया में कूटनीतिक प्रगति के बाद तनाव में कुछ कमी आई है।

ओएमसी को ₹12,000 करोड़ का नुकसान

गोपी ने बताया कि इस साल पश्चिम एशिया में हुए संघर्ष के बाद वैश्विक ऊर्जा बाज़ार में आई अस्थिरता का सरकारी तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) पर गहरा असर पड़ा। उपभोक्ताओं को बढ़ी हुई कीमतों से बचाने के लिए केंद्र सरकार ने इस अतिरिक्त बोझ का बड़ा हिस्सा स्वयं वहन किया। उन्होंने कहा, 'इस असर को अपने ऊपर लेने के कारण सरकार को ₹12,000 करोड़ का नुकसान हुआ।'

राज्य सरकारों पर सवाल

मंत्री ने यह भी रेखांकित किया कि ऊंची ईंधन कीमतों के दौरान किसी भी राज्य सरकार ने अपने करों में कटौती कर राजस्व नहीं छोड़ा। उन्होंने कहा, 'केंद्र सरकार को भी देश चलाना है और तेल कंपनियों को भी टिके रहना है।' गौरतलब है कि ईंधन पर वैट और राज्य-स्तरीय शुल्क अंतिम खुदरा मूल्य का एक बड़ा हिस्सा बनाते हैं।

अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में गिरावट

गुरुवार को ब्रेंट क्रूड लगभग 1.64 प्रतिशत गिरकर करीब 78 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था, जबकि अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड भी लगभग 2 प्रतिशत घटकर करीब 75 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया। यह गिरावट पश्चिम एशिया में तनाव कम होने की दिशा में हुई कूटनीतिक प्रगति के बाद देखी गई, जिससे निवेशकों को वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव कम होने की उम्मीद है।

आगे क्या होगा

मंत्री ने स्पष्ट किया कि हाल में हुई ईंधन मूल्य वृद्धि को तुरंत वापस नहीं लिया जा सकता। पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कोई भी राहत तभी संभव है जब कम कीमत का कच्चा तेल भारतीय रिफाइनरियों तक पहुँचे, ओएमसी की वित्तीय स्थिति स्थिर हो और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला सामान्य हो जाए। विश्लेषकों के अनुसार यह प्रक्रिया कुछ सप्ताह से लेकर महीनों तक का समय ले सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

और जब घटती हैं तो 'समय लगेगा' — यह असंतुलन नीति की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है। ₹12,000 करोड़ के नुकसान का हवाला देना उचित है, लेकिन राज्य सरकारों पर दोष मढ़ना उस ढाँचागत समस्या से ध्यान हटाता है जिसमें केंद्र और राज्य दोनों ईंधन कर को राजस्व के सुरक्षित स्रोत के रूप में देखते हैं। जब तक पेट्रोल-डीजल को GST के दायरे में लाने पर गंभीर चर्चा नहीं होती, उपभोक्ता इसी 'समय लगेगा' के चक्र में फंसा रहेगा।
RashtraPress
4 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कच्चे तेल की कीमत घटने पर भी पेट्रोल-डीजल तुरंत सस्ता क्यों नहीं होता?
मंत्री सुरेश गोपी के अनुसार, कम कीमत पर खरीदा गया कच्चा तेल होर्मुज़ जलडमरूमध्य के रास्ते भारत तक पहुँचने में समय लेता है। इसके अलावा परिवहन लागत, रिफाइनिंग और सरकारी करों जैसे कई कारक अंतिम खुदरा मूल्य तय करते हैं।
सरकार को ईंधन कीमतों के कारण कितना नुकसान हुआ?
पेट्रोलियम राज्य मंत्री सुरेश गोपी ने बताया कि पश्चिम एशिया संघर्ष के बाद कच्चे तेल की बढ़ी कीमतों से उपभोक्ताओं को बचाने के लिए सरकार को ₹12,000 करोड़ का नुकसान उठाना पड़ा। यह बोझ मुख्यतः सरकारी तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) पर पड़ा।
18 जून को अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क्या कीमत थी?
गुरुवार, 18 जून को ब्रेंट क्रूड लगभग 1.64 प्रतिशत गिरकर करीब 78 डॉलर प्रति बैरल पर था, जबकि अमेरिकी WTI क्रूड करीब 2 प्रतिशत घटकर 75 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा था। यह गिरावट पश्चिम एशिया में कूटनीतिक प्रगति के बाद आई।
राज्य सरकारों की ईंधन कीमतों में क्या भूमिका है?
मंत्री गोपी ने स्पष्ट किया कि ऊंची ईंधन कीमतों के दौरान किसी भी राज्य सरकार ने अपने वैट या अन्य करों में कटौती कर राजस्व नहीं छोड़ा। राज्य-स्तरीय कर अंतिम खुदरा मूल्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं और इनकी दरें राज्य-दर-राज्य अलग-अलग होती हैं।
पेट्रोल-डीजल की कीमतें कब तक कम हो सकती हैं?
मंत्री ने कोई निश्चित समयसीमा नहीं दी, लेकिन संकेत दिया कि राहत तभी मिलेगी जब कम कीमत का कच्चा तेल भारतीय रिफाइनरियों तक पहुँचे और ओएमसी की वित्तीय स्थिति स्थिर हो। वैश्विक आपूर्ति के सामान्य होने पर निर्भर यह प्रक्रिया कुछ सप्ताह से महीनों तक का समय ले सकती है।
राष्ट्र प्रेस
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